मुगलिया जमाने से खुशबुओं के शहर कन्नौज का अपना एक अलग रुतबा रहा है और उस रुतबे में आज भी कोई कमी नहीं आई है। बावजूद इसके कि जमाना बदला, हिंदुस्तान से मुगलों की हुकूमत गई। यहां से अंग्रेज रुखसत हुए। जमाने ने कई रंग देखे। राजनीति के राग और तर्ज बदल गए। जात और जमात के जूनून के चलते समाज के रूप-स्वरूप से लेकर प्रतिरूप में अंतर आया। विज्ञान की तकनीक इतनी आगे बढ़ गई, कुदरती नेमतों के एक से एक विकल्प बाजार में आ गए कि असली-नकली का भेद कर पाना मुश्किल हो गया। नेमत की परंपरा में नक्कालों का दखल बढ़ गया तो बेशकीमती उत्पादों की पूछ रही नहीं- बाजार में पिछले कई सालों से यही सब हो रहा है। नक्कालों और कम दाम पर विकल्प देने की तसल्ली देनेवालों ने इस इत्र बाजार पर पकड़ बनाने की कोशिश की है। इत्र निर्माण की परंपरा और उसके सामने उभरती चुनौतियां कम नहीं हैं। इत्र कारोबार के बारे में बता रहे हैं अमरेंद्र किशोर।
इत्र या अतर के प्रति दीवानगी लोगों में जमाने से चली आ रही है। इत्र को मौसम और अवसर के अनुसार उपयोग किया जाता है। राजे-महाराजे इत्र का उपयोग खूब किया करते थे। इसके दीवाने मुगलिया बादशाह और उनकी बेगमें अधिक हुआ करती थीं। इस तरह राजाओं-महाराजाओं, बादशाहों ने इत्र बनाने वालों को प्रोत्साहन दिया। इत्र बनाने वालों के केंद्र विकसित हुए। उन्हीं केंद्रों में प्रमुख रहा है कन्नौज। इत्र के कारोबार से दुनिया भर में नाम और पहचान बना चुका कन्नौज पहुंचना आसान है, क्योंकि इस शहर की पहचान आज की नहीं, बल्कि नौवीं सदी में गुर्जर प्रतिहारों के राजा मिहिर भोज के समय से है। प्राचीन भारत में इसकी व्यापारिक और अनुशासनिक महत्ता थी। बाद में वर्द्धन-पाल और राष्ट्रकूट वंश द्वारा शासित होकर ग्यारहवीं शताब्दी तक इस नगर की वैश्विक स्वीकार्यता हो चुकी थी। पालि शिलालेखों के मुताबिक ‘…यहां के राजा गोविंदाचार्य ने अपनी कूटनीतिक चातुर्य और पौरुष से कन्नौज को न सिर्फ एक मजबूत साम्राज्य की पहचान दी थी, बल्कि अपने जनकल्याण के कार्यों के चलते बेहद लोकसिद्ध भी हुए।’
कन्नौज की फिजाओं में दो तरह की खुशबू तैरती है- पहली, फूलों के शबाब से लबालब खुशबू और दूसरी जड़ी-बूटियों की सुगंधि। दोनों की अलग-अलग खासियत है और उनकी मांग और पसंद भी उनके गुणों के कारण है। फूलों से बने इत्र के तकरीबन दस से बारह तरह के उत्पाद यहां बनाए जाते हैं। इनमें गुलाब, बेला, मोतिया, केवड़ा, मोतिया, चंपा खास हैं, जिनका उपयोग शौकिया शृंगार और बहार के लिए किया जाता है। फूलों और जड़ी बूटियों से इत्र बनाने की कला में माहिर कारीगर मिट्टी इत्र भी बनाते हैं। जब पहली बारिश में पानी की बूंदें सूखी मिट्टी पर पड़ती हैं, तो उससे एक खास तरह की खुशबू आती है। उसी खुशबू वाले इत्र को मिट्टी इत्र कहते हैं। यह इत्र ‘मिट्टी अत्तर’ के नाम से दुनिया भर में मशहूर है। मिट्टी से बनने वाले और अन्य इत्रों को बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा अंतर नहीं है। मिट्टी को तांबे के बड़े-बड़े पात्रों में पकाया जाता है, फिर आसवन की प्रक्रिया द्वारा पकाई गई मिट्टी की खुशबू को बेस आॅयल के साथ संघनित किया जाता है। इस प्रक्रिया से बेस आॅयल में मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू घुल जाती है। इनकी मांग देश और विदेश हर जगह है। खस, मेहंदी, शमामा के औषधीय उपयोग होते हैं, इस कारण इनके उत्पादन और बाजार की अलग अहमियत है।
कन्नौज ने कई जमाने देखे हैं। इत्र के इस पुराने कारोबार ने बाजार के बदलते मिजाज को देखा। महफिल की रंगतों को बदलते देखा है, लेकिन इस काम मे जुटे कारीगरों ने अपने काम का तरीका और अंदाज नहीं बदला। कन्नौज को इत्र के आसवन (डिस्टिलेशन) और बनाने का तरीका फारस से मिला था। हर्षवर्धन की राजधानी रह चुका कन्नौज भले ही आधुनिकता के हर रूप और शृंगार को अपना लिया है, मगर इस शहर ने इत्र बनाने की प्राचीन कला को आज भी अपने कलेजे से लगा कर जैसे अपनी रूह को जिंदा रखा है। यह सच है कि कन्नौज ने सब कुछ बदल लिया, लेकिन अपने जीने की अदाओं को जुंबिश देती परंपराओं को नहीं बदलने दिया।
फिलहाल वहां दो सौ के करीब इत्रघर हैं, जिनमें से कई अपनी बदनसीबी ओढ़ कर अंतिम सांसें ले रहे हैं, पर ऐसा साफ दिखता है कि पूरा कन्नौज किसी-न-किसी रूप में इत्र बनाने के काम-कारोबार में मशगूल है। कहीं लोग ताजे फूलों की छंटाई करते मिल जाएंगे और उसी प्रांगण में सही माप में पानी और तेल मिलाते, निश्चित तापमान तय करते और अर्क इकट्ठा करते हुनरमंद हाथों से जैसे जादुई करतब करते लोग बिना कुछ कहे फूलों के रूह को कुप्पियों में बटोरते दिखते हैं। इन्हें देख कर लगता है कि मोहब्बत में लाख गोपनीयता बरती जाए, यह जितनी छिपी होगी, इसकी सोंधापन उतना ही परवान चढ़ती है। सरेआम, बिना झिझक के।
