सुरेश सेठ
सत्ता पक्ष, विपक्ष से नाराज हो जाता है, क्योंकि विपक्ष उसके तले से कुर्सी खींचने की फिराक में लगा रहता है। कुर्सी नहीं खिंच पाती, तो सत्तारूढ़ दल के नेता विपक्षियों पर फिकरा कसते हैं कि ‘उन्हें जुकाम हो गया था, हमने उतार दिया।’ विपक्षी बहुत भन्नाते हैं और तब तक भन्नाते रहते हैं, जब तक कि जुकाम शर्मिंदा होकर उनसे रुख्सत नहीं ले लेता। राजनीति की छीछालेदर और एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकने की यह आदत कोई नई बात नहीं। एक-दूसरे की टोपी उछालने के लिए ऐसे-ऐसे जुमले उछाले जाते हैं, बेबुनियाद बातों के कीचड़ से एक-दूसरे को रंगा जाता है कि अगर शिकार जाल में फंस जाए तो खुद ही परेशान होकर अपनी किस्मत का बिस्तर बांध लेता है। जमानत तो उसकी चुनाव परिणामों के बाद जब्त होती है। वह तो पहले ही महाप्रयाण के रास्ते पर चल दिया। जाते-जाते अपना कोई वंशज अवश्य कुर्सी की टोह में भिड़ा गया। राजनीति में जिंदा रहना है, तो अपनी चमड़ी मोटी करके गैंडे जैसी बनानी होगी। जब चमड़ी का यों रूपांतरण हो जाए, तो नेता को हरदम सुमरिणी की माला पर एक ही सूत्र वेद वाक्य जैसा बार-बार जपना होगा कि ‘हे तात, कोई मरे या जिए सुथरा घोल पतासा पिए।’
पूछिए, आज की राजनीति में अपने लिए कुर्सी की छीन-झपट में लगे हुए यह सुथरा साब कौन है? सुथरा यानी कि उजले झक्क सफेद कपड़े पहने हुए एक भद्र पुरुष, जिन्होंने एक मक्खी भी कभी नहीं मारी। अब अपनी राजनीति से अपनी उपलब्धियों के बखान से आम आदमी के लिए जन-कल्याण के लिए मक्खियों की ऐसी सौगात पेश कर रहे हैं कि जिनकी साफ-सफाई के लिए स्वच्छ भारत का कोई नारा पर्याप्त नहीं। इस स्वच्छ भारत ने उनकी टहनियों पर न जाने कितने फूल उगा दिए, लेकिन नतीजे में कूड़े के ढेर और बढ़ गए। बेशक इससे उनके भाषणों को मीडिया में शीर्षक मिल गए।
झाड़ू टोकरा लेकर अपने अनुयायियों के साथ स्वयं सफाई अभिनय पर वे निकले थे, तो प्रेस फोटोग्राफरों को अपने युग का मसीहा होने का एहसास देने के साथ पोज देने में थकते नहीं। ऐसे चित्र जब छपते, तो उनके साफ-सुथरा होने का एहसास देते। यह प्रशंसकों की करतल ध्वनि पर सवार होकर सत्ता का बताशा घोल कर पी जाता है। साल-दर-साल, चुनाव-दर-चुनाव, जब इस विजयश्री का सेहरा बांधने से उसकी उम्र अघा जाए, तो इसे अपने वंश की विरासत बना दीजिए। उनके भाई-भतीजे जब इन्हीं कुर्सियों पर अपने चमकते हुए चेहरे लेकर बैठ जाते हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने अनुदान और कल्याण के बताशे अपने परिवार तक सीमित करके परिवार की गरिमा को स्थापित करने का पुण्य कार्य कर दिया।
जनता का क्या है, वह पहले भी कूड़े के ढेर में पड़ी थी, आज भी उसी ढेर में पड़ी है। वह दिन-प्रतिदिन इतनी निश्चल होती जा रही है कि अब तो करवट भी नहीं बदलती। हां, जब उनकी रैली के नेतागण भाड़े की रैलियां आयोजित करते हैं, या अपने विजयश्री वरण की शोभायात्राएं निकालते हैं, तो उनके नारों या जयघोषों के स्वरों से ठहरा हुआ माहौल मिल जाता है। फिर जब कारवां निकल जाता है, तो उनके लिए बाकी रह जाता है, वही गर्दोे-गुबार, जिसे फांकते हुए मौसम बदलने के साथ वह किसी और महामारी के फूटने का इंतजार करते हैं।
गर्मी थी, बारिश थी, तो उनको मिली थी डेंगू मच्छरों से फैलती डेंगू मलेरिया की ऐसी सौगात, जिसमें आदमी के प्लेटलैट्स कम हो जाने की घोषणा डॉक्टरों की दुकानदारी को असीम संतोष दे जाती है, और डेंगू मशीनों को बिगड़े रहने का संदेश। नगर पिता, जो हर बार अपनी जीत दुहरा सकने की ताकत के साथ नगर पितामह बन चुके हैं, तब दुहरा देते हैं कि इस बार हमने डेंगू का मुकाबला करने की पूरी तैयारी कर ली है। ‘अब की बार न डेंगू रहेगा, और न उसका मलेरिया।’ नारे से गदगद होने के बावजूद किसी निजी अस्पताल के भारी बिल से आक्रांत इलाज करवाने आया मरीज सोचता है कि यह बात उसने बारिश के दिनों में भी सुनी थी, जबकि उनके भद्र नेता जी ने फरमाया था कि इस बार सफाई, सीवरेज की व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है। बारिश थोड़ी देर हो या लगातार, अब कोई जल प्रलय नहीं होगा। सड़कें छप्पड़ों में तब्दील नहीं होंगी। अजी, होतीं भी कैसे, जब बरसात की पहली धमकी के साथ सड़कें गड्ढों में तब्दील हो गर्इं। जब उनका वजूद ही नहीं रहा, तो क्या उनका छप्पड़ बनेगा और क्या उनमें डोंगी चलेगी। चलेगा, तो वही अनचाहे जल-थल का सिक्का, और उससे त्रहिमाम करता आम आदमी।
बारिश आई और डेंगू मलेरिया दे गई। मौसम पलटा, वह रुख्सत हुआ, तो स्वाइन फ्लू अयाचित मेहमान की तरह, हमारे घरों पर दस्तक दे रहा है। अब फिर मौसम बदलने और सर्दी घटने का इंतजार कीजिए, ताकि इस मृत्यु संदेश जैसी बीमारी से आपको निजात मिले। वाह साब, यह मौसम की परिक्रमा न हुई, घरेलू डॉक्टर हो गया, जिसके आने और जाने से भयावह महामारियां प्रवेश की इजाजत लेती हैं और विदा मांगती हैं।
इस बीच कोई महामना इनकी गिरफ्त में आ जाए, तो उनके प्रशंसक कह देते हैं, अहा! कितना त्याग। जनसेवा के लिए घोर परिश्रम किया तभी तो इसकी पकड़ में आ गए। उधर विपक्षी कहता है, क्यों घबराते हो। मात्र जुकाम है। आएगा और चला जाएगा। उनकी परिचर्चा के लिए डॉक्टर सिर के बल खड़े हैं, और दवाइयों या फलों से भरी सम्मान डालियां इंतजार करती रहती हैं।
बाहर कूड़े के ढेर के साथ बने खाली सरकारी अस्पताल में मरीजों की भीड़ मौसम बदलने का इंतजार करती है। मौसम बदले और रोग विदा हो। हर बार ऐसा ही होता है। खाली अस्पतालों में ताला झूलती सस्ती दवा की दुकानों के बीच संत्रस्त लोग मौसम बदलने और रोग की विदाई का इंतजार करते हैं। तकनीकी शब्दावली में इसे प्राकृतिक चिकित्सा कहते हैं।

