सेरुका और सिंघाड़े के
दिन आए फिर जाड़े के।

तन पर भारी सजे हैं कपड़े
दिखते हैं सब मोटे-तगड़े
दिन न नंग-उघाड़े के
दिन आए फिर जाड़े के।

शीत से करने हाथापाई
निकले कंबल और रजाई
कुछ खुद के कुछ भाड़े के
दिन आए फिर जाड़े के।

ठंड से बचने का है इरादा
ताप रहे हैं बैठे दादा
निकट मवेशी बाड़े के
दिन आए फिर जाड़े के।

ठंड से रखो खुद को बचा कर
व्यापी तो मानेगी सता कर
बैठी द्वार-किवाड़े के
दिन आए फिर जाड़े के।