निशा नाग
गजल की रूप-विधा और इसके हिंदी से जुड़ने की कथा-गाथा में दो विभिन्न मत दिखाई देते हैं। एक वह, जो गजल को उर्दू फारसी की विधा के रूप में देखता है और हिंदी की गजल को गजल नहीं मानता। दूसरा मत अमीर खुसरो के फारसी और हिंदवी या रेख्ता के मिलेजुले प्रयोग से जोड़ कर हिंदी गजल की एक सुदीर्घ परंपरा मानता है। हिंदी गजल के संदर्भ में अक्सर यह कहा जाता है कि यह विधा हिंदी में आकर कुछ और ही हो गई है या हिंदी गजलकारों को रदीफ, काफियों की कोई समझ नहीं है। हिंदी गजल निरंतर प्रश्नों के घेरे में रही है।
दूसरी ओर हिंदी गजल के क्षेत्र में स्त्रियों की उपस्थिति कम मिलती है। पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक, शैक्षिक संरचना स्त्री लेखन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। आज भी देश की ज्यादातर लड़कियों की पढ़ाई दसवीं-बारहवीं तक छूट जाती है। यह सही है कि केवल किताबी ज्ञान लेखन का अनिवार्य आधार नहीं है। जैसे स्त्री और पुरुष की अभिव्यक्ति कथ्य अनुभव शैली में फर्क है वैसे ही उनकी अभिव्यक्ति के खतरों में भी अंतर है। स्त्री के लिए अभिव्यक्त एक चुनौती है।
औरतों के विषय में अक्सर कहा जाता है कि वे बोलती बहुत हैं, लेकिन कहती कम हैं। यहां तक कि अपने निकट से निकट संबंध में भी वे अपने को नहीं खोलतीं। कहानी, उपन्यास, कविता के क्षेत्र में महिलाओं ने उल्लेखनीय कार्य किया है, पर इनमें एक अन्य क्षेत्र भी है, जो शायद पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में ही अधिक रहा है, वह है गजल का।
महिलाओं द्वारा रची जा रही गजलों का सामान्य विषय लगभग वही है, जो पुरुषों के हैं, जैसे वर्तमान व्यवस्था, आम आदमी की तकलीफ, हादसे, असंतोष, तनाव भरी जिंदगी की कशमकश, बाजारीकरण और बाजारवाद की मार झेलता समाज। हां, यह जरूर है कि उनमें आशिक-माशूक के किस्से कम मिलते हैं, जो हिंदी गजल का हिस्सा हैं भी नहीं। अलबत्ता प्रेम का इजहार कई रूपों में और कई तरह से है। स्त्रियों के संबंध में एक अन्य शैली भी मानी जा सकती है, वह है उनकी अपनी पीड़ा।
काल, परिवेश, बौद्धिक-स्तर और रुचि से इसके भेद देखे जा सकते हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या पुरुषों का गजल क्षेत्र और स्त्रियों का गजल क्षेत्र अलग-अलग है? स्त्री-पुरुष के मध्य जिस अंतर की बात निरंतर की जाती रही है, वह स्त्री विमर्श में बार-बार दोहराई गई है। अमेरिकी लेखक और संबंध सलाहकार जॉन ग्रे ने 1990 के दशक में एक किताब लिखी थी ‘मेन आॅर फ्रॉम मार्स, वीमेन आर फ्रॉम वीनस’, जिसके अनुसार स्त्री और पुरुष दोनों के स्वभाव प्रकृतया अलग-अलग हैं। इससे लगभग चालीस साल पहले सिमोन दी बोउवार की पुस्तक ‘सेकेंड सेक्स’ फेंच से अनूदित होकर दुनिया के व्यापक हिस्से में आ चुकी थी। 1990 में स्त्री विमर्श की दूसरी लहर के रूप में सिमोन का यह वाक्य ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है’ सूत्र वाक्य के रूप में अपनाया जा चुका था। होने और बनाए जाने में अंतर होता है। यह देखने से ही ज्ञात हो जाता है कि स्त्रियोचित व्यवहार सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है। प्रत्येक समाज में उसकी अवधारणा अलग-अलग होती है। लेकिन वह इस बात में हर जगह समान है कि पुरुष की तुलना में वंचित और अन्यायग्रस्त है। गजल में भी महिलाओं ने अपनी इस पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। ‘क्या कहें किसका नाम है औरत/ दर्द का इंतकाम है औरत/ देश आजाद और आप भी आजाद/ और अब तक गुलाम है औरत।’ (रचना शुक्ला)
पहले तो पूरी सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक बुनावट स्त्रियों को अनुभव संपन्न होने से रोकती है तथा स्त्री के स्वतंत्र रूप से विचार रखने में भी बाधक बनती है। दूसरा घर-परिवार और बच्चों की अंतहीन जिम्मेदारी हमेशा से स्त्री का क्षेत्र माना गया है। स्त्री हालांकि अपनी बुनावट में ही परिवार चाहती है, पर यह चाहत उसके लिए बाधक भी बनती है। ‘मैं औरत हूं ये फितरत है मेरी/ मैं अपना घर बसाना चाहती हूं… मैं संजीदा बहुत हालात से हूं/ मगर अब मुस्कराना चाहती हूं।’(सादिका ‘सहर’)
घर-गृहस्थी के इस अंतहीन चक्र में फंसी भारतीय स्त्री का अपना समय शायद कोई भी नहीं। यह समाज का कटु सत्य है कि स्त्रियों से ही घर और परिवार में सांमजस्य बिठाने की उम्मीद की जाती है और वे बिठाती भी हैं। अपनी आजादी, सपने, स्वास्थ्य और महत्त्वाकांक्षा सभी कुछ को दांव पर लगा कर स्त्रियां घर को बनाए रखती हैं। ‘छोड़ना भी जिसे था कठिन, साथ रखना भी जो था कठिन/ हम ही टूटे, हम ही ढले, ऐसे ही रिश्ता निभाना पड़ा।’ (उषा राजे सक्सेना)
स्त्रियों के प्रज्ञा चातुर्य, उनकी समझ और बुद्धि को लेकर पितृसत्तात्मक समाज अक्सर सवाल उठाता रहा है। अनंत काल से यह सिलसिला चल रहा है। इसे नकारते हुए देखा जा सकता है कि एक स्त्री जितना ही विस्तार पाती है, उतना ही उसने हालात को पैनी नजर से देखने की शक्ति पैदा होती है। ‘बात सुनिए, समझिए हकीकत है क्या/ देखिएगा कहीं ये हवा तो नहीं।’ (मंजुश्री प्रीति) इसी तरह- ‘दिखाते हैं जो आईना दूसरों को/ उन्हें उनकी सूरत दिखा कर तो देखो/ हमेशा किया अपने घर को रोशन/ गरीबों का चूल्हा जला कर तो देखो।’ (नसीमा ‘निशा’)
राजनीतिक दलों का मर्दवादी चरित्र और अपराधियों और सत्ता का गठबंधन है। आजकल राजनीति और हमारे सामाजिक जीवन में हलचल, शोर-शराबा और उछल-कूद बहुत है। उसकी खंरोंच गजल विधा पर तो लगेगी ही। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि गजल का अपना मिजाज खामोशी से बात करने का है। वह छोटे मुंह बात करती है। बड़े मुंह से अक्सर छोटी बातें की जाती हैं। महिलाओं द्वारा लिखी गई गजलों में यह विशेषता खास दिखाई देती है। ‘जिदगी मौसम बदलती ही रही/ साथ दे वैसा कभी मौसम न था।’ (सुषमा अय्यर)
स्त्रियों की हक की लड़ाई बेहद गंभीर मसला है। तिरस्कार और यंत्रणा को सहते हुए औरतें अपने हक की लड़ाई खुद लड़ रही हैं। बहुत सारी स्त्रियों के लिए बंद किवाड़ आज भी नहीं खुले हैं। ‘घर के हालात और मौके की नजाकत देख कर/ होंठ सी लेती है मां बच्चों की सूरत देख कर।’ (इंदु श्रीवास्तव)
संस्कृति और जीवन में जो कुछ भी श्रेष्ठ है उसमें मूल्यों, भावों, विचारों और संवेदनशीलता का योग है। पर ताकत की कू्ररता इसे नष्ट कर स्त्रियों के जीवन में एक निरीहता और उदासी रोप देती है। ‘बला की चुप्पियां हैं और हम हैं/ अंधेरी बस्तियां हैं और हम हैं।’ स्त्रियां समाज और जीवन की वास्तविक सच्चाई को स्मृतियों के बिंबों में संजोती है, रचती है, वह जीवन का उत्कट यथार्थ है। ‘चाहती हूं मैं मिटा दूं हर नए हर अक्स को / लौट कर रह रह के फिर आ जाती हैं परछाइयां।’ (देवी नागरानी)
एक स्त्री के लिए अनुभवजन्य सत्य लिखने में मान-मर्यादा का खतरा रहता है। स्त्री विमर्श के तमाम दौरों में जिस किसी ने भी अपने जिए अंतरंग सत्य को लिखा, उसे प्रसिद्धि पाने का सस्ता माध्यम घोषित किया गया। हो सकता है इसमें कुछ हद तक स्त्रियों की अतिवादिता भी रही हो। ऐसे में गजल जैसे माध्यम में स्त्रियां जिस तरह से अपने जिए गए सत्य को खोलती रही हैं, वह काबिले-गौर है- ‘सिर्फ आंखों से पढ़ नहीं सकते/ दर्दे दिल है कोई किताब नहीं।’ (मृणालिनी धुले)
एक स्त्री जितना ही विस्तार पाती है उतना ही उसमें हालात को पैनी नजर से देखने की पैनी नजर पैदा होती है। विविध गजलों में औरतों का यह नजरिया देखने को मिलता है। यह भी औरतों को ही तय करना है कि किस तरह इस बढ़ते हुए समाज में उनका दखल हो। जीने और सम्मान के हक की खातिर स्त्री अब उस तरह के समझौते नहीं करना चाहती है। ‘उसकी आंखों का काजल यह कहता है/ उसकी आंखों में एक सपना रहता है।’ (नमिता राकेश)
वर्तमान समय की लगभग सभी समस्याएं गजल का विषय बन कर आई हैं। स्त्री को बाजार के उत्पाद के समकक्ष लाकर रखने का विरोध सुषमा भंडारी इस तरह करती हैं ‘टूट जाते हैं टांके मेरे जख्मों के/ इश्तेहारों में जब भी समाती हूं मैं।’ बाहरी चकाचौंध ने मनुष्य के व्यवहार को आडंबर से भर दिया है आज सपने खरीदे जाते हैं और वह बिकाऊ भी हैं। ‘डिगरी की फसलें उगी हैं/ भूख से है बाजार भरा/ कुछ की चाहत बहुत ज्यादा है कुछ को केवल ठौर चाहिए।’ (निरंजना जैन)
स्त्रियों द्वारा लिखी हिंदी गजलें इस बात का प्रमाण हैं कि स्त्रियां अपने वजूद को लेकर जागरूक हो रही हैं। उनके भीतर कहीं बहुत गहरे विचार, आजाद खयाल पैदा हो रहे हैं। भीतर ढेर सारे जज्बात उभर रहे हैं। धड़कनों में बवंडर उठ रहे हैं। इस बार उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय मुकाबला करने का मन बना लिया है। एक औरत की जिंदगी में कई तरह की लघु अस्मिताएं मौजूद होती हैं और ये तमाम अस्मिताएं एक स्त्री की दुनिया रचती हैं।
