पवन वर्मा
नन्हीं चील पहली बार खुले आकाश में उड़ रही थी। आज वह बहुत खुश थी। इतने ऊपर से वह दूर तक देख सकती थी। घोंसले में बैठी उसकी मां भी उसे उड़ते हुए देखकर बहुत खुश हो रही थी। बहुत दूर मत जाना। बीच बीच में मां उसे समझा रही थी। थोड़ा आगे बढ़ने पर नन्हीं चील को खरगोश के दो छोटे बच्चे दिखाई दिए। लेकिन उसे देखते ही वे दोनों तुरंत अपने बिल में घुस गए। लगता है दोनों मुझ से डर गए। नन्हीं चील सोचने लगी। गौरैया अपने बच्चों के साथ पेड़ की डाली पर बैठी थी।
वह भी नन्हीं चील को देखकर बच्चों के साथ अपने घोंसले में दुबक गई। सब मुझसे डर रहे हैं। नन्हीं चील मन ही मन हंसने लगी। चलो। अब वापस आ जाओ। आज के लिए इतना बहुत है। मां ने उसे आवाज दी। मां। थोड़ी देर और रूक जाओ। नन्हीं चील मां से बोली। पहली बार खुले आकाश में उड़ना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। नहींं। जिद नहीं करते। रात होने वाली है। अब वापस आ जाओ। कल फिर से चली जाना। मां बोली।
मां की डांट पड़ते ही वह वापस अपने घोंसले में लौट आई। उसके पंख भी दर्द कर रहे थे। उस रात उसे ठीक से नींद भी नहीं आई। उसे अगली सुबह का इंतजार था। सुबह होते ही वह मां से बोली,
‘मां, क्या मैं जाऊं?’
अभी नहीं। मैं खाने के लिए कुछ ले आती हूं। खाने के बाद तुम जाना, मां बोली।
नहीं मां, मुझे अभी जाना है।
वह फिर से जिद करने लगी।
नहीं। मेरे लौटने के बाद तुम जाना। तब तक तुम घोंसले में ही रहना। अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना है। इतना कहकर मां उड़ गई। नन्हीं चील ने मां की बात नहीं मानी।
उनके जाते ही वह खुले आकाश में उड़ गई। आस-पास रहने वाले छोटे जानवर और पक्षी उसके डर से इधर-उधर छिपने लगे। उन्हें डरता हुआ देख कर नन्हीं चील बहुत खुश हो रही थी। लगता है मैं बहुत ताकतवर हूं। नन्हीं चील मन ही मन सोच रही थी। वह और दूर निकल गई। कुछ दूरी पर बच्चों का स्कूल था। उस समय लंच का समय था। बच्चे स्कूल के मैदान में लंच कर रहे थे। चारो ओर बच्चे ही बच्चे दिख रहे थे।
नन्हीं चील अब स्कूल के मैदान के ऊपर उड़ रही थी। बच्चों के लंच बॉक्स में तरह-तरह की चीजें थीं। वह बिना कुछ खाए-पीए घोंसले से निकली थी। लंच-बॉक्स देख कर उसकी भूख बढ़ गई। लेकिन वह उन तक कैसे पहुंचेगी? नीचे तो ढेर सारे बच्चे हैं। वह नीचे जाने के बारे में सोचने लगी। बच्चों के लंच का समय समाप्त होने वाला था। उसे जल्दी से जल्दी कुछ करना था।
थोड़ी देर तक तो वह स्कूल के ऊपर चक्कर लगाती रही। फिर उसके मन में एक विचार आया। वह तेजी से नीचे आई और एक बच्चे के लंच-बॉक्स पर झपट पड़ी।
उसे अचानक नीचे देखकर बच्चे भी बुरी तरह घबरा गए। सब इधर-उधर भागने लगे। नन्हीं चील भी कुछ समझ नहीं पाई। वह तेजी से ऊपर की ओर उड़ना चाही, लेकिन स्कूल की दीवारों से टकरा गई। उसके पंख में कई जगह तेज चोट लग गई।
किसी तरह वह स्कूल की छत तक पहुंच पाई। दर्द के मारे उसका बुरा हाल था। उस समय छत पर कोई नहीं था। वह एक ओर बैठ गई। अब उसे मां की याद आने लगी।
मां जब घोसलें में वापस लौटी तो वहां नन्हीं चील नहीं थी। वह उसका इंतजार करने लगीं। उसे नन्हीं चील पर बहुत गुस्सा आ रहा था। अंधेरा होने वाला था। नन्हीं चील अब तक नहीं लौटी। मां की चिन्ता बढ़ने लगी, आखिर वह उसे खोजने निकल पड़ी। चारों ओर चक्कर लगाया, लेकिन वह कहीं नहीं दिखी। मां परेशान होने लगीं। वह उसे जोर-जोर से आवाज देने लगीं। मां की आवाज नन्हीं चील के कानों में पड़ी। उसकी आवाज सुनकर नन्हीं चील भी बोलने लगीं। मां ने उसे देख लिया। वह स्कूल की छत पर उतर गई। मां को देख कर नन्हीं चील जोर-जोर से रोने लगी।
‘मां , मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी।’ वह रोते हुए मां से लिपट गई। मां को भी उस पर दया आ गई। वह उसे किसी तरह घोंसले तक ले आई। घोंसले में मां उसकी देख-रेख करने लगीं। धीरे-धीरे उसके पंख ठीक हो गए। अब वह फिर से उड़ सकती थी। लेकिन उसने तय कर लिया था कि अब वह मां से पूछकर ही कहीं जाएगी। उसे उसकी गलती की सजा मिल चुकी थी।

