हम सब का बचपन कितना मस्ती भरा था न! वह दिन का स्कूल, स्कूल की मस्ती, टीचर की डांट और मां की थोड़ी-सी झिड़की। लेकिन आज देखिए इस बचपन को। अब का बचपन बहुत डिजिटल है, स्कूल में स्मार्ट क्लास से घर में स्मार्ट फोन तक, लेकिन यह अकेला और तनावों से भरा है। तो आइए इस बचपन को थोड़ा-सा अपनों का प्यार और दुलार दें। कैसे होगा बच्चों का बचपन प्यार से सराबोर बता रही हैं वंदना शर्मा।

बचपन हर गम से बेगाना होता है? इस वाक्य पर लगा प्रश्नचिंह हम सभी की ओर उंगली उठा रहा है हमने अपना बचपन तो बहुत खुलेपन, खेलकूद, प्रेम, अपनत्व और सुरक्षा के दायरे में रहकर गुजारा किंतु अपने ही बच्चों के बचपन को न जाने क्यों हम इन सबसे वंचित कर रहे हैं। हमें चाहिए कि जिस संवेदनात्मक अपनत्व और प्रेम से भरा हुआ हमारा वो बचपन था, उसी से आज के बचपन को पल्लवित और पुष्पित करें वरना हमें इस बात से इंकार नहीं करना चाहिए कि यह आखिरी पीढ़ी होगी जिसके बचपन की मधुर यादें उसके स्मृति पटल पर अंकित हैं अन्यथा आज का बचपन बचपन ना होकर बड़प्पन का ही पर्याय बनकर रह जाएगा क्योंकि जिस तनाव, मानसिक-अवसाद और असुरक्षा से हम बड़े घिरे हैं। उसी से बचपन घिरा होगा तो बचपन और बड़प्पन में क्या अंतर रह जाएगा। इसके लिए भविष्य में पश्चाताप और आत्म ग्लानि का अनुभव करने से पूर्व हमें इस प्रश्न का विश्लेषण करना होगा।

बस्ते के बोझ तले बचपन
आज बच्चे बचपन का आनंद नहीं ले रहे हैं। वे इसे मात्र एक बोझ की तरह ढो रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा व्यस्त जीवन उनके लिए घातक सिद्ध हो रहा है? कहीं उनके भविष्य को संवारने के लिए की गई हमारी जद्दोजहद ही उनके अंतर्मन की पीड़ा का कारण न हो? हमारी दिनचर्या और उनकी दिनचर्या लगभग एक सी ही है, बल्कि बच्चों की दिनचर्या प्रात: सात बजे से बस्तों के बोझ तले आरंभ होती है और उसी बोझ तले विद्यालय से लौटकर गृह कार्य करने और परीक्षा के तनाव से लेकर रात्रि में टीवी चैनल के सीरियलों को देखते हुए समाप्त हो जाती हैं और बीच-बीच में मोबाइल गेम, मोबाइल पर अन्य चीजों से जुड़े रहना भी शामिल रहता है। इस पूरी दिनचर्या में कहीं भी मां का वात्सल्य और पिता की प्रेरणा दृष्टिगोचर नहीं है। उसकी दिनचर्या में मां, पिता, दादी और नानी के आलिंगन से प्राप्त संवेदनात्मक सुरक्षा का भी अभाव है।

इस बचपन में कहीं भी खेलकूद, मस्ती-मजा, मनोरंजन और परिवार के साथ बातचीत का कोई स्थान नहीं है। ऐसे में मासूम बच्चों का अंतर्मन कुंठा ग्रस्त, अकेलेपन और मानसिक अवसाद से घिर जाता हैं। मैदान में खेल कूद, मित्रों के साथ बातचीत और परिवार के साथ अपने दिनभर के अनुभवों को साझा करने का समय नहीं मिल पाने के कारण वे भीतर से अलग-थलग महसूस करते है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसमें हमारी व्यस्तताओं के कारण कहीं उनका बचपन तो पीछे नहीं छूट रहा है। वस्तुत: बच्चों का पालन पोषण निश्चिंतता, तनावहीनता के साथ करते हुए उन्हें बचपन की वह खुशियां दी जाए, जिनके वह हकदार हैं। उनके भीतर इस अवस्था में तनाव,चिंता और अवसाद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

सर्वगुण संपन्न बच्चे की चाह
सर्वप्रथम हमें इसके कारण को समझना होगा इसका सबसे बड़ा कारण है परिवार का बच्चों के प्रति रवैया आज हम एक विद्यार्थी स्तर के बच्चे को हरफनमौला (पारंगत) बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि अध्ययन के सभी विषयों में वह सर्वोत्कृष्ट बनें। हम उसे एक सर्वगुण संपन्न रोबोट बनाना चाहते हैं, और देखिए वह बन भी रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि कहीं हम एक भावनाहीन, संवेदनहीन व्यक्तित्व तो तैयार नहीं कर रहे है जो कि भविष्य में परिवार, समाज और देश के लिए बोझ हो जाए।

बच्चों का केंद्र बिंदु
बच्चों के बचपन को खुशहाल करने में मां का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। एक मासूम बच्चे के लिए उसकी पूरी दुनिया होती है, उसकी मां। मां की खुशी के लिए वह अपनी खुशियां दांव पर भी लगा जाता है। अपरिपक्व होते हुए भी उनकी बुद्धि अपनी मां की खुशी- नाखुशी किस में है, वह शीघ्र ही जान लेता है। यही कारण है कि बच्चे को अपनी प्रतिष्ठा का मापदंड बनाने के लिए मात्र दिखावे हेतु अपनी अभिलाषाएं उस पर ना थोपकर उसकी इच्छा, आकांक्षा के अनुसार उसे ढालने का प्रयास करना चाहिए। समाज के दिखावे के लिए अपने मासूम को बलि का बकरा ना बनाएं। बच्चों का लालन-पालन स्वभाविक तरीके से होना चाहिए। बच्चों की छोटी-छोटी बातों को अक्सर गौण समझकर उन्हें सिर्फ पढ़ाई करने की हिदायत देना उन्हें काफी मानसिक चोट पहुंचाता है। हां, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि उसकी पढ़ाई को नकार दिया जाए। बच्चे की प्रतिभा को पढ़ाई को अंक तक सीमित ना करके उसे अपने आसपास के वातावरण से पढ़ाई को जोड़कर उसका मार्ग प्रशस्त करें।

अंक के आधार पर मूल्यांकन सही नहीं
परिवार के बाद बारी आती हैं, विद्यालय की। घर-परिवार के अतिरिक्त बच्चों के जीवन का दूसरा पहलू उनका विद्यालयी जीवन है। बच्चों को विद्यालय में किताबी शिक्षा की बजाय व्यावहारिक शिक्षा दी जाए, चाहे विषय कोई भी हो। विद्यालय में अध्ययन-अध्यापन द्वारा उसकी अभिरुचि क्षमता, अवलोकन क्षमता का विकास हो और वह असल में कुछ कर दिखाएं। विषयों की लिखित परीक्षाएं बच्चों और अभिभावकों को मात्र अंकों तक ही सीमित कर देती है और अंकों के आधार पर ही उनका मूल्यांकन किया जाता है। अंक भी मूल्यांकन का एक आधार हो किंतु समग्र मूल्यांकन अंकों के आधार पर नहीं होना चाहिए। यदि हमें बच्चों की बौद्धिक क्षमता को उभारना है तो अभिभावकों और अध्यापकों को अंक के आधार पर मूल्यांकन से बचना होगा।
अंकों के आधार पर किए गए मूल्यांकन से बच्चों के भीतर प्रतियोगिता की होड़ उनकी प्रतिभा के नन्हें पौधे को कुचल देती है। मात्र अंक लाना ही बच्चों का ध्येय बन जाता है जो उनके भविष्य में कहीं न कहीं रुकावट ही बनता है और तो और प्रतिभा का यही नन्हां पौधा विकसित तो हो जाता है किंतु एक कमजोर जड़ वाले वृक्ष का रूप धारण कर लेता है जो जीवन में आई छोटी-छोटी समस्याओं रूपी झोंको से भी पस्त हो जाता है। यदि उसकी इसी प्रतिभा को व्यावहारिक शिक्षा और प्रोत्साहन की धूप से पनपाया जाए तो शायद उनका जीवन रूपी यही पौधा एक मजबूत वृक्ष बनें।

बच्चों को सुनना-समझना है जरूरी
हमें चाहिए कि हम उनकी छोटी-छोटी बातों, खुशियों और समस्याओं को साझा करें ताकि उनके भीतर छिपे विचार अभिव्यक्त हो सके और वे एक आत्मसंतुष्टि या सुख का अनुभव कर सके। हमारे नौनिहालों के छोटे से दिल में यही छोटी-छोटी अभिलाषाएं हैं। उनके मासूम हृदय की इन्हीं आशाओं, अभिलाषाओं को पूर्ण करना हमारा दायित्व है। उनकी मासूमियत, नादानियत को बरकरार रखना भी हमारी जिम्मेदारी है ताकि ये जीवन में खालीपन और अकेलेपन से दूर अपनी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकें। आइए क्यों न हम बाल दिवस मनाने के साथ- साथ अपने बाल गोपालों को अपने वर्तमान को आत्मसात कराते हुए उनके बचपन को प्यार, दुलार और भावनात्मक स्मृतियों से सरोबार करें। ताकि बड़ा होकर उसके भीतर वह प्रेम स्वत: ही परिवार के प्रति आकर्षण और जुड़ाव का कारण बने और वह एक ऐसा व्यक्तित्व बने जो भविष्य में आत्मबल, आत्मविश्वास के बलबूते पर वास्तव में सफल जीवन जी सके।