किरण सिंह
गोलू मोलू बबलू डबलू खेल रहे थे बॉल
आईं आंटी बीच में तो उड़ गई उनकी शॉल
गोलू मोलू हक्का – बक्का बबलू थे आवाक
होकर आंटी आग बबूला लगीं दिखाने आंख
डबलू कान पकड़ कर बोला कर दो आंटी माफ
हम न करेंगे फिर से गलती कर लो दिल को साफ।
पिघल गया दिल आंटी का पर बोलीं यूं मत खेल।
पढ़ो लिखो मन से वर्ना सब हो जाओगे फेल ।
तभी अचानक गोलू मोलू लेकर आए शॉल।
बोले अब से कभी न छत पर हम खेलेंगे बॉल।
