सत्य
सत्य
सत्य
जन्मना विरूप।
समय ने
उड़ाया उपहास।
अविचलित वह
रहा अकेले
पथ पर अग्रसर।
युवा हुआ
उपहास बदला
सबल प्रतिरोध में।
निंदा, अवमानना के
पत्थरों की
अनवरत बौछार।
लहूलुहान, मगर
सतत संघर्षरत।
अथक।
तीसरा प्रहर।
उखड़े
सुंदर, मुखौटाधारी
मायावी शत्रु के पांव
हुआ तिरोहित।
अंतिम चरण में
सत्य
हुआ वंदनीय
कि सदियां गुजरीं-
अमृतत्व की
गाथा
कहते-सुनते!
सत्यासत्य
जुड़वां भाई हैं
सच और झूठ
चरित्र और स्वभाव
विपरीत
समान बाह्यावरण
उत्पन्न करे भ्रम
एक-दूसरे का
झूठ का दैहिक बल
प्रबल
हावी रहे
सहोदर पर
करे तरह-तरह से
प्रताड़ित
सच को आवृत्त रखे
स्वयं
मंचासीन;
लेकिन अनजान भी-
कि बदलेंगी
देर या सबेर
दोनों की भूमिकाएं!
तेजोमय सत्य
जैन मुनि की नार्इं
अनावृत्त अवस्था में
मंचारूढ़ होगा
सामने समाज के;
और वह पद-लुंठित
धूल-धूसरित होगा
समय के इतिहास का
बन कर
स्याह पन्ना!
