सुरेश सेठ
मुनादी वाला मुनादी कर रहा है। ढिंढोरची ढिंढोरा पीट रहे हैं। जुमलेबाज जुमले फेंक रहे हैं। नशे से अधमुंदे छोकरे सारंगी पर बजती बधाई धुन को सदन राग में बदलता देखते हैं, पर नाचने से परहेज नहीं करते। देश में लोगों के लिए सनसनी की कमी है। अच्छे दिन आने के उद्गार उनका पेट नहीं भरते। नेताओं ने अपने लूमड़ चेहरों पर हंसमुख मुखौटे चढ़ा लिए हैं। चुनाव करीब आएं। अपने चुनाव हलके की जिन गलियों और बाजारों का भूगोल भी उन्हें भूल गया था, वहां अब उनकी पदचाप सुनाई देती है। गलियां, बाजार, सड़कें, चौराहे वैसे ही हैं, दो चार घंटे सावन शोर करके गुजर जाए तो बाद में इनकी अस्मत लुटी नजर आती है। सड़कें जंगली पगडंडियों में बदल जाती हैं। उनमें अचानक उभर आए गड्ढे राहगीरों को निमंत्रण देते हैं कि आओ और हममें गिरो। गिर कर अपना कूल्हा तुड़वा कर चीखो तो संदेश देना, ‘मेरा भारत महान कह मेरी जान’। चीखों में से भी तेरी यह आवाज उभरेगी तो ये देशभक्त कह तो सकेंगे कि अपने इस रुदन भरे गायन से अब हमें रुलाएगा क्या पगले?
हां, अब यहां गाना और रोना एक समान हो गया। भूख और उपवास एक समान हो गए। भूख से सुबक-सुबक कर लड़कियां या सींकिया किसान मर जाएं, तो सरकारी आंकड़ा शास्त्री बोलते हैं, ‘अबे क्यों चिल्लाता है, उनके राज में तो हर रोज औसत से ज्यादा लोग मरते थे, हमारे में तो औसत कम हो गई। यही तरक्की है, मेरी जान, इसलिए हरि बोल।’
सपनों का बंजारा रैलियों के मंच से कहता है, मेरे पैरों में घुंघरू बंधवा दे, और फिर मेरी चाल देख ले।’ हम इस चाल पर हजार जान से फिदा। यह चाल क्रांति का आह्वान नहीं, सीधा प्रहार करती है। नोटबंदी के आर्थिक प्रहार की तरह एक रुपए का काला धन बाहर नहीं आया। लेकिन पूरे का पूरा बैंकों में जमा होकर उन्हें संपन्न तो कर गया। तब अंधाधुंध बड़े लोगों में ऋण बंटा, समर्थ धन भकोस विदेश उड़न छू हो गए। इन्हें वापस लाने के प्रयास होते हैं तो वे कहते हैं- ‘पहले अपनी जेलों को पंचतारा बनाओ, वातानुकूलित करो, तभी हम वापस आएंगे।’ उनकी इस प्रगतिशील मांग ने आम आदमी की आंखें भर दीं। देखो बैंकों के खाते मृत बना कर विदेश भाग कर भी स्वदेश की जेलों की बेहतरी की कितनी चिंता कर रहे हैं! जेल सुधारो अभियान चलाओ, तभी वे वापस लौटेंगे। जेलें बेहतर हो जाएंगी, इससे चोर उचक्के और उठाईगीर खुश हैं। बैंकिंग व्यवस्था के खातों को मौत का संदेश देकर इन आर्थिक भगोड़ों ने जेल सुधार की कितनी चिंता की। खुद तो बाहर की नागरिकता खरीद चैन की बंसी बजाएंगे और बाकी बच गए उनके बस्ता उठाने वाले चम्मच, जब तक राजनीति में जाकर चोर, उचक्का, चौधरी और गुंडीरन्न प्रधान की लोकोक्ति प्रमाणित नहीं करते, तब तक वे जेलों को सुधरते देख यही कहेंगे, ‘अब इस विकास से भी हमें रुलाएगा क्या पगले।’
लेकिन विकास ही क्यों समय भी तो पगला रहा है। बर्नार्ड शॉ न जाने कितने दशक पहले कह गए- ‘राजनीति शैतानों का अंतिम शरण स्थल है।’ लेकिन समय पगलाया तो ऐसे जुमले भी पगलाने लगे। राजनीति अंतिम कहां, पहला शरणस्थल बन गई। संसद और विधानसभा चुनावों में खम ठोक कर दंगल करने के लिए उतरते राजनेताओं को देख लो। सब करोड़पति हैं और अरबपति बनने की राह चल रहे हैं। इनकी आपराधिक छवि तलाशने के लिए इन पर दायर मुकदमों की सूची हमें न दिखाओ। क्या तुम नहीं जानते कि जब तक किसी आरोपी पर आरोप सिद्ध न हो जाए, उसे दंड न मिले, वह अपराधी नहीं बनता। अभी वे समाज के मार्गदर्शन के लिए पूरी तरह सुयोग्य हैं।
इन सुयोग्य नशे की बरात में किराए पर लाए गए लोगों की रैलियां भीड़ है। इनके आगे बजते बैंडों के स्वर जुमले उठाते रहे हैं। जनता के हृदय सम्राट ही लोकप्रिय नेता बनते हैं। लेकिन जनसेवा के नाम पर इनमें जोड़-तोड़ की महारत होनी चाहिए। इनके भाषणों में पीड़ितों के प्रति संवेदना रहनी चाहिए। जब चुनाव जीतने के लिए काले धन की जरूरत आ पड़े, तो मजदूर किसान की पीड़ा के साथ यह अमीरजादों की पीड़ा भी इसमें शामिल कर सकें। देश को तरक्की करनी है तो इनकी पीड़ा को भी अपनाना होगा।
हमारी कुर्सियों के नीचे इनकी अट्टालिकाओं के ठोस समर्थन की धरती चाहिए। तभी जब इनके हाथों की कृपा से प्रस्तुत ताज को अपने माथे पर सजाने लगे तो कह सके, ‘अब तू भी अपनी जायज पीड़ा से हमें रुलाएगा क्या पगले?’ पगला आपको क्या रुलाएगा, पूरा अर्थतंत्र ही बौरा गया। मंदी की रुआंसी ठंड ने कार्यस्थलों पर ताले लटका दिए। बेकारों की भीड़ में छंट कर आए बेकाम भी जुड़ने लगे, लेकिन जनाब रुलाइए नहीं, यह तो विश्वव्यापी समस्या है। इसका समाधान भी व्यापक स्तर पर ही होगा। देश के गरीब किसान, मजूर और बेकार नौजवानों की चिंता करने की भला क्या जरूरत? उन्हें तो कभी न टलने वाला अंधेरा अपने आगोश में समाए है और अंधे नशों की घुट्टी पिला रहा है। अब इस बात पर तो न रुलाइए हमें आप। इससे क्या बेहतर नहीं कि हम वैश्विक स्तर पर इन समस्याओं का समाधान करें। धनपतियों के राजपथ से निजीकरण की आवाजों को सुनें, ये आर्थिक प्रगति को तेज करेंगी। इस तेजी की तलछट से बेकारी का समाधान अपने आप हो जाएगा बंधु!

