रावेंद्र कुमार रवि

चिड़िया ने
दर्पण में देखी,
जब अपनी भोली तस्वीर!

चोंच लड़ा
वह उससे बोली,
‘’आजा बाहर, खेल रचाएं!
चुन-चुनकर फूलों के मोती,
इंद्रधनुष पर धर-धर आएं!’’
‘‘फिर खाएंगे
दोनों मिलकर,
आज मखाने की रसखीर!’’

लाख जतन
करने पर भी जब,
वह निकली, ना बाहर आई!
उसने देखा गुस्सा होकर,
वह भी है कुछ-कुछ गुस्साई!

तब बोली,
‘‘जो आती बाहर,
तुझे घुमा लाती कश्मीर!’’