पर्यावरण विशेषज्ञ इस आपदा को अनियोजित विकास के परिणाम के तौर पर देख रहे हैं। ऐसे में बाढ़ का मुख्य कारण इंसानों की बनाई नीतियां हैं। इसे मानव निर्मित संकट कहते हैं। वहीं अनियमित बारिश के लिए जलवायु परिवर्तन के साथ वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी भी जिम्मेदार है। ऊंचे बांध, कार्बन उत्सर्जन और नदियों के किनारे निर्माण कार्यों को लेकर लगातार विशेषज्ञों की चेतावनी को नजरअंदाज करते जाना, यह इसी का नतीजा है कि जिन इलाकों में कुछ समय पहले सूखा था, वहां भी बाढ़ का कहर बरपा है। जब भी औसत से ज्यादा बारिश होती है, तो बाढ़ आ जाती है। इसके लिए जिम्मेदार सरकारों का प्रबंधन भी है। अभी तक बारिश के पानी के संचयन के लिए कोई कारगर योजना नहीं बनाई जा सकी है। सूखा और बाढ़ जैसी आपदाओं को रोकने के लिए स्थाई समाधान जरूरी है, जो जल प्रबंधन की कारगर योजनाओं के जरिए ही पूरा हो सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से बारिश का चक्र बदला है। 1880 से 2013 तक देश के वनक्षेत्र में चालीस फीसद से ज्यादा की कमी आई है और यही वजह है कि कहीं औसत से ज्यादा बारिश हो रही है और कहीं कम। वनों के क्षेत्रफल में आई इस गिरावट का सीधा असर मौसम पर पड़ रहा है। एशियाई विकास बैंक और पोस्ट-डैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक अगले तीन दशकों में दक्षिण एशिया में बीस फीसद बारिश बढ़ जाएगी। इसकी मुख्य वजह जलवायु परिवर्तन है। यही वजह है कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियों की स्वाभाविक प्रकृति प्रभावित हो रही है। पिछले 119 साल में 2018 छठवां सबसे गरम साल रहा है। जर्नल वेदर एंड क्लाइमेट एक्सट्रीम में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन की वजह से भारत में भविष्य में भारी बारिश और बाढ़ की घटनाओं में तेजी से वृद्धि होने की संभावना है।

वहीं जिन बांधों का निर्माण कभी बाढ़ पर अंकुश लगाने के मकसद से किया गया था, अब वही बाढ़ की एक अहम वजह बन रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 1950 में 371 बांध थे, मगर अब इनकी तादाद कही ज्यादा है। दरअसल, नदियों पर बनने वाले बांध और तटबंध पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट डालते हैं। ऐसे में जब पानी की अधिकता से नदियां उफनने लगती हैं, तो तटबंध टूटते हैं और इससे आसपास के इलाके डूब जाते हैं। यह बात सही है कि प्राकृतिक आपदाओं पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के अलावा मानवीय गतिविधियों ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा जरूर दिया है। ऐसे में बाढ़ प्रबंधन के जरिए इससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है।