अकड़ू और पेटू दो भाई थे। अकड़ू बड़ा था और पेटू छोटा। अकड़ू आठवीं कक्षा में पढ़ता था तो पेटू छठी में। अरे, यह बताना तो भूल ही गए कि अकड़ू का नाम विनोद था और पेटू का प्रमोद। पर दोनों को कोई उनके नामों से नहीं पुकारता था। दोनों अपने नामों के बिल्कुल उलट थे। विनोद बात-बात पर अकड़ता था। जरा-जरा सी बात पर पेटू की पिटाई कर दिया करता। इसलिए अकड़ू पुकारा जाने लगा। उधर प्रमोद अपने आप को कुछ कम न समझता था। हर समय मस्ती में रहता। कुछ न कुछ खाने-पीने की खोज में रहता। जब खाने को बैठता तो खाता ही चला जाता था। सो, उसका नाम पेटू पड़ गया।

एक दिन तो हद ही हो गई। हुआ यह कि सुबह-सुबह पेटू ने अकड़ू की कमीज पहन ली और ड्रेसिंग-टेबल के सामने खड़ा होकर तरह-तरह की मुद्राएं बना कर खुद को निहार रहा था। तभी अकड़ू आ गया। उसे देख कर वह बहुत आग बबूला हुआ। गुस्से में उसने एक हाथ से पेटू के बाल पकड़े और दूसरे पल दाएं हाथ से उसकी पीठ पर मुक्कों की बरसात कर दी- तक्क, धिना-धिन्न। बेचारे पेटू ने जैसे-तैसे अपने को छुड़ाना चाहा। तो अकड़ू पेटू की कमीज पकड़ने लगा। चकमा देते हुए पेटू ने एक लंगड़ी मार दी। फटाक से अकड़ू चारों खाने चित। मुंह दरवाजे से लगा सो अलग। ऐसे में उसकी ठोड़ी से खून बहने लगा। अकड़ू ने झट दरवाजे पर टंगी चिक से एक खप्पची (बांस की पतली डंडी) खींची और लगा पेटू को उधेड़ने।

उसी दिन रात को पूरे परिवार को एक विवाह समारोह में सम्मिलित होना था। लेकिन अकड़ू और पेटू के झगड़े से उनके पिता इतने खिन्न हुए कि बोले- ‘सुनती हो, इन बदमाशों को कहीं नहीं ले जाना। शैतान, बहुत लड़ते-झगड़ते हैं।’
‘इन्हें तो घर में बंद कर देना चाहिए! ये कहीं ले जाने के लायक नहीं।’ यह उनकी मां ने तड़प कर कहा था।
‘एक काम करो, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। तब तक मैं इन शैतानों का इलाज करता हंू।’ कहते हुए वे इधर-उधर कुछ खोजने लगे। उन्हें एक खप्पची पड़ी दिख गई। फिर उन्होंने चिक की ओर देखा। झट मन में क्या सूझा कि उन्होंने चिक से आठ-दस खप्पचियां निकाल लीं। जो धागा चिक से लटक रहा था उसे भी खींच कर तोड़ लिया।
अब उन्होंने पहले अकड़ू को पकड़ा। उसके दोनों हाथों में चार खप्पचियां धागे से ऐसे बांध दीं कि उसका हाथ एकदम सीधा रहे। कोहनी से बिल्कुल भी मुड़ने न पाए। ऐसे ही पेटू के हाथों में खप्पचियां बांध दीं। इस बीच दोनों बहुत रोए। हाथ-पैर पटकते रहे, पर उनके पिता तनिक भी न पसीजे, न उन्हें दया आई।

रात के आठ बज रहे थे। पेटू रोते-रोते सो गया था। उधर दूसरे कमरे में अकड़ू टीवी देखते-देखते ऊंघ रहा था। पर दर्द के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी। तभी उसकी ठोड़ी में खुजली होने लगी। चोटवाले स्थान पर वह अपना हाथ लगा नहीं सकता था। सो, उसने अपना कंधा कुछ उचका कर ठोड़ी सहलानी चाही। ऐसे में उसकी पट्टी हिल गई। अब क्या करे? वह सोचने लगा। तभी वह दूसरे कमरे में गया और अपने हाथ से पेटू को हिलाते हुए बोला- ‘प्रमोद! ओ प्रमोद! उठ तो जरा। देख, मेरी पट्टी खुल गई है।’

हड़बड़ा कर पेटू उठ बैठा। कुछ देर अकड़ू को देखता रह गया। फिर शर्माते हुए पूछा- ‘भाई, बहुत दर्द हो रहा है। जरा नीचे तो झुक। थोड़ा पीछे बैठ। तभी तो मेरा हाथ पहुंचेगा।’
अकड़ू की पट्टी ठीक तरह से बांध कर पेटू किचन में चला गया। वहां फ्रिज में मिठाई का डिब्बा दिखा। डिब्बे के बगल में सेब और केले रखे थे, जिन्हें देख कर पेटू के मुंह में पानी आ गया। भूख लगने लगी। पर समस्या यह थी कि यह सब वह खाए तो खाए कैसे? खैर, उसने जैसे-तैसे एक सेब उठा लिया। पर उसे खा न सका। सेब हाथ से फिसल कर नीचे लुढ़क गया। और दरवाजे पर जा लगा। खट से एक आवाज हुई। आवाज सुन तुरंत अकड़ू आ पहुंचा। उसने पहले सेब को देखा फिर पेटू को। फिर फर्श से सेब उठा कर पेटू को देने लगा। तभी उसे कुछ ध्यान आया, सो बोला- ‘पागल, हाथ में सेब लेगा तो खाएगा कैसे? ले, मेरे हाथ से खा।’

पेटू ने सेब को दांतों से काटा और खाने लगा। खाते-खाते उसका मुंह थोड़ी देर के लिए रुका। अपनी आंखें फैलाते हुए- ‘भाई, एक मिनट’ कह कर वह फ्रिज की ओर लपका। फ्रिज से उसने एक और सेब निकाल कर अकड़ू की ओर किया और प्यार से बोला- ‘भाई, तुम भी खाओ न!’
अब दोनों खा रहे थे। पहले सेब खाए। उसके बाद केलों का नंबर लगाया। फिर मिठाई पर हाथ फेरा। जब पेट भर गया, तब दोनों ने एक-दूसरे को पानी पिलाया। फिर कुछ उछलते हुए अकड़ू बोला- ‘प्रमोद! हम यों ही बुद्धू बन रहे थे। रुक, देख। मैं तेरे हाथ खोल सकता हंू। रुक, सीधे हाथ रख।’
‘अरे हां, भाई! यह तो हमनें जाना ही नहीं। तुम मेरे हाथ खोल दो। मैं तुम्हारे हाथ खोलता हंू। भाई, आज मुझे पता चला कि मेल-मिलाप से कितने फायदे हैं। मिल कर रहने से बड़ी से बड़ी समस्या हल की जा सकती है। भाई, मुझे माफ कर देना। नाहक ही मैं तुमसे लड़ता रहा।’
‘अच्छा, अच्छा, अब जरा चुपचाप खड़ा रह। वैसे देखा जाए तो कुछ गलती मेरी भी थी, प्रमोद। खैर।’ कहते हुए अकड़ू ने पेटू के हाथ खोल दिए थे। बाद में पेटू ने भी उसके हाथ खोल दिए। अब वे पूरे आजाद थे। उछल-कूद कर सकते थे। लेकिन दोनों ने ऐसा कुछ नहीं किया। बल्कि अपना-अपना होमवर्क करना उचित समझा। सचमुच दोनों पढ़ने बैठ गए थे।
रात के ग्यारह बजे अकड़ू-पेटू के माता-पिता लौट कर आए। घर का दरवाजा खोल कर जैसे ही भीतर कमरे में वे आए तो उन्हें यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि अकड़ू और पेटू पलंग पर मस्त पड़े थे। दोनों के हाथ एक-दूसरे की छाती पर रखे हुए थे और उनकी पुस्तक-कॉपियां दूसरी तरफ बिखरी पड़ी थीं। तो धागा-खप्पचियां पलंग के नीचे थे। साथ ही केलों के छिलके थे। यह दृश्य देख कर उनके पिता मुस्करा दिए। मुस्कराते हुए ही बोले- ‘देखा, भाग्यवान! बंधे हाथों का कमाल। कैसे खा-पीकर पड़े हैं दोनों। मानो कभी झगड़े ही न हों।’