राज सिंह

बादलों से टकरा कर,
वसुंधरा की प्यास जो बुझा पाऊं,
पर्वतों की वह ऊंचाई,
नहीं है मेरे पास।

सोना, चांदी, हीरे जवाहरात,
और कीमती खनिज जो दे पाऊं,
ऐसी कोई खान भी,
नहीं है मेरे पास।

हरी-भरी फसलें,
जो लहलहा सकें,
मैदानों की वह शक्ति भी,
नहीं है मेरे पास।

कलकल बहती नदियों की,
चंचलता से जो निकले,
ऐसा कोई राग भी,
नहीं है मेरे पास।

फिर भी मुझे यूं,
बेकार ना समझना तुम,
फिर भी मुझे यूं,
कमजोर ना समझना तुम।

ये पर्वत, नदियां, मैदान और ये सागर भी,
एक पल भी सह न पाएं जिसे,
ऐसी भीषण ज्वाला को,
हृदय में दफन कर,
आह तक भी ना निकले,
इतनी शक्ति है मुझमें,
मुझे यूं कमजोर ना समझना तुम।

पोखरण जिसका केंद्र बिंदु,
ऐसा विशाल हृदय है मेरा,
कर लेना कितने भी परीक्षण,
परमाणु शक्ति बन जाओगे,
विश्व के मानचित्र पर,
मेरा भी नाम होगा,
मातृभूमि की रक्षा में,
मेरा भी योगदान होगा।

मुझे यूं बेकार ना समझना तुम।
मुझे यूं कमजोर ना समझना तुम।

नदिया का समर्पण

क्यों जाए नदिया से मिलने,
वह खुद ही चली आएगी।
खारा है, लेकिन सागर है,
दूर कहां रह पाएगी।
खो देगी अपना मीठापन,
चंचलता चली जाएगी।
नहीं बचेगा अस्तित्व,
वह सागर में मिल जाएगी।
प्यार नहीं यह दीवानापन,
समझ नहीं वो पाती है।
इसीलिए तो मिट कर भी,
नया जन्म पा जाती है।

भंवर

मुश्किल है कि तुम्हें पाऊं,
नामुमकिन है कि भूल जाऊं,

भंवर में फंसा हूं ,
इधर जाऊं कि उधर जाऊं,

कश्ती की पतवार,
तुम्हारे हाथ है।
ये तुम ही तय कर दो,
कि मैं पार जाऊं,
या डूब जाऊं।