कविता : लगे सोचने

दिविक रमेश

बिस्तर पर लेटे मुन्ना जी
लगे सोचने।
कितना प्यारा बिस्तर मेरा
लगे सोचने।
उठने को जी कभी न करता
लगे सोचने।
इस पर बैठूं, इस पर लेटूं
लगे सोचने।
काम करूं बस बिस्तर ही पर
लगे सोचने।

तभी लगा ज्यों बिस्तर बोला
लगे सोचने।
मां की-सी आवाज में बोला
लगे सोचने।

बिस्तर पर ही पड़े रहोगे
कब तक मुन्ना?
मुझको भी आराम चाहिए
समझो मुन्ना।
अगर हमेशा रहोगे चिपके
सच कहता हूं
डर है तुम बीमार पड़ोगे
सच कहता हूं।

अरे बात तो सच बिस्तर की
लगे सोचने।
मां कहती जो बिस्तर बोला
लगे सोचने।

शब्द-भेद: कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

रुख / रूख
मुंह, चेहरा, मनोभाव, मन:स्थिति, तरफ, सामने आदि का पर्याय है रुख। मगर जब र पर यही मात्रा दीर्घ हो जाती है, तो उसका अर्थ बदल जाता है। रूख का अर्थ है पेड़, वृक्ष।

अंगनाई / अंगड़ाई
आंगन को ही अंगनाई भी कहते हैं। पुरानी शैली के घरों में आंगन जरूर हुआ करता था। जबकि अंगड़ाई शरीर की वह क्रिया है, जिसमें धड़ और बांहें कुछ समय के लिए तनती या ऐंठती हैं। प्राय: सोकर उठने के बाद या आलस्य में ऐसा होता है।