गोविंद भारद्वाज

मेश प्रतिदिन विद्यालय में पढ़ने जाता, पर रोजाना वह आधी छुट्टी में स्कूल से भाग जाता। वह नौवीं कक्षा में पढ़ता था। स्कूल से भागने के बाद वह शहर में इधर-उधर भटकता फिरता। छुट्टी का समय होने पर ही अपने घर पहुंचता था। एक दिन जब वह अपना बस्ता लेकर बाजार में घूम रहा था, तो उस पर एक भिखारी की नजर गई। भिखारी अधिक उम्र का नहीं था। उसकी उम्र मुश्किल से पैंतीस-चालीस साल रही होगी। भिखारी ने उसे आवाज दी, ‘अरे लड़के इधर आना।’

रमेश ने थोड़ी देर सोचा कि एक भिखारी उसे क्यों बुला रहा है? फिर वह सोचता हुआ उसके पास पहुंचा। ‘कहो, मुझे क्यों बुलाया तुमने?’ रमेश ने भिखारी से पूछा। भिखारी बोला, ‘तुम किसी सरकारी स्कूल में पढ़ते हो शायद?’  ‘हां… हां तुम्हें इससे क्या मतलब?’ रमेश थोड़ा रौब झाड़ते हुए बोला। भिखारी ने कहा, ‘तुमको मैं कई बार बस्ता लेकर इधर-उधर घूमते हुए देखता हूं। तुम सरकारी स्कूल की ड्रेस में स्कूल समय में आवारा की तरह घूमते हो, तो तुम्हारे कारण स्कूल की छवि भी खराब होती है।’

‘तुम्हें इससे क्या मतलब? तुम भिखारी हो और भिखारी की तरह भीख मांगते रहो, समझे।’ रमेश ने उसे डांटते हुए जवाब दिया। उसका उत्तर सुन कर भिखारी की आंखों में आंसू आ गए। रमेश ने उसे भावुक होता देख कर पूछा, ‘तुम क्यों रो रहे हो भाई?’ भिखारी ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, बेटे तुम अभी छोटे हो। तुम स्कूल से भागने का परिणाम नहीं जानते। मैं भी तुम्हारी तरह स्कूल से रोजाना भाग जाया करता था। इस कारण कभी पास नहीं हो सका। थोड़े दिनों बाद सड़क दुर्घटना में मेरे माता-पिता की मौत हो गई। वे मुझे बेसहारा छोड़ कर चले गए। किसी ने मुझे आवारा समझ कर सहारा नहीं दिया। पढ़ा-लिखा न होने के कारण किसी ने काम भी नहीं दिया। मेरे पास भीख मांगने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। आज तुम मेरी दुर्दशा देख ही रहे हो।’

भिखारी की बातें सुन कर रमेश का गुस्सा उतर गया। उसने पूछा, ‘तुम हट्टे-कट्टे होकर भी भीख क्यों मांगते हो। मेहनत-मजदूरी क्यों नहीं कर लेते?’ ‘मेहनत-मजदूरी करने लायक मेरा शरीर ही नहीं रहा। टीबी की बीमारी लगी है।’ भिखारी ने रमेश से कहा।  रमेश ने भिखारी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘अंकल तुमने मेरी आंखें खोल दी। मैं रोजाना पूरे समय स्कूल में रह कर पढ़ाई करूंगा। मेरे माता-पिता भी मेहनत-मजदूरी करके मुझे पढ़ा-लिखा रहे हैं। आज तुम जैसे भिखारी ने मुझे भीख में वह सबक दिया है, जिसे मैं उम्र भर नहीं भूल सकता।’

रमेश यह कह कर स्कूल की ओर चल दिया, और उसके बाद कभी उस भिखारी को बस्ता लेकर घूमते हुए नहीं मिला।
वर्षों बाद एक दिन बूढ़े भिखारी के पास एक बड़ी-सी कार आकर रुकी। बूढ़े भिखारी की हालत इतनी खराब थी कि वह उठ कर भीख नहीं मांग सकता था। कार का दरवाजा खुला। उसमें से एक हट्टा-कट्टा नौजवान बाहर आया। उसके शरीर पर मंहगा सूट और आंखों पर रंगीन चश्मा चमक मार रहा था। वह भिखारी के पास गया और बोला, ‘बाबा आपने मुझे नहीं पहचाना क्या?’
बूढ़े भिखारी ने धीरे से सिर ऊपर उठाया और फिर इनकार की मुद्रा में हल्का-सा सिर हिला दिया।
‘मैं वही आवारा लड़का हूं बाबा, जो सरकारी स्कूल से आधी छुट्टी में भाग जाता था। और एक दिन आपने मुझे बाजार में बुला कर …!’
‘अच्छा… अच्छा… रमेश! पहचान लिया बेटा। इतने बड़े आदमी हो गए तुम। भगवान तुम्हें सुखी रखे।’ बूढ़े भिखारी ने दबी आवाज में उत्तर दिया।
रमेश ने कहा, ‘बाबा मैं आज जो कुछ भी हंू आपकी सीख की वजह से हंू। अगर आप उस दिन मुझे बुला कर समझाते नहीं, तो मैं भी आपकी स्थिति में होता। आपने मेरे जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन किया है, जिसे भूल पाना मेरे लिए मुश्किल है।’
‘नहीं बेटा, यह सब भाग्य का खेल है।’ भिखारी ने आसमान की ओर ताकते हुए कहा।
‘बाबा मेरा एक कहा मानोगे?’
‘बोल बेटा, जब तू मेरा कहना मान सकता है, तो मैं क्यों नही मानूगा?’
‘बाबा मेरे सिर से मेरे मां-बाप की छाया उठ चुकी है। मैं चाहता हंू कि आप मेरे साथ मेरे घर में रहें। मैं आपकी खूब सेवा करूंगा।’ रमेश ने आंखें नम करते हुए कहा।
‘मेरी एक शर्त है बेटा।’
‘कैसी शर्त बाबा? मुझे आपकी हर शर्त स्वीकार है।’ रमेश ने हिम्मत करके कहा।
‘बेटा, मुझे घर ले जाने के बाद कभी दफ्तर से आधी छुट््टी में नहीं भागोगे।
इतना कहते ही दोनों खिलखिला कर हंस पड़े। अगले ही पल रमेश ने बूढ़े भिखारी को अपनी कार में बिठा लिया और घर की ओर रवाना हो गया।