बलात्कार की घटनाओं पर काबू पाने के मकसद से कड़े कानून बने, निगरानी तंत्र को मुस्तैद बनाने की कोशिशें भी हुर्इं, पर हकीकत यही है कि इन घटनाओं में कमी के बजाय निरंतर बढ़ोतरी ही दर्ज हुई है। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, समाज का एक तबका दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग उठाते हुए सड़कों पर उतर आता है। पर यह सवाल अपनी जगह बना रहता है कि आखिर क्या वजहें हैं, जिनसे समाज में ऐसी कुत्सित मानसिकता को बल मिल रहा है। कुत्सित और जघन्य अपराध की मानसिकता तैयार करने वाले कारणों की पड़ताल कर रही हैं नाज खान।
एक बार फिर लोग सड़कों पर उतरे, प्रदर्शन हुए और बलात्कार के दोषियों को कठोर दंड और फांसी की मांग ने जोर पकड़ा। मगर क्या मौत की सजा देने भर से बलात्कार की इस पिशाची प्रवृत्ति पर लगाम लग सकेगी? नहीं, ऐसा नहीं है। क्योंकि अगर ऐसा होता, तो दोषियों को कठोर दंड या फांसी देने के बाद इन जघन्य अपराधों का सिलसिला रुक चुका होता। धनंजय चटर्जी को बलात्कार और हत्या के जुर्म में फांसी दी गई थी, मगर आज भी बलात्कार की घटनाएं हर दिन, हर घंटे अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। मतलब साफ है, यानी सिर्फ कानून के भरोसे बलात्कार मुक्त समाज बनाने की बात बेमायने है, क्योंकि यह एक मानसिकता है, जो कहीं न कहीं पुरुषों में उनके अपने माहौल से घर करती जाती है। इसमें नशा, पोर्न साइटें, अश्लील किताबें आदि उनकी इस आपराधिक सोच को बढ़ावा देते हैं, उसे उकसाते हैं। नतीजा, इस तरह के अपराध होते हैं। सच तो यह है कि बलात्कार जैसी पीड़ा से गुजरने वालों के लिए इंसाफ की लड़ाई तब तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक कि बार-बार सामने आने वाली इन जघन्य वारदातों के पीछे की असल वजह को न समझा जाए, क्योंकि जब तक इन अपराधों के पीछे की वजह को पूरी तरह समझ कर इनके समाधान की ओर कदम नहीं बढ़ाया जाता, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को सिर्फ कठोर दंड के सहारे रोक पाना नामुमकिन है।
सवाल है कि आखिर पुरुष बलात्कार जैसा जघन्य अपराध करते ही क्यों हैं। दरअसल, इसके लिए किसी एक वजह को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह सही है कि कहीं अक्सर अचानक और सुनसान रास्ते पर अकेले में ऐसे लोगों के बीच घिर गई महिलाएं बलात्कार की शिकार बनती हैं, तो कहीं भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी अश्लील इशारों, फब्तियों को सुनने पर मजबूर होती हैं। दरअसल, इसके लिए समाज में बैठी वह पुरुषवादी मानसिकता भी पूरी तरह जिम्मेदार है, जिसमें महिलाओं को उपभोग की वस्तु की तरह समझा जाता रहा है। अक्सर यह अपराध महिलाओं पर हावी होने, उन पर अपना वर्चस्व स्थापित करने और उन्हें अपमानित करने के मकसद से भी किए जाते हैं। क्योंकि ऐसी सोच के पुरुषों की भी कमी नहीं है, जो यह समझते आए हैं कि महिलाएं उपभोग की वस्तु हैं और पुरुषों की यौन इच्छाओं को पूरा करने के मकसद के लिए ही उनका जन्म हुआ है। इस मानसिकता की शुरुआत दरअसल घर से ही होती है। किसी परिवार में जब पुरुषवादी वर्चस्व महिला पर हावी रहता है, वहां महिलाओं को पुरुषों की मनमानी को सहन करना पड़ता है। ऐसे घरों में घरेलू हिंसा आम बात होती है। इस तरह के माहौल में पले-बढ़े बच्चों पर बचपन से ही इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो समाज में बच्चों का व्यवहार उनके घर में महिलाओं के साथ पुरुषों के किए गए व्यवहार से तय होता है यानी वे अपनी मांओं के साथ अपने पिता का सुलूक देख कर सीखते हैं। वहीं वह पुरानी परंपराएं इतनी गहरी घुली-मिली हुई हैं, जिनमें पुरुषों को महिलाओं पर और बेटे के जन्म को बेटी के जन्म पर अहमियत दी जाती रही है। दरअसल, यह मानसिकता बेटी और बेटे के जन्म और उनकी परवरिश के साथ ही पनपती जाती है। जब-जब बेटियों को बेटों से कमतर आंका जाता है, दोनों के लिए सही और गलत के अलग पैमाने तय किए जाते हैं, तब पुरुषवादी मानसिकता में महिलाओं के प्रति उस सोच का जन्म होता है, जिसमें महिलाओं के प्रति सम्मान के बजाय उनको नियंत्रित करने, उन पर हावी होने की सोच पनपती है। पुरुषों में आपराधिक सोच को कुछ अन्य वजहों से भी बल मिलता है-
घरेलू हिंसा को नजरअंदाज करना : यह वह अहम कारण है जिसका बच्चों के मन पर गहरा असर पड़ता है। मगर यह हमारे समाज की आम बात समझी जाती रही है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि घरेलू हिंसा अपराध नहीं, किसी घर का, पति-पत्नी का निजी मामला है। मगर इस ओर कम ही ध्यान दिया जाता है कि इसका बच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब वह घर में इसी माहौल में पलते हैं, तो उनका महिलाआें को लेकर यही नजरिया बनता जाता है। ऐसे में उनमें महिलाओं के लिए सम्मान नहीं होता और उनके लिए हिंसा किया जाना एक आम बात होती है।
नशा और पोर्न साइट देखने की लत : नशा व्यक्ति की सोच को विकृत कर देता है। उसका खुद पर काबू नहीं रहता। उसके गलत दिशा में बहकने की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है। यह उसकी नियंत्रण क्षमता को कम कर देता है। ऐसे में अक्सर लोग सामूहिक दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं। वहीं ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जब गांवों से पलायन करके शहरों में मजदूरी आदि करने आए लोग इस तरह के अपराधों में लिप्त पाए गए। इसके लिए नशा और अकेले में पोर्न साइट, फिल्में, तस्वीरें उनके नीरस जीवन में उत्तेजना भरती हैं और वे अपराध कर बैठते हैं। सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं में नशा एक अहम कारण के तौर पर सामने आया है। अक्सर सामूहिक दुष्कर्म में अपराध साबित करना मुश्किल होता है। वहीं अपराधी कानून की लचरता का सहारा लेकर अपने लिए बचने का रास्ता निकाल ही लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एकल रेप में अपराधियों के पकड़े जाने की संभावना अधिक रहती है, इसलिए सामूहिक दुष्कर्म की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
महिलाओं की कमजोेर स्थिति : अपने अधिकारों से अनजान महिलाओं को बचपन से ही दब कर रहने, कम बोलने की सीख दी जाती रही है और कुछ घटना हो जाए तो इज्जत के नाम पर उनको चुप रहने का सबक भी दिया जाता है। साथ ही इज्जत का हवाला देकर उन पर समझौता करने का दबाव डाला जाता है। मगर यह स्थिति अपराधियों में डर को खत्म करती है और उन्हें मनमानी का मौका देती है। वे निडर होकर एक के बाद एक अपराध करते हैं।
पुरुषवादी मानसिकता : सामूहिक बलात्कार जैसे मामलों में सबक सिखाने जैसी सोच पुरुषवादी मानसिकता का वह पहलू उजागर करती है जिसमें महिला को सबक सिखाना हो या उसे नीचा दिखाना हो, तो उसके साथ बलात्कार जैसी दरिंदगी की जाती है। कई मौकों पर बलात्कार की वजह ताकत और महिलाओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करना भी होता है। फूलनदेवी का उदाहरण ही सामने नहीं है, बल्कि बिलकीस बानो, मुख्तारन माई जैसी सामूहिक दुष्कर्म की कितनी ही घटनाएं उदाहरण के तौर पर सामने हैं, जिनमें सामूहिक दुष्कर्म सिर्फ इसलिए किया गया, ताकि महिलाओं, उनके परिवारों को अपमानित किया जा सके और उनसे बदला लिया जा सके।
ये अपराध समाज से अलग-थलग पड़े लोग अंजाम देते हैं : इस तरह के अपराध अक्सर समाज से कुंठित, अलग-थलग पड़े उन लोगों के द्वारा भी अंजाम दिया जाता है, जिनकी अपनी आकांक्षाएं पूरी नहीं होतीं। समाज में उन्हें सम्मान की निगाह से नहीं देखा जाता। तब ऐसे में उनके अंदर आक्रामकता बढ़ती जाती है। एकांत जगह अक्सर ऐसे मवालियों का अड्डा बन जाती हैं। इसलिए उन्हें जब भी मौका मिलता है, वे इस तरह के अपराध कर बैठते हैं।
व्यवस्था की खामियों से बढ़ता अपराध : लचर कानून का फायदा अपराध में प्रवृत्त लोग उठाते हैं और वहीं जब शक्तिशाली लोग इसके शिकंजे में फंसते हैं तो कानून की इसी लचरता का फायदा उठा कर बच निकलने में कामयाब होते हैं। इसका भी असर समाज और अपराधी मानसिकता के लोगों पर पड़ता है। वे अपराध करने से डरते नहीं, उन्हें कानून, सजा का डर नहीं होता और अगर कानूनी शिकंजे में फंस भी जाएं तो अपने रसूख के बल कर उससे निजात पा लेने की सोच उनमें होती है। नेशनल इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते कई सालों में देश के अहम राजनीतिक दलों ने ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट दिए, जिन पर बलात्कार जैसे संगीन अपराध के आरोप लगे हैं। इससे लोगों में भी सोच मजबूत हुई कि कुछ भी कर लो, पावर और पैसा हो तो कुछ नहीं बिगड़ेगा।

