संध्या का आकाश हताहत है
क्षीण होता प्रकाश और दुर्बल होता है
तारों के झिलमिल क्रंदन में ऊंघता
थका हारा अखिल सुन्न में सिमटता है
उसमें कल्पलता से विक्षुब्ध हो
एक पत्ती थरथराती कांपती-सी गिरती है शून्य प्रांतर में।
उस पत्ती से चिपकी एक बूंद-सा मैं
तुम्हारे माथे की बिंदी सा मैं
विलग होने से डरा हारा मैं
तुम्हें पुकारता हूं
मत धोओ सिंदूर अर्चित भाल
मत गीला करो संध्या सा कपाल।
तुम अनसुना कर अदृश्य हो जाती हो
तो संध्या का आकाश और निरंकुश हुंकारता
पसरता जाता है अनंत तक
समूची वसुधा पर राख और सिंदूर की मोटी परत लेपता।
मैं कह नहीं पाता हूं किसी से
देखो नभ के पाए कंपकंपा रहे हैं
देखो नक्षत्रों में कोलाहल है
देखो अंतरिक्ष हाहा करता विकल है
अब कोई सुनता नहीं किसी का हंसना रोना
यह कैसा युग है कैसा इसमें पाना होना
कैसा राग विराग और कैसी सब आंखें सूनी
जैसे भस्मावृत दिन जिसमें है रात रमाए धूनी?

तटस्थता

इस धरती
और सकल सृष्टि में
कहीं कोई तटस्थ नहीं है।
जिसे जहां होना है
वहां भले न दिख रहा हो
लेकिन वो वहीं है।
एक बाल के टूटने पर
कंघी चुपचाप रोती है
एक गौरैया दुर्बल तिनके से
अपना घोंसला बुनती पिरोती है।
जो चीख पुकार पर भी रहता है मौन शांत
उसके भीतर भी समाधिस्थ रहता है दुर्दांत।

यात्रा में घर

घर से निकलता हूं
घर से बहुत दूर जाने के लिए
पर कहीं भी चला जाऊं
घर साथ-साथ चलता है।
जब भी लौटता हूं
एक लोटा पानी बन कर मिलता है
एक चारपाई बन कर मिलता है
एक दांत काटी रोटी सा
सरल और महक लेकर चुप रहता है।
बिना बोलचाल
पूछता है हाल।
सबसे अधिक सहता है घर
और कभी कुछ नहीं कहता है घर
खाली कर दो या कूड़े से भर दो
खुला छोड़ दो या मुंह पर ताले भर दो
चुप रहता है घर।
लेकिन जब कोई घर में रोता है
सुबकता किसी एक कोने में
घर नहीं रह जाता घर।
घर को पता है
वे रोने के लिए नहीं बने।
तब घर श्मशान हो जाता है
बिना कुछ बोले बिलखता हुआ
मकान हो जाता है
घर साथ नहीं छोड़ता तब भी
ऐसे में वह कब्रिस्तान की तरह साथ होता है
न सुने कोई ऐसी रुलाई रोता है।
डूब जाओ बह जाओ खो जाओ
या बिखर जाओगे
तब भी घर को साथ पाओगे।