विजय बहादुर सिंह
निस्संदेह कवि समाज का सबसे लाड़ला नागरिक होता है। कई संदर्भों में वह पूज्य और आराध्यवत भी हो उठता है। भारतीय समाज ने ऋषियों को भी कवियों की श्रेणी में डाल रखा है। रामायण-महाभारत के रचयिताओं और रचनाओं को ऋषियों के समकक्ष मान-सम्मान दिया ही जाता है। सत्ता-राजनीति के चलते पुराने समाजों को, खासकर वर्णव्यवस्था वाले समाज को आज जिस सत्ता-राजनीति के चलते वर्तमान जातिवादी पहचानें दी जा रही हैं, उनमें इन कवियों की भी जातियां खोज और तय कर ली गई हैं। बावजूद इस दुखद सच्चाई के वाल्मीकि फिर भी वाल्मीकि और कृष्ण द्वैपायन व्यास फिर भी वेद व्यास हैं और लोक समादृत भी। अगर इनकी रचनाएं हटा दी जाएं तो हमारी राष्ट्रीयता और संस्कृति की आधार पहचानें विलुप्त हो जाएंगी।
भारतीय कविता की ये वे कृतियां हैं जिनमें दर्शन, धर्म और सभ्यता-संस्कृति का मूर्त और सक्रिय सार अंतर्निहित है। बाद के दिनों में यही काम कालिदास और मध्ययुग के तुलसीदास जैसे कवियों ने किया। लोकसमाज इन्हें जिन कारणों से अपनी अनथक स्मरणीयता का हिस्सा बनाए चलता चला आया है, वह केवल उत्कृष्ट काव्य-कला और शिल्प के चलते नहीं है। बल्कि उन अनुभवों, विचारों और दृष्टियों के कारण है जो एक अर्थ में भारतीय मन, चेतना और जीवन के मूल्य हैं। उसके उतार-चढ़ाव, विचलन, साथ ही दृढ़ता, अस्खलन और अपराजेयता के बिंब भी हैं। लोक की सहज चेतना में इनकी कालजयिता का कारण यही है। अतिशयोक्ति अगर न माना जाए तो वे दो-उपनिषदों, बुद्ध और महावीर को वाणियों का सार-कथन इनमें प्रतिबिंबित होकर सुरक्षित है। भारत की कविता इसी रूप में, समाज के प्रति, अपना फर्ज निभाती आई है। अपने इस दायित्व-निर्वाह के चलते वह सतत लोकमान्य और समादृत रही है।
मध्यकाल में से तो और भक्तों की कविता ने भी, अपनी समूहिकता में इस दायित्व को निभाया और स्मरणीय बने हुए हैं। इनमें अधिक परिपूर्णता के साथ जिस संत और भक्त कवि को लेकर जीवन ने प्रचुर मान दे रखा है उनमें प्रमुख हैं- कबीर और तुलसी। कबीर ने समाज को सड़ती हुई रूढ़ियों की निर्मम चीर-फाड़ और तीखी आलोचना को तो तुलसी ने उस समन्वयी राह को चुना जो भारतीय मन के अधिक करीब रही। मेरी दृष्टि में ये दोनों एक-दूसरे के पूरक कवि हैं। दोनों को एक साथ समझ कर ही भारत के समाज और उसकी कविता को समझा जा सकता है। अन्य जो कवि गण हैं, याद उनकी भी की जाती है, किंतु ऐसी और उतनी नहीं, जितनी इन दोनों की।
इनके अलावा आधुनिक समयों में कई बड़े कहे और माने जाने वाले कवि एक विशेष ऐतिहासिक भूमिका के ही कवि माने जाएंगे। मसलन, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, बच्चन आदि। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को अलग कर अगर इन कवियों को देखें तो केवल श्रेष्ठ काव्य-तत्वों के आधार पर इनके मूल्यांकन में कठिनाई आ सकती है। यह भी अगर मान लें कि प्रत्येक प्रतिभाशाली कवि अपने काव्य सिद्धांत स्वयं साथ लेकर आता है, तब भी क्या? भारतीय समाज कभी भी कला के लिए, या कविता के लिए कविता का तर्क मानने को तैयार नहीं होगा, आलोचक और साहित्य शास्त्रवादी भले ही टेका लगाते रहें। इस संदर्भ में उस पुरानी परंपरा को पास जाने योग्य कोई कविता अगर समर्थ है तो एक हद तक वह छायावाद की कविता है, जिसने प्रसाद और निराला जैसे को महान व्यक्तित्व दिए। निश्चय ही, इनमें भी अपने समय की राजनीति का भरपूर दबाव और उसकी प्रतिध्वनि है, पर इससे कहीं अधिक वह राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना है, जिसे यह जाति हमेशा से जीती आई है। ये केवल पुरखों की शौर्य गाथाएं नहीं हैं। उस जीवन की आभाएं भी हैं, जिसे अटूट भारतीय जीवन कहते हैं, जो इन्हीं अर्थों में एक प्रकार की सनातनता है, जो अतीत की सामर्थ्य और वर्तमान की शक्ति और ऊर्जा से निरंतर समृद्ध और बलवती होती चली आई है। कोई भी कविता इन्हीं आधारों पर किसी जाति-विशेष की जातीय या राष्ट्रीय कविता बनती है, अन्यथा वह एक काल-विशेष को कविता बन कर रह जाती है।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की कविता, जिसे आजादी के बाद की कविता कह सकते हैं, उसने भारतीय गणतंत्र की मूल्य विच्छिति को समूचे लोकजीवन की मूल्यजीविता के रूप में देखते हुए जिस तरह का रवैया अपनाया है, वह शोचनीय है। यह कविता सत्ता-राजनीति और तंत्र को समूचा लोकजीवन मान बैठी, यहां तक कि उसे ही देश और उसकी अंतश्चेतना का पर्याय भी। उसकी निगाह उस व्यापक लोक समाज की ओर नहीं जा सकी, जो रामायण-महाभारत या औपनिषदिक मूल्य छवियों में जीने की छटपटाहटों से भरा हुआ है। सत्ता-राजनीति और उसके दुश्चक्रों को भेदने में इस कविता ने इतना श्रम जाया कर दिया कि अब उसे प्रतिपक्ष की ही कविता कहना उचित होगा। पर सत्ता और प्रतिपक्ष की तरह कविता ने भी पक्षधरता के नाम पर जैसी राजनीतिक उन्मुखता प्रदर्शित की, उसमें यह पूछने का मन होता है कि क्या राजनीति ही भारतीय जन-जीवन का एकमात्र मूल्य है? क्या समूचा भारतीय जीवन, गांधी जिसके अगुआ थे, केवल राजनीति को एकमात्र केंद्रीय तत्व मानते थे? या फिर समूचा भारतीय लोकजीवन और उसकी अन्यमान्य शक्तियों और रुझानों के साथ, उसकी असंगतियों पर भी उनका ध्यान था? क्यों उन्होंने प्रार्थनाएं की, क्यों दरिद्र को ही नारायण कहा, क्यों यह सोचा और कहा कि जो बुनियादी श्रम करे उसे ही खाने और पहनने का हक है और एक कर्मप्रधान जीवन की ओर इशारा करते हुए कहा- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। गांधी उन गाल बजाने वाले पंडितों को कोई मूल्य नहीं देते, जिसमें भारत के मध्यवर्गीय लोग और कथित रूप से बौद्धिक आते हैं। ‘गोदान’ के मेहता और मालती जैसे लोग। गांधी की बात अगर छोड़ दें तो कई एक समाजविज्ञानी यह कहते हुए मिलते हैं कि आजादी के बाद का बौद्धिक वर्ग एक प्रकार से परजीवी वर्ग है, जो दूसरों के श्रम पर न केवल पलता है, बल्कि मौज-मस्ती भी उड़ाता है। एकाध तो उस मोनोकल्चर सांस्कृतिक-एकरूपता को जीने वाले इस परजीवी-उपभोक्ता समूह को याद दिलाने की कोशिश करता है कि पराधीन दिनों के गांधी और रवींद्र क्योंकर विश्व पूज्य बने हुए हैं, यह सोचने की आज जरूरत है। उनके बाद आजाद भारतीय समाज यह उर्वरापन क्यों नहीं दिखा पाया?
माना कि अब यह देश केवल किसानों का देश नहीं कहा जा सकता, जबकि किसान आबादी धीरे-धीरे मजदूर या छोटे-छोटे काम-धंधों के लिए कस्बों, नगरों, महानगरों तक की ओर बढ़ चली है, तब भी उसका मानस अब भी बुनियादी चेतना-धरातलों पर किसानी ही है। उसके तीज-त्योहार, पर्व और उत्सव वही हैं- बस रूप और शैली बदल गई है। शहरी जनमानस एक प्रकार से उस हॉच-पॉच शैली को जी रहा है, जिसमें आधुनिकता एक ऊपरी लिबास की तरह, तो पुरातनता अंर्तवस्त्र जैसी लिपटी हुई है। कविता की अब यह एक मिश्रित चुनौती है। आज का कवि इस चुनौती से तभी निपट पाएगा, जब वह किसी सत्ता-प्रतिस्पर्धी दल का कैडर पोएट या सेवा-दल और ‘संघ’ आदि के विचारों और दृष्टियों से बंध कर वैचारिक गुलाम न हो चुका हो।
सच यह भी है कि मध्यवर्गीय मानस वाला यह कवि अपनी जिन दबी-छिपी कैरिअरजीवी मंशाओं से जुड़ा है, उसके लिए तो यह चुनौती कठिन ही है। फिर भी मुगालता उसका यह है कि वह समय का ‘हीरो’ कवि है, जबकि उसके चरित्र का दोमुंहापन और असरवाद छिप भी नहीं पा रहा है। ऐसे कवियों के बीच जिन तपस्वी कवियों की याद आती है, वे विरले हैं। तपस्वी उन्हें इसलिए कह रहा हूं कि अपने शब्दों के लिए उन्होंने कठिन त्याग किया है। मध्यवर्ग के ‘ग्लैमरस’ जमातों में शामिल होने के बजाय उन्होंने स्वयं को, इतनी प्रतिभा के बावजूद जन सामान्य में रह कर उसकी विश्वसनीयता अर्जित की है। कविता अगर जीने की शर्तों पर लिखी जाती है, तो इसे इन्होंने जीकर दिखाया भी है। इन्होंने अपनी चेतना को कभी गिरवी नहीं होने दिया। हमेशा भारतीय कवि के स्वाभिमान को हर कीमत पर जीने की कोशिश की। यही तो इनका कठिन तप था। या फिर सारस्वत यज्ञ। अपने इस चरित्र के बल पर ये लोक के विश्वसनीय नागरिक और चेहरे बने।
परवर्तियों का यह मुगालता बना हुआ है कि ये भारतीय कवि के सबसे भरोसेमंद संस्करण हैं। इनका दूसरा मुगालता यह है कि समस्त साहित्य विधाओं के बीच कवि और कविता ही केंद्रीय विधा अब भी है। सच जबकि यह है कि केंद्र में फिर से कथा और कथाकार आ चुके हैं। कवियों के विपरीत जल्दी ही आलोचकों की वह पांत आएगी, जो यह विचार कर सकेगी कि विचारधारा की गुलामी करने वाले कवियों का समाज, सत्ता-समीपी और सत्तामुखी होकर कहीं कवियों के उस दरबारीपन की याद तो नहीं दिला रहा, जो व्यापक लोकसत्य की अनदेखी करते हुए ऐसी कविता रच रहे थे, जिसमें कलात्मक कारीगरी तो भरपूर थी, किंतु जीवन-सत्य नदारद। उनके द्वारा लक्ष्य किए गए विषय और जीवनानुभवों की पकड़ पाठक समाज के बीच समादृत हैं।
आजादी के पहले के प्रेमचंद और प्रसाद की तरह की प्रतिभा जोड़ी आजादी के बाद का समाज उत्पन्न नहीं कर पाया भले ही हमारे पास अज्ञेय, रेणु, नागर्जुन, निर्मल वर्मा और कृष्णा सोबती हों। हम चाहें तो इसमें मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई और भवानी मिश्र जैसे नाम भी जोड़ सकते हैं। व्यापक और गहरी भावभूमियों पर संरचरण करने वाले ये लोग अपनी यत्किंचित सीमाओं के बावजूद विरल हैं। पर क्या पता भारत का व्यापक और विविध जीवन विश्वासों को जीने वाला विशाल भारतीय समाज इन्हें कबीर-तुलसी की तरह स्वीकार भी करेगा या नहीं?
