पुष्पलता
किसी व्यक्ति का प्रेम में होना स्वाभाविक और प्राकृतिक बात है। ये हार्मोंस हर किसी में बनते हैं, मगर हर देश की संस्कृति अलग होती है। हमारे देश में खुल्लमखुल्ला किसी को चूमना सही नहीं मानते। सही भी है प्रेम है तो आप अकेले में, घर में जो मर्जी करिए, दूसरों को इसका दिखावा क्यों? वैसे भी प्रेम एक आकर्षण होता है, जो साथ रहने पर उड़न-छू भी हो जाता है। हालांकि मोह, प्रेम, स्नेह, सब अलग-अलग अवस्थाएं हैं। स्नेह सम्मान का प्रदर्शन हो सकता है। अब आप कहेंगे कि प्रेम प्रदर्शन क्यों नहीं हो सकता, जैसा कि एक महिला मित्र ने कहा। प्रेम की अगली अवस्था आप भी जानते हैं, वह उसी प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि स्नेह, सम्मान में ऐसा कुछ नहीं है। सब कुछ खुलेआम होने लगेगा, तो इंसान और पशु में फर्क नहीं रहेगा। सवाल इस बात का है कि यह प्रक्रिया होती कैसे है। गाल छुवाने या चूमने में इतना बुरा भी नहीं लगता। प्रेम के आवरण में लिपटी भूख को छिप कर मिटाइए, वैसे तो हवस की खोपड़ी कभी भरती नहीं, मगर भरने की कोशिश करनी है, तो छिप कर करिए न। खुलेआम करोगे तो हमारे तुम्हारे सबके कम उम्र के बच्चे पढ़ाई लिखाई आदि छोड़ गलत कामों पर लगेंगे।
अमेरिकी राछ्य्रपति ट्रंप ने कहा कि भारत से गंदगी आ रही है। जबकि हवस की गंदगी भारत में अंग्रेजों ने और दुनिया में ट्रंप जैसे लोगों ने फैलाई है। भारत में संयम और मर्यादा को व्यक्ति का गहना और चरित्र माना जाता है, तभी तो हम राम सीता को पूजते हैं। अब आप कृष्ण का नाम लेंगे, वहां हवसखोरी नहीं है, विशुद्ध प्रेम है। जब जो प्रेम बताया तब तो उस प्रेम का देह में अंकुर ही नहीं फूटता, वे तो एक राजकुमार की बाल क्रीड़ाएं हैं। राधा एक काल्पनिक भाव है, उसमें भी वह बच्चे से उम्र में बड़ी हैं। बाद में जिन राक्षस की बीवियों से शादी की, वह सिर्फ नाम के लिए ताकि कोई उन्हें लावारिस समझ हवस का शिकार न बनाए। उन्हें उसकी कैद से मुक्ति दिला कर शरण दी है। यहां स्त्री-पुरुष, पर-स्त्री-पुरुष से प्रेम या आकर्षण हो भी जाए तो उसे जिस्मानी पड़ाव तक ले जाना पाप माना जाता है, क्योंकि शादीशुदा व्यक्ति एक करार में है। पहले उस करार को खत्म करें, फिर चाहे जो करें। अगर बिना करार तोड़े ये करते हैं तो चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष, आप एक घटिया नीच व्यक्ति में गिने जाते हैं। सब जानते हैं आप घर में क्या करते हैं नहीं भी करते तो वे मान लेते हैं कि करते हैं, मगर खुलेआम क्यों? क्या आने वाली मासूम बच्चियों, बच्चों की नस्ल की चिंता नहीं कि वे उम्र से पहले परिपक्व हो जाएंगे।
वहां यही तो हो रहा है। बच्चे पढ़ते-लिखते नहीं, बड़े होते नहीं, हवसखोरी में लग जाते हैं। प्रेम भी शालीनता में उम्र पर सुंदर लगता है। आजकल तो शर्म-हया कहीं रही ही नहीं। नाचती हुई आती दुल्हन बेशर्मी से सबको लाज-शर्म ताक पर रख इशारों पर नचाती है। पुरुष की बराबरी करिए, मगर सिगरेट, शराब, हवसखोरी में नहीं, खुद को किसी मुकाम पर स्थापित करने में, किसी क्षेत्र में उससे ऊपर होकर दिखाइए। गाड़ी चलाइए, जज, डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और आइएस आदि बनिए। तब परिवार भी गर्व करेगा, समाज भी और बच्चे भी। आप कहेंगे, मैं पिछड़ी हूं, कतई नहीं, पूर्ण रूप से आधुनिक हूं, मगर आधुनिकता की परिभाषा जानती हूं। आप कुछ भी पहनिए, कुछ भी करिए, बस उससे दूसरे की भावनाएं, समाज की शालीनता और परिवार की गरिमा आहत नहीं होनी चाहिए। वह ऊंची गरिमा आप खुद गढ़िए। गांव वालों ने भी समय बदला, तो बिना सिर ढके आई दुल्हन भी स्वीकार कर ली है। बदल तो दोनों पक्ष रहे हैं मगर उतावला पन क्यों?
स्त्री आज दोराहे पर खड़ी है। पुरुष अय्याशी पर उतारू, स्त्री मर्यादा में जकड़ी। उसे रोके तो चुड़ैल घोषित, न रोके, उसके नक्शेकदम पर चले, तो बदमाश कुलटा। अब देवी तो वह बनेगी नहीं, जिसे पत्थर बना कर पूजो या तो खुद को रोकिए या खुली छूट अपना कर घर, समाज, परिवार पाश्चात्य संस्कृति जैसा बनाइए। बच्चों के शोषण बहुतायत में होते हैं वहां सब चंगा-चंगा नहीं है। यद्यपि परिवर्तन किसी के रोके रुकेगा नहीं, मगर पीने का पानी तो छान सकते हैं। भारत की गंगा तो अपने देश में बह रहे नाले के बलात्कारों से ही मैली हो गई और किसी को क्या दोष दें!
ग्रामीण स्त्री की एक जोड़े को खुलेआम मेट्रो में चुंबन करते हुए डांटने का वीडियो वायरल हुआ है। उससे इस विषय पर एक नई बहस की शुरुआत हो गई। दरअसल, हम ग्रामीण व्यक्ति को कमतर मानते हुए उसे कम समझ-सोच लेते हैं, जबकि उसकी समझ, अनुभव हमसे कहीं ज्यादा बेहतर और दूरदर्शी होती है। एक दिन हमने भी मॉल में सीढ़ियों पर ऐसा दृश्य देखा, तो मेरी ननद उन्हें लताड़ने चल दी। मैंने रोका, वह बोली, मुझे तो ये मेरे वाले बच्चे दिख रहे हैं। वे किसी तरह मैंने रोक ली कि ये दृश्य आम हैं, आदत डाल लो, छोड़ो। नाबालिग बच्चे अच्छा-बुरा नहीं समझते, उन्हें बताना पड़ता है। हम किसी की स्वतंत्रता का हनन क्यों करें? मगर यही सोच तो सबको गलत रास्ते पर स्वछंद छोड़ रही है।
अब अनेक ऐसे जोड़ों में शादी के एक हफ्ते बाद पति-पत्नी से बोर हो जाता है, क्योंकि वह एक नए जिस्म के अलावा कुछ नहीं थी, अब और नया चाहिए। वह इस सब से गुजर चुका होता है। प्रेम कहां है, यह अलग विषय? प्रेम दरअसल, एक काल्पनिक अवधारणा है, जो लुभाती है। वह हमारे दिमाग की कल्पना की कोठरी में सोई है, सामने वाले व्यक्ति में नहीं है, फिर जब नहीं मिलता तो हम उसे कोसने लगते हैं। वह गलत था, वह तो वैसा ही था जैसा है हमारी अवधारणा उसके विषय में हमने अपने हिसाब से गढ़ ली थी।
बड़ी पीढ़ी को संयम का परिचय देते हुए अगली पीढ़ी संभालनी होती है, यहां तो बूढ़े- बूढ़ी ढसर रहे हैं, जो आपकी काल्पनिक अवधारणा का प्रेम है, उसे करिए कोई नहीं रोकता। मगर याद रखिए, काल्पनिक चीजें कल्पना में ही चलती हैं। प्रत्यक्ष में अपना कर आप बदमाश, मक्कार, दिलफेंक रसिया आदि का तमगा लोगे। आप समाज की परवाह करो न करो, वह आपकी परवाह करना आपको सही करना, सबक देना छोड़ेगा नहीं। समाज में रह कर उससे कट नहीं सकते। आखिर आपके बच्चे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। अगर आपके बच्चे मेट्रो में या अन्य सार्वजनिक स्थल पर ये करते हैं तो सिर्फ बेटे नहीं, बेटियां भी करेंगी। अगर आपको इससे दिक्कत नहीं, तो इसका मतलब आपको अभी इसके परिणाम पता नहीं। दूरदर्शिता से सोचिए बेटी किसी से मानसिक रूप से जुड़ी फिर कचरे की तरह फेंकी गई तो प्रत्युषा की तरह आत्महत्या करेगी, तब आप रोएंगे, जबकि जिम्मेदार कौन है? आप बेटे के बारे में सोचेंगे कि मौज-मस्ती करने दो, हम तो कर नहीं पाए और बेटियों के बारे में सुनते ही आॅनर किलिंग पर उतारू। आपकी नाक तब जड़ से कट जाए! ये आंख और नाक इतनी दोगली क्यों हैं। जो बोओगे वही काटना पड़ेगा। जो चाहोगे, वह देना भी पड़ेगा।

