राजेश चंद्र शर्मा
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं
भीतर जग की शक्ति यह सारी भरकर
अंधड़ अथाह पवनों पर सहसा चढ़कर
आकाश से ऊंचा जो और कुछ हो
जाकर, लपककर उसे भी मैं छू लूं
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं।
जाते हुए मुझको जो कोई बुलाए
चाहे पराया या अपना कहलाए
भली-भांति इस मन के कहने को
अधूरा न पर कभी मैं छोड़ पाऊं
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं।
पहुंचूं वहां जहां देवता रहते हों
लोग जिसे घर इंद्र का कहते हों
छिपते-छिपाते सबसे बचते-बचाते
कोष हरष के सारे नीचे बिखराऊं
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूंमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं।
हो कोई सपना या फिर सच्चाई हो
इच्छा से मेरी सब जगह पहुनाई हो
आत्मा हूं मैं यह जान-पहचान करके
तन छोड़ कर मन में ही बस जाऊं
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं।
सुख-दुख है क्या सब कुछ भुलाकर
इनसे बहुत दूर बहुत दूर जाकर
छांव में आनंद की यह जीवन बिताता
अनंत एक आनंद ही मैं हो जाऊं
कहे मेरा मन मैं आकाश को चूमूं
मस्ती में झूमूं, सपनों में घूमूं।

