दिव्या विजय
आज एक सुनहरा दिन है। बहुत देर हुई, सूरज कहीं जा छिपा है, पर दिन के सुनहरेपन में कमी नहीं आई है। दिन के रंग आसमान में नहीं, मन के किसी कोने में छिपे होते हैं। वहीं से निकल कर वे आसमान में छितरा जाते हैं। उस रंग के अक्स में दुनिया कभी चमकती हुई दीख पड़ती है, कभी बुझती हुई। जैसे आज उदासियों की तमाम वजहों के बाद भी आरुष का दिन इंतजार के गाढ़े रंग में डूब कर सुनहरा हो गया है।
‘सर, सर लाल वाले स्केट्स मैं लूंगा।’ विचारों के समुद्र में इस आवाज ने नन्हा-सा पत्थर फेंका। आरुष ने देखा, सफेद स्कर्ट वाली लड़की को पछाड़ते हुए वह लंबा, छरहरा लड़का जूतों को स्केट्स की तरह घसीटते हुए उसके आगे आ खड़ा हुआ। पीछे मुंह बिसूरती वह लड़की धीरे-धीरे आ रही थी। आरुष हंसा और दो जोड़ी लाल स्केट्स निकाल कर रख दिए, जिन्हें देखते ही लड़की खिल गई। लड़के ने देखा तो जल्दी-जल्दी स्केट्स पहनने लगा। ‘आज भी मैं फर्स्ट आऊंगा।’ वह लड़की को फिर चिढ़ाने लगा। आरुष ने उसे हल्की-सी चपत लगाई। देख कर लड़की खिलखिलाने लगी। थोड़ी देर बाद हाथ पकड़े हुए वे दोनों स्केटिंग रिंक में थे। देखकर आरुष मुस्कुराने लगा। वह जानता है कि कुछ देर बाद दोनों का फिर झगड़ा होगा। दोनों गुत्थमगुत्था हो जाएंगे और उसे रिंक में जाकर दोनों को अलग करना पड़ेगा। सब कुछ रोज की तरह है, पर उसके भीतर कुछ है, जो इन दिनों अलग हो चला है।
भरे हुए बादल गढ़वाल टैरेस के ऊपर बह रहे हैं। दूर देवदार और चीड़ के वृक्ष हवा में डोल रहे हैं। कटोरे-सा देहरादून सामने नजर आ रहा है। कुछ ही घंटों बाद जब सुनहरापन डूबने लगेगा तब वहां बत्तियां जल उठेंगी। बत्तियां यहां से लहरों की तरह दिखती हैं। हिलती-तैरती हुई। अगर वह इस वक्त नीचे उतरे और सचमुच रोशनियां उसे ऐसी ही मिलें, लप-झप करती हुई, तो वह क्या करेगा? वह जरूर उन्हें हाथों में भर लाएगा और रोप देगा, उसके बालों में। इतने लंबे बाल इन दिनों उसने नहीं देखे। मां के बाल इतने ही लंबे हुआ करते थे। मां जिस दिन गुजरी उस दिन उसने अपने हाथों से उनकी चोटी की थी। मां की त्वचा बुढ़ा गई थी, पर बाल आखिरी समय तक युवा थे। आरुष को यकीन है रपंजेल के बाल भी कभी बूढ़े नहीं होंगे। लेकिन वह तो घूमने आई है। जल्द ही यह शहर छोड़ देगी। वह कभी नहीं जान पाएगा उसके बाल बूढ़े हुए या नहीं। हो सकता है वह फिर यहां लौटे और आरुष जान सके उसके बालों का क्या हुआ। लेकिन वह क्यों लौटेगी! यहां लौटने जैसा है ही क्या!
रूही का बड़ा सहारा है उसे। वह न होती तो कॉलेज और नौकरी दोनों एक साथ चल ही नहीं पाते। स्केटिंग भी तो वह गजब की करती है। लगता है जैसे स्केटिंग रिंक में कोई बैले डांसर उतर आई हो। यों वह अक्सर वहां आती है, लेकिन जिस दिन वह रिंक में उतरती है उस दिन भीड़ जुट जाती है। वह स्केटिंग करती है, तो लगता है जैसे आसमान से सीढ़ी लगा कर सितारे फिसलते हुए आ रहे हैं।
रात ग्यारह बजे बाद जब भीड़ छंट जाती है तब कभी-कभी वे दोनों एक साथ स्केटिंग करते हैं। रूही का हाथ आरुष की कमर के इर्द-गिर्द लिपटा रहता है। ठंड से भीगी रात में कमर का वह एक भाग गर्म रहता है। आरुष को यह गर्माहट भली लगती है। खाली मॉल रोड पर मद्धम संगीत गूंजता है। पेड़ों के नीचे से अपनी दुकान समेटते गुब्बारे वाले, खिलौने वाले, सब ठहर कर उनकी ओर देख कर मुस्कुरा देते हैं। कभी बहुत ऊपर से, कोई बहकी हुई धुन चली आती है, जिसका उस मद्धिम धुन से कोई मेल नहीं बैठता, लेकिन दोनों धुनें मिल कर जुगलबंदी साध लेती हैं। रिंक में वे दोनों होते हैं और बाहर कुर्सियों पर पसरे उनके दोस्त… उनींदी हो चुकी रात में उन्हें मंत्रमुग्ध हो देखते हुए। दोनों के बीच अचानक शर्त लगती है और वे खाली मॉल रोड पर उतर आते हैं। दोनों में से कोई किसी को नहीं पछाड़ पाएगा, यह दोनों जानते हैं, फिर भी दोनों यह खेल नहीं छोड़ते। इस प्रतियोगिता का अंत क्लॉक टावर पर संग पहुंच कर एक लंबे-गहरे चुंबन के साथ होता है। जब तक वे लौटते हैं तब तक सब जा चुके होते हैं। वह रूही को घर छोड़ता है। उसकी मां की परछार्इं परदे के पीछे से हाथ हिलाती है। बदले में वह भी हाथ हिला कर अपने घर चला आता है, जहां सब सो चुके होते हैं। बस ठंडी रात का उजला चांद उसकी प्रतीक्षा में रहता है। इन दिनों रूही नहीं है। वह स्केटिंग की किसी प्रतियोगिता में चंडीगढ़ गई है। इन दिनों ओस में भीग कर चांद भी पनीला रहने लगा है।
आरुष ने कलाई घड़ी पर निगाह डाली। छह बजने वाले हैं। लगभग आधा घंटा और। दिन भर भटकने के बाद लौटते वक्त रपंजेल यहां आती है। कुछ देर यहां ठहर कर खाना खाने चली जाती है। तीन ही दिनों में आरुष को उसके बारे में बहुत कुछ मालूम हो गया है। मसलन, उसका पसंदीदा रेस्तरां, उसके पसंदीदा गाने और उसके पसंदीदा रंग भी। वह तीनों दिन उसी रेस्तरां में गई, जो सबसे अच्छा शाकाहारी भोजन देने का दावा करता है। कुछ दुकानों पर रुक कर उसने खाने की सूची पढ़ी, लेकिन वह वहां गई नहीं। नहीं, वह उसका पीछा नहीं कर रहा था। मॉल रोड के बीचोंबीच स्थित इस जगह से दोनों ओर की सड़क दिखाई पड़ती है, बगैर कोशिश किए। उसने तीनों दिन हिंदी गानों पर अपनी गर्दन मटकाई और पैरों से थाप दी। इसीलिए जब भी वह यहां आती या सामने से गुजरती है वह अंग्रेजी गाने हटा कर हिंदी गाने चला देता है।
जब वह पहली रात आई थी तब यों ही आई थी… एक पता पूछते हुए। उसे देखते ही फैजान ने आरुष को बुला लिया था। फैजान उसे पता बता सकता था, लेकिन यह वही थी, जिसे मॉल रोड पर टहलकदमी करते देखने के लिए आरुष दिन भर रेलिंग के पास खड़ा रहा था। हां, उस दिन उसने कहीं भी जाना स्थगित कर, नियम तोड़ कर बहुत जल्दी स्केटिंग रिंक खोल दिया था। उस रोज सुबह ही तो उसने उसे पुरुष और चार-पांच साल के बच्चे के साथ रिक्शे से सामान उतरवाते देखा था और वह कॉलेज जाने के बजाय यहां आ गया था। फैजान से उसने कुछ कहा नहीं था, लेकिन वह जान गया था। तभी तो उसके आने पर खुशी से लबलबाते हुए उसने आरुष को आवाज दी थी। दोस्त आंखें पढ़ लेते हैं, तिस पर फैजान तो उसका पक्का वाला दोस्त है।
जब वह आई तो आरुष कमरे के भीतर था। उस दिन वह रिंक में नहीं उतरा था। शाम से कमरे के भीतर चुप बैठा था। सब समझ रहे थे कि रूही के न होने से वह उदास है, पर वह उदास नहीं था। वह ट्रांस में था। वह रूही से प्रेम करता है, फिर क्यों किसी अपरिचित स्त्री को देख वह इस तरह बेचैनी से घिर गया है। किसी को एक बार देख लेने भर से उसका वजूद इस तरह हावी हो जाए कि उसके अलावा कुछ भी सोचना मुमकिन न रहे, यह बात अजीब थी, पर उसके साथ घट रही थी।
वह बाहर आया तो उसने देखा, वह खड़ी थी। रात के दस बज रहे थे। इस वक्त! वह तो शाम को जा चुकी थी। उसे मालूम तो नहीं हो गया कि वह आज पूरा दिन उसे देखता रहा है। उसके गाल सुर्ख हो गए। वह उसके पास आकर खड़ा हो गया। मीठी, भीनी खुशबू का भंवर वहां डेरा डाले हुआ था। शायद वह अभी नहा कर आई थी। उसके बालों की नमी वह महसूस कर रहा था। उसने एक बार फिर पता पूछा। आरुष को पता मालूम नहीं था। उसे यहां के बारे में सब पता है, फिर इस जगह का नाम उसने क्यों नहीं सुना। अपनी हैरानी छिपाते हुए वह बोला, ‘आपको स्केटिंग करनी है तो आप यहां भी कर सकती हैं।’
‘नहीं। दरअसल,’ कह कर वह चुप हो गई। उसकी चुप्पी शुष्क थी। उसके चेहरे की तरलता के उलट। उसने अपना मोबाइल निकाला और तस्वीरों के फोल्डर में कुछ खोजने लगी। वह एक ब्लैक ऐंड वाइट तस्वीर थी। ‘मैं यह ढूंढ़ रही हूं। आप स्केटिंग सिखाते हैं, तो सोचा आपको मालूम होगा।’ वह जगह नहीं पहचान पाया और ना में गर्दन हिला दी। वह अठारहवीं सदी की कोई तस्वीर थी, जिसमें लोग बर्फ पर स्केटिंग कर रहे थे। ‘यह तस्वीर मैंने किसी जर्नल में देखी थी।’
आरुष उसके बालों की नमी देख रहा था। वह शुक्रिया कह कर पलटने को हुई कि फैजान कनखियों से उसके साथ वाले आदमी की ओर देखता हुआ बोला, ‘आप स्केटिंग करने आइएगा।’ आदमी कुछ दूर खड़ा सिगरेट फूंक रहा था। बच्चा प्रैम में सो रहा था। आदमी की चेहरे पर कुछ नागवारी थी। यह बात इतनी दूर से भी सबने महसूस की। उसने स्केटिंग के लिए हां नहीं कहा था। लेकिन उसने शुक्रिया कहा था। उसका शुक्रिया देर तक हवा में गूंजता रहा।
‘अब तो रिंक में आ जा।’ फैजान पूरे जोश में चिल्लाया और म्यूजिक सिस्टम की आवाज बढ़ा दी। फैजान को इंतजार था कि वह पलट कर एक बार देखेगी। इंतजार उसे भी था, लेकिन उसने नहीं देखा। वह कॉफी शॉप की तरफ चली गई और वह रिंक में। उस रात वह पहली बार रूही के बिना देर रात तक स्केटिंग करता रहा। तब तक, जब तक वह कॉफी पीकर लौटते हुए नहीं दिखी। वह स्केटिंग रिंक की बत्तियां बंद करके अंधेरे में खड़ा हो गया, जहां से वह उसको देख सकता था, पर रपंजेल उसे नहीं देख सकती थी। लौटते हुए उसकी आंखें नींद से बोझिल थीं। अपना शॉल उसने सिर के चारों ओर कस कर लपेटा हुआ था। उसके लंबे बाल उसकी स्कर्ट की किनारी तक पहुंच रहे थे। बच्चा अब भी सो रहा था।
उस दिन के बाद वे दोनों दिन, शाम को यहां आई, पर कुछ नहीं बोली सिवा एक अस्फुट शुक्रिया के। जब वह सुबह यहां से गुजर कर जाती है, न उसकी आंखों में पहचान कौंधती है न होंठों पर मुस्कुराहट। लेकिन वह उसे देखती है… इस तरह जैसे यह देखना ही अंतिम सत्य है। इस देखने के अलावा संसार में हर बात आधारहीन है। वह इस देखे जाने के हर क्षण को पीता है। उसे मालूम है, वह जल्द ही चली जाएगी। फिर कोई उसे यों नहीं देखेगा। रूही भी नहीं।
उसे खयाल आया कि रपंजेल को यहां आए तीन दिन पूरे हो गए हैं। आज चौथा दिन है। अगर वह आज नहीं आई तो? हो सकता है जाने से पहले उसे सामान बांधना हो या ऐसी जगहें देखनी हों जो उसने अभी तक न देखी हों और आज वह सब देख लेना चाहती हो। लेकिन तब भी वह सब नहीं देख पाएगी। सोच कर उसे दुख हुआ। वह रपंजेल को बिनोंग पहाड़ी पर स्थित ज्वाला मंदिर ले जा सकता था। उसने वह निश्चित तौर पर नहीं देखा होगा। कहीं वह भी गिनी-चुनी जगह देख कर न चली जाए। आज वह आएगी तो आरुष उससे पूछेगा कि वे लोग कहां घूमे। फिर वह उसे बताएगा कि उसे कहां घूमना चाहिए। लेकिन वह बात कैसे शुरू करेगा? सोचा तो उसने कल भी यही था कि उससे बात करेगा।
कल उसने पीला दुपट्टा ओढ़ा था। वही दुपट्टा जो बार-बार उसके कंधे पर से उतर रहा था। दुपट्टे का आधा भाग उसने बेंच पर फैलाया और अपने बेटे को बिठा दिया। उसे लगा होगा कि बेंच गरम है या शायद बच्चे को चुभेगी। आरुष ने अपनी कुर्सी से गद्दी हटा कर उसे पकड़ा दी। उसने धीरे से कुछ कहा जिसका अर्थ शुक्रिया हो सकता था या हो सकता है उसने कहा हो इसकी क्या जरूरत थी। आरुष उसे पास से देखकर हड़बड़ा गया था, इसलिए ठीक से सुन नहीं सका। यहां बात शुरू की जा सकती थी, किंतु वह तुरंत स्केटिंग रिंक में चला गया और बहुत देर तक उसकी ओर नहीं देखा। बाद में उसने देखा बच्चा गद्दी पर बैठे हुए आराम से सो गया। बच्चे का सिर उसकी गोद में था और वह एकटक स्केटिंग रिंक के पार घाटी देख रही थी। उसने न जाने क्या सोच कर म्यूजिक सिस्टम पर गाना बदल दिया।
‘बोल दो न जरा, दिल में जो है छिपा, मैं किसी से कहूंगा नहीं।’
उसने ऐसी हरकत पहले कभी नहीं की थी पर कल वह खुद को रोक नहीं पाया। रूही होती तो नाराज होती। नहीं, वह उसको चिढ़ाती और तब तक हंसती जब तक उसकी आंखों से आंसू न बहने लगते। लेकिन अगर वह होती तो यह होने पाता! वह उसको इस तरह देख पाता या वही उसको इस तरह देखती? हां, पिछले तीन दिनों से एक-दूसरे को देखना उनके अस्तित्व का इतना बड़ा सच हो चला है कि कोई और सच उसे ढक नहीं पाता। भले ही वह रूही हो या वह आदमी जो अभी आता ही होगा।
गाने के बोल बदलते ही रपंजेल ने गर्दन उठाई। उसके गर्दन उठाते ही रूही खो गई। दोनों ने क्षणांश भर को एक-दूसरे को देखा। रपंजेल की आंखों का वह अजाना भाव गहरा गया। इतना गहरा कि वह सदा के लिए उसके भीतर खो सकता था। आरुष को महसूस हुआ कि ऐसे गानों के साथ वह ज्यादा सुंदर लगती है। उसने तय किया कि जब तक वह यहां है, वह ऐसे ही गाने बजाएगा। रूही के अंग्रेजी गानों की पेन ड्राइव उसने दराज में रख दी।
उसने घड़ी देखी। समय हो चला है। वह रेलिंग पर झुक कर खड़ा हो गया है। कल या परसों से उसका आना, अतीत हो जाएगा। वह तब भी इंतजार करेगा। हो सकता है वह रुकना चाहे पर बच्चे की वजह से उसे जाना पड़े। उसने प्रार्थना की कि बारिश न हो। उसी प्रार्थना के बीच एक लड़का आया और उस से स्केट्स मांगे। लड़के का आना उसे प्रार्थना कबूल होने जैसा लगा। उसने उसके पैर देख कर अंदाज से उसकी नाप के स्केट्स निकाले और उसके गाल थपथपा दिए। लड़का खुश होकर स्केट्स पहनने लगा और वह खड़ा होकर वह फिर उधर देखने लगा जिधर से वह आ रही थी। अब उसका चेहरा दिखने लगा था। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कुछ नहीं था, यहां तक कि खालीपन भी नहीं। बच्चा उसकी गर्दन में मुंह छिपाए चिपटा हुआ था। वह आदमी उसके साथ नहीं था। रोज की तरह वह कहीं रुका होगा और थोड़ी देर बाद उन दोनों को ले जाने आएगा। उसने आरुष को देख लिया था। अब वह उसको वैसे ही देख रही थी जैसे उसके अतिरिक्त देखने को वहां कुछ नहीं है। इस बार आरुष ने नजरें नहीं फेरीं। देखने का प्रत्युत्तर देखना ही हो सकता है, इसलिए वह देखता रहा… घूंट-घूंट।
वह भीतर आई तो उसकी रोज की जगह पर एक स्त्री बैठी थी। वह बच्चे को लेकर खड़ी रही, जगह खाली होने के इंतजार में। वह कहीं और नहीं बैठना चाहती। यह जगह कमरे और रिंक के सबसे नजदीक है। आरुष दोनों में से किसी भी जगह रहे, यहां बैठने से वह उसके पास रहेगी। आरुष भी यही चाहता है कि वह यहीं बैठे। उसके जाने के बाद वह इस जगह से कुर्सी हटा देगा। वह कभी लौटेगी तो अपनी जगह खाली पाएगी।
कुर्सी पर बैठी औरत उठी तो वह बैठ गई। आरुष ने गाना बदल दिया। वह स्केटिंग रिंक में आ गया। आज सप्ताहांत पर बहुत भीड़ थी। रोज आने वाले बच्चों को उसने कुछ टिप्स दिए। स्केटिंग रिंक के भीतर उसे सिर्फ एक ही खयाल आ रहा था कि आज उसे कुछ बात जरूर करनी चाहिए। तभी उसे सड़क पर चलते आदमी के घुंघराले बाल दिखे। वह शायद यहीं आ रहा था। अब वह उसकी रपंजेल को ले जाएगा। वह रिंक से बाहर आ गया। वह उसके पास जाना चाहता था, लेकिन कमरे में चला गया। रपंजेल ने भी शायद आदमी को देख लिया था। वह बच्चे की उंगली थामे खड़ी हो गई। उसने बच्चे के कान में धीरे से कुछ कहा।
बच्चा उस तक आया और अटकते हुए पूछा, ‘आप स्केटिंग सिखाते हैं?’
उसने रपंजेल की ओर देखते हुए हां कहा। बच्चा वापस उस तक गया। उसने फिर कान में कुछ कहा। बच्चा आरुष के पास आया और कहा, ‘हम अगले साल फिर आएंगे। आप हमें स्केटिंग सिखाना।’
‘हां, जरूर। तब तक आप भी कुछ बड़े हो जाएंगे।’ उसने उसकी छोटी उंगली थामते हुए कहा। यह वही उंगली थी, जिसे थाम कर वह खड़ी हुई थी। उसे यह स्पर्श बहुत अच्छा लगा। वह इस नन्हे हाथ को छोड़ना नहीं चाहता था।
वह बाहर खड़े होकर मुस्कुरा रही थी। उसने पहली बार उसे मुस्कुराते देखा है। न, दूसरी बार। मुस्कुराने से उसके गालों में गड्ढे बनते हैं। वह वहां अपनी नाक टिका देना चाहता है। उसने देखा, आदमी उन्हीं की ओर बढ़ रहा था। उसने एक कागज पर जल्दी से एक सूरज बनाया, एक फूल उकेरा और नीचे लिखा, इंतजार। यह कागज का टुकड़ा उसने बच्चे की मुट्ठी में खोंस दिया। तब तक बच्चे ने आदमी को देख लिया था। बच्चा अपनी मां के पास लपक कर गया और उसके हाथ में कागज का टुकड़ा थमा कर किलकता हुआ आदमी के पास दौड़ गया। उसने देखा रपंजेल ने कागज का टुकड़ा हाथ में पकड़ी किताब के हवाले किया और मुड़ गई। वह रपंजेल की पीठ देख रहा था। उसकी पीठ सर्पिल नदी थी। लंबे बाल हवा में उड़ रहे था। उसने सोचा किसी दिन वह उन बालों को छुएगा।
अब वह किसी चेहरे को यहां दोबारा देखेगा तो उसे हैरानी नहीं होगी। लोगों के लौट आने का एक कारण अब उसे मालूम हो गया है। बार-बार लौट आने वाले अपने इंतजार की जड़ यहां रोप जाते हैं। अब वह इंतजार करेगा कि अगले साल, या किसी और साल की गर्मियों में रपंजेल अपने बच्चे के साथ आएगी और वह उनको स्केटिंग सिखाएगा।

