अखिलेश श्रीवास्तव चमन 

रिक्शे से उतर कर विद्यालय के गेट में घुस रहे अपूर्व ने दूर से ही देख लिया कि उसकी कक्षा के बाहर बरामदे में आठ-दस लड़के झुंड बनाए किसी को घेरे खड़े थे। उत्सुकतावश वह भी भागता हुआ वहीं पहुंच गया। पास जाने पर उसने देखा कि उसका सहपाठी आकाश अपने बाएं हाथ की कलाई पर एक नई चमचमाती घड़ी बांधे खड़ा था और बड़ी शान से वहां उपस्थित सभी लड़कों को दिखा रहा था। अपूर्व को देखते ही वह अपनी कलाई अपूर्व की तरफ बढ़ाते हुए बोल पड़ा- ‘अप्पू! यह देखो मेरी नई घड़ी। कल मेरे जन्मदिन पर मेरे पिताजी ने मुझे उपहार में दी है। जानते हो, पूरे बारह सौ रुपए की है।’

अपूर्व ने आकाश को उसके जन्मदिन तथा नई घड़ी दोनों के लिए बधाई दी, लेकिन मन ही मन ईर्ष्या से जल-भुन गया। वह सोचने लगा कि काश! उसके पास वैसी ही घड़ी होती, तो वह भी आकाश की तरह शान से अकड़ कर सबको दिखाता। उसने अपनी सूनी कलाई देखी और उदास हो गया। विद्यालय में सारे दिन उसके दिमाग में आकाश की सुनहरे डायल वाली चमचमाती घड़ी ही घूमती रही। घर लौटते ही उसने बस्ता एक तरफ फेंका और अपनी मां से बोला- ‘मम्मी, जानती हैं आप? आकाश के पिताजी ने उसके जन्मदिन पर उपहार में उसे पूरे बारह सौ रुपए की सोने जैसी चमचमाती घड़ी दिलाई है। मेरे जन्मदिन पर तो आप बस एक नई शर्ट देकर बहला देती हैं। मम्मी प्लीज, मुझे भी वैसी ही घड़ी चाहिए।’

अपूर्व की मम्मी कुछ नहीं बोलीं। चुपचाप अपने काम में लगी रहीं।
‘बोलिए न मम्मी… मुझे भी वैसी ही घड़ी दिलवाएंगी न…। ’ अपूर्व अपनी मम्मी के गले से लिपट कर जिद करने लगा।
‘अप्पू बेटे! तुमको कितनी बार समझाया है कि दूसरों की नकल मत किया करो। छोटे बच्चे घड़ी नहीं बांधते। जब तुम बड़े हो जाओगे तब तुम्हें घड़ी जरूर दिलवा देंगे।’ मम्मी ने उसे प्यार से समझाया।

‘तो आकाश बहुत बड़ा है क्या? वह भी तो मेरे ही बराबर है… मेरी कक्षा में ही पढ़ता है। जब उसके पिताजी उसे घड़ी खरीद सकते हैं, तो आप मुझे क्यों नहीं?’
‘देखो! तुम फिर जिद करने लगे। कितनी बार समझाया है मैंने कि जिद करना अच्छी बात नहीं होती। अगर किसी की बराबरी ही करनी है तो पढ़ाई में करो। उन बच्चों की बराबरी करो, जो पढ़ने में तुमसे अधिक तेज हैं और परीक्षा में तुमसे अच्छे नंबर ले आते हैं।’ मम्मी बोलीं।
‘नहीं मम्मी… नहीं। मैं कुछ नहीं जानता… मुझे तो घड़ी चाहिए ही। चाहे जैसे भी हो, आपको घड़ी खरीदनी ही पड़ेगी, नहीं तो कल के बाद मैं स्कूल नहीं जाऊंगा।’ अप्पू मुंह फुला कर बोला और अपने हाथ, पांव पटकते हुए ठुनकने लगा।

‘अप्पू! जिद न किया करो। बात को समझा करो और एक बार में कही बात सुन लिया करो। मुझे नहीं खरीदनी है घड़ी-वड़ी… समझे? जब देखो तब किसी न किसी बात के लिए जिद मचाए रहते हो। कभी जूता चाहिए, तो कभी बैट-बॉल चाहिए, कभी घड़ी चाहिए तो कभी सायकिल चाहिए। जो चीज देखते हो उसी के लिए जिद करने लगते हो।’ मम्मी ने जोर से डांटा तो अपूर्व चुप हो गया और मुंह लटकाए अपने कमरे में चला गया।

अपूर्व आज शाम को अपने दोस्तों के साथ खेलने नहीं गया। अपने कमरे में गुमसुम बैठा रहा। रात को भोजन करने के लिए मम्मी ने कई बार आवाज दी, लेकिन वह बाहर नहीं आया। जब पिताजी ने डांट कर बुलाया तो वह मुंह लटकाए आया और बस नाम के लिए एक रोटी खाकर वापस कमरे में चला गया। भूखे पेट होने के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी, लेकिन आंखें बंद किए वह चुपचाप लेटा रहा। थोड़ी देर बाद उसकी मां और पिताजी भी सोने के लिए कमरे में आ गए।

‘क्या बात है आज अप्पू मुंह क्यों फुलाए हुए है?’ अपूर्व के पिताजी ने उसकी मम्मी से पूछा।
‘इसके दोस्त आकाश के जन्मदिन पर उसके पिताजी ने उसे बारह सौ की घड़ी खरीद कर दी है। यह भी वैसी ही घड़ी खरीदने की जिद कर रहा था। मैंने डांट कर मना कर दिया तो मुंह फुला कर बैठ गया है।’ अपूर्व की मम्मी ने बताया।

अपूर्व की मम्मी और पापा देर रात तक बातें करते रहे और बगल की चारपाई पर आंखें बंद किए लेटा अपूर्व उनकी बातें सुनता रहा। बातें सुनते-सुनते न जाने कब उसे नींद आ गई। सवेरे सोकर उठा तो नहा-धो, तैयार होकर विद्यालय चला गया, लेकिन विद्यालय में उसका मन पढ़ने में नहीं लग रहा था। मम्मी, पापा की बातें सारे दिन उसके दिमाग में उमड़ती, घुमड़ती रहीं। वह सोचता रहा- ‘आकाश के पापा के पास कार है, अमोल के पापा के पास भी दो गाड़ियां हैं, एक सरकारी जीप और एक उनकी अपनी कार, लेकिन उसके पापा के पास तो ढंग का स्कूटर भी नहीं है। जब पापा अमोल और आकाश के पापा की बराबरी नहीं करते, तो मुझे भी वैसा नहीं सोचना चाहिए।’ उसने मन ही मन सोचा और निश्चय कर लिया कि अब भविष्य में किसी भी चीज के लिए जिद नहीं करेगा।

उधर अपूर्व की मम्मी सारे दिन उसको समझाने के लिए उपाय सोचती रहीं। सोचते- सोचते उन्हें सहसा एक उपाय सूझा। उन्होंने पुराने अखबारों का बंडल निकाला और उसमें कुछ ढ़ूुंढ़ने लगीं। खोज कर उन्होंने दो पुराने अखबार निकाले और दोनों में छपी एक-एक खबर पर पेन से निशान लगा कर रख लिया। विद्यालय से लौटने के बाद अपूर्व जब खाना खा चुका तो मम्मी ने उसे अपने पास बुलाया और बारी-बारी से दोनों अखबारों की खबरें उसे पढ़ने को दीं। पहली खबर शहर के एक व्यापारी के यहां छापा पड़ने के बारे में थी। छपा था कि वह व्यापारी खाने-पीने की चीजों में मिलावट करता था। इसलिए उसे गिरफ्तार करके पुलिस ने जेल भेज दिया था। दूसरी खबर एक सरकारी अधिकारी के पकड़े जाने के संबंध में थी। पुलिस ने उस अधिकारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था और जेल भेज दिया था।

अपूर्व जब दोनों खबरें पढ़ चुका, तो उसकी मम्मी ने पूछा- ‘बोलो अप्पू! अब समझ आया तुम्हें कि जो लोग फालतू पैसे खर्च करते हैं वे कैसे-कैसे गलत काम कर के पैसे कमाते हैं? क्या तुम भी यही चाहते हो कि तुम्हारे पापा भी गलत काम कर के फालतू पैसे कमाएं और उनके साथ भी कोई वैसी ही दुर्घटना हो जैसा तुमने अखबार में पढ़ा है।’

‘नहीं मम्मी… मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मेरे पापा कोई गलत काम करें।… अब मैं किसी भी अनावश्यक चीज के लिए जिद नहीं करूंगा। मुझे घड़ी नहीं चाहिए। आप लोग बिल्कुल भी परेशान न होइए।’ अमोल ने कहा और अपनी मम्मी के आंचल में दुबक गया। मम्मी प्यार से उसका सिर सहलाने लगीं।