आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार और अनुवादक थे। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गांव में हुआ था। उनके पिता प्रतिष्ठित राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) थे और उनकी नियुक्ति मीरजापुर में थी। इसी वजह से उनका पूरा परिवार गांव से उठ कर मीरजापुर में जाकर बस गया। रामचंद्र शुक्ल महज नौ वर्ष के थे तब उनकी माता का निधन हो गया। इसका उनके मन पर गहरा असर हुआ था।
रामचंद्र शुक्ल की प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई घर में ही संपन्न हुई। घर आने वाले शिक्षक से ही उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा का ज्ञान प्राप्त किया था। बड़ी कक्षा की पढ़ाई के लिए मीरजापुर के एक स्कूल में दाखिला लिया। मीरजापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। आगे की पढ़ाई के लिए वे इलाहाबाद आ गए। रामचंद्र शुक्ल के पिता चाहते थे कि वे भी कानून की डिग्री हासिल कर वकालत करें। लेकिन रामचंद्र शुक्ल की रुचि वकालत में तनिक भी न थी। उनका मन साहित्य में रमता था। इसका परिणाम यह हुआ कि वे एलएलबी की प्रवेश परीक्षा में ही फेल हो गए।
शिक्षक के रूप में नौकरी
सत्रह साल की उम्र में उनकी एक कविता और ‘प्राचीन भारतीयों का पहिरावा’ लेख हिंदी में और अंग्रेजी में ‘वाट हैज इंडिया टू डू’ लेख प्रकाशित हुआ था। 1903 से 1908 तक उन्होंने ‘आनंद कादंबिनी’ पत्रिका के सहायक संपादक के रूप में कार्य किया। 1904 से 1908 तक मीरजापुर के लंदन मिशन स्कूल में कला अध्यापक के रूप में नौकरी भी की। यह वही समय था जब उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे।
1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें ‘हिंदी शब्दसागर’ के सहायक संपादक का कार्यभार सौंपा, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक नियुक्त किया गया। वे इस पद पर 1937 तक रहे।
निबंधकार
रामचंद्र शुक्ल प्रख्यात निबंधकार भी थे। 1939 में उन्होंने ‘चिंतामणि’ लिखी, जो काव्य की व्याख्या करने वाला निबंधात्मक ग्रंथ है। इसके अलावा उन्होंने कुछ अन्य निबंध भी लिखे हैं, जिनमें मित्रता, अध्ययन आदि शामिल हैं। निबंधों के साथ उन्होंने ऐतिहासिक रचनाएं भी की। इसमें ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ उनका अनूठा ऐतिहासिक ग्रंथ है। उन्होंने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया।
प्रमुख कृतियां
उनकी अनूदित कृतियों में ‘शशांक’ बांग्ला से अनूदित उपन्यास और अंग्रेजी से ‘आदर्श जीवन’, ‘मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन’, ‘कल्पना का आनंद’ आदि अनूदित रचनाएं प्रमुख हैं। आचार्य शुक्ल ने एडविन अर्नोल्ड की ‘द लाइट आॅफ एशिया’ का ‘बुद्ध चरित’ और जर्मन विद्वान अर्नस्ट हेकेल की प्रसिद्ध कृति ‘द रिडल्स आॅफ यूनिवर्स’ का ‘विश्व प्रपंच’ नाम से अनुवाद किया। संपादित ग्रंथों में हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार, सूर, तुलसी, जायसी ग्रंथावली उल्लेखनीय हैं। हिंदी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात उन्हीं द्वारा हुआ। हालांकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल नियमित कहानीकार नहीं थे, इसके बावजूद उन्होंने हिंदी में लंबी-लंबी कहानियां लिखीं। उनकी रचनाएं को आज भी हिंदी के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाती हैं।
निधन : हृदय गति रुक जाने से उनका देहांत हो गया। 1972 में उनके नाम पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान की स्थापना की गई।
