सुमन बाजपेयी
कक्षा में बिलकुल सन्नाटा छाया हुआ था। यह बहुत ही आश्चर्य की बात थी, क्योंकि सातवीं कक्षा के बच्चे पूरे स्कूल में अपनी शरारतों के लिए प्रसिद्ध थे। एक तरफ जहां वे स्कूल में होने वाली हर गतिविधियों में हमेशा आगे रहते थे, वहीं दूसरी ओर हर तरह की गड़बड़ी के जिम्मेदार भी वही ठहराए जाते थे। यह बात अलग थी कि कई बार अन्य कक्षाओं के छात्र उनकी आड़ में शैतानी कर स्वयं बच जाते थे और बिना कसूर सातवीं कक्षा को सजा भुगतनी पड़ती थी। कहते हैं न बद से बदनाम बुरा।
सातवीं कक्षा में इस समय पूरी तरह खामोशी थी और उनके क्लास टीचर श्रीमान दूबे जी उन्हें जोर-जोर से फटकार रहे थे। वजह भी उचित ही थी, क्योंकि उन्हीं की कक्षा के किसी बच्चे ने अपने ही कक्षा की चीजें गायब करनी शुरू कर दी थीं। अभी इस बात का पता नहीं चल पाया था कि ऐसा चोरी के खयाल से किया गया था या शरारत ही थी कोई। घंटी बजने के बावजूद सारे बच्चे आज बैठे रहे, और दिनों की तरह उन्होंने हल्ला नहीं मचाया। असल में इस कक्षा के छात्र चाहे कितने भी शरारती क्यों न हों, पर किसी की चीजें गायब करना या तंग करके किसी का दिल दुखाना इस कक्षा की परंपरा के विरुद्ध था।
‘अनुराग, यह बात तो गलत हुई है।’ संजय ने क्लास मॉनिटर से कहा।
‘यही तो मैं सोच रहा हूं कि आखिर अनुज का पेन किसने चुराया है। उससे पहले माधुरी का स्केल गायब हो गया था। अपनी कक्षा में ऐसा कोई नहीं है, जिसे चोरी करने की आदत हो और फिर ऐसा हुआ भी पहली बार है। कहीं किसी और क्लास के बच्चे ने तो…’
‘नहीं, यह संभव नहीं है…’ रुचि ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘हमारी कक्षा के छात्र के अलावा किसी को कैसे पता होगा कि माधुरी स्केल कहां रखती थी या अनुज के पास इतना कीमती पेन था और वह कल ही तो पहली बार स्कूल लाया था।’
रुचि की बात सभी को ठीक लगी। इस घटना के बाद कक्षा में शरारतें तो कम हुर्इं ही, साथ ही बच्चे अपनी चीजों के प्रति अधिक सतर्क रहने लगे, पर फिर भी एक दिन नेहा के बैग से पेंसिल बॉक्स गायब हो गया। सभी बहुत परेशान हो गए। रघु के अजीब व्यवहार के कारण अनुराग को उस पर कुछ शक हो रहा था, पर बिना प्रमाण के रघु जैसे हमेशा फर्स्ट आने वाले होशियार लड़के पर आरोप लगाना उचित नहीं था।
कुछ दिनों बाद दूबे जी ने घोषणा की कि दशहरे की छुट्टियों से पहले एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करना तय किया गया है। छात्रों में कुछ न कुछ करने की होड़-सी लग गई। कोई कविता पढ़ना चाहता था, कोई वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहता था, कोई गीत लिख रहा था। ‘क्यों न हम कोई नाटक तैयार करें, जिसमें राम-रावण के युद्ध के प्रसंग से लेकर उसकी मृत्यु दिखा कर मंदोदरी का विलाप तथा कुंभकरण, मेघनाद और रावण के पुतले जलाने का भाग प्रस्तुत करें।’ अनुराग ने सुझाव दिया।
सब उसमें जुट गए। संवाद लिखे गए, पात्रों का चयन किया गया और जोर-शोर से अभ्यास शुरू हो गया। राम के लिए अनुराग को चुना गया। बलिष्ठ देह वाले रघु को रावण बनाया गया, तो हमेशा नींद में रहने वाले मोहन को कुंभकरण बना दिया गया। अभ्यास के दौरान रघु उसे थोड़ा खोया-खोया सा लगा। वह जानता था कि माता-पिता न होने के कारण वह चाचा-चाची के सहारे पल रहा है और बहुत-सी चीजों के लिए तरसता रहता है।
नाटक के मंचन में राम-रावण का युद्ध दिखाया गया और राम को रावण का वध करना पड़ा। तब मंदोदरी का प्रवेश होता है, ‘हाय… स्वामी, यह क्या हो गया? एक मानव आपकी हत्या कैसे कर सकता है? आपके क्रोध के समक्ष तो कोई टिक नहीं सकता था। राम कोई साधारण मानव नहीं हैं, बल्कि स्वयं विष्णु के अवतार हैं। आपने सीता के मोह में अपना नाश कर डाला। आपको राम ने नहीं, वरन आपके अहंकार और पाप ने मारा है।’
रुचि के विलाप से दर्शकों की आंखों में आंसू आ गए और मृत रावण के रूप में लेटे रघु की आंखें भी बरसने लगीं। दृश्य बदला और पुतले जलाने का मंचन किया गया। पर्दा गिरने के साथ ही मंच पर
स्वर उभरे-
‘असत्य पर सत्य की विजय
अधर्म पर धर्म की विजय
विजयदशमी का यही सच है।’
तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा। रघु बहुत बेचैन दिख रहा था। दूबे जी जब कक्षा में सबको सफल नाटक मंचन की बधाइयां दे रहे थे, रघु की आंखों से आंसू बहते देख उन्होंने पूछा, ‘तुम्हें क्या हुआ?’
‘कुछ नहीं सर, आज रावण का अंत हो गया है।’
‘इसमें रोने की बात क्या है? नाटक में ऐसा होना ही था।’
‘नाटक में नहीं, उसके बाद अंत हुआ है सर।’
रघु की बात अनुराग समझ गया था। वह बोला, ‘गलती का एहसास होने पर ही असली विजय प्राप्त होती है। आज तुम भी विजयी हो गए हो।’
‘मुझे माफ कर दें सर, चोरी मैं ही किया करता था, क्योंकि मेरा भी मन करता था कि वैसी चीजें मेरे पास हों। पर मैं सब लौटा दूंगा और वादा करता हूं कि जीवन में फिर कभी चोरी नहीं करूंगा, बल्कि खूब पढ़ाई करके सफल व्यक्ति बनूंगा।’
दूबे जी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। सचमुच रावण मर गया था।
