महेश आलोक
और देखो वह तमाम शहरों का चक्कर लगा कर
हवा के साथ लहरों के साथ
चिड़िया के मुंह में पड़े हुए दानों बीजों के साथ
उतर आई है पृथ्वी के स्वप्न को हकीकत में
बदलती हुई
उसकी नग्नता को हरे वस्त्रों से ढकती हुई
उसके शरीर को मखमली बनाती हुई
उसे इतना प्रसन्न बनाती हुई कि ओस को
क्षणभंगुर होने से
बचा सके
पृथ्वी चाहती है मनुष्यों के अतिक्रमण से
बची हुई जमीन
ढंक जाए इतनी हरीतिमा से कि पशुओं को मरने
से बचाया जा सके
उनके सपने इतने हरे भरे हों कि थनों में उतरा हुआ दूध
बच्चों के सपनों को और उर्वर बना सके
चिड़ियों को घोंसला बनाते देख उसे
कितनी खुशी मिलती होगी
इसका अनुमान सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि
वह विनम्रता में इतना झुक जाती है
कि विनम्रता को अपना अर्थ विस्तार करने में
जरा भी संकोच नहीं होता
एक राजा ने उसे रोटी बना कर खाया और बच गया
एक पथिक ने उसे बिस्तर बनाया और बच गया
उसके पास इतना जीवन है कि तमाम कीट पतंगे
उसे ही मानते हैं ईश्वर
गरीब की बरौनियों जितना उसका मुलायम शरीर
छप्पर बन कर उसकी हैसियत इतनी बढ़ा देता है
कि किसी कठिन समय में र्इंट कंकरीटों के
बड़े घर वाले भी
पा लेते हैं उसमें आश्रय
इन सबके बावजूद अपनी पैदाइश
के समय से ही निरंतर कुचली जाती वह
अंतत: उठ खड़ी होती है
क्रूरता को तहस नहस करती हुई
वह जितनी छोटी है उसका कद उतना ही बड़ा है
मनुष्य के कद को उससे भी
छोटा करता हुआ
घाट हैं बहरे
कहां डूबें कहां तैरें
नदी के दो पाट हम तुम
पाट हैं छिछले
पुतलियों में रात थर थर कांपती है
पथ जहां पर मुड़ रहा था एक कंकड़ था वहीं पर
गड़ रहा था
खुशबुओं की आंख नम है। अब नदी की सांस में तारे
सहमकर जल रहे हैं। कौन जाने कौन किसको
छल रहा है
अब अंगीठी बुझ चुकी है। जले कंडे की धुंआती
गंध में कोई
हवा-सा गल रहा है। सिसकियों में रात थर थर
कांपती है
कहीं कोई नाव जर्जर हांफती है
कहां टूटें कहां बिखरें
नदी के दो घाट हम तुम
घाट हैं बहरे
और उन पर हैं हरी पर काइयां हैं
संभल के साथी अरे!
बिछले

