राजेंद्र जोशी
भाई साहब, रिश्ता बहुत अच्छा है। हमको देर नहीं करनी चाहिए, वह तो मना कर रही है, लेकिन शायद मेरे कहने से मान जाएगी।’
‘रुचि, तुम जो कह रही हो, मैं समझ रहा हूं। मैं भी मीनाक्षी को पसंद करता हूं। पर मीनाक्षी के पिताजी ने मेरी बात उस समय भी कहां मानी थी।’
‘किसन भाई साहब, उस समय की बात कुछ और थी। अब बात कुछ अलग है।’
‘रुचि, तुम तो जानती हो कि उस समय हेमेंद्र भी तैयार था, उसने भी हां कर दी थी, लेकिन अब हेमेंद्र की इच्छा को जानना हमारे लिए जरूरी है।’
‘क्या खिचड़ी पक रही है भाई-बहिन के बीच में?’ हेमेंद्र की मम्मी ने दोनों को संबोधित करते हुए बिना हिचक साफ-साफ कह दिया कि ‘रुचि जीजी, आप जो कह रही हैं वह मैं जानती हूं, लेकिन मेरे बेटे के लिए कोई फ्रेश रिश्ता होना चाहिए, अपनी विधवा-तलाकशुदा समाज सेवा आप घर के बाहर ही रखा कीजिएगा।’
रुचि विधवा-तलाकशुदा महिलाओं का संगठन चलाती है। इस संगठन की बरसों से अध्यक्ष है। शहर में किसका तलाक हुआ, कौन विधवा हुई, इस सबकी खोज खबर रुचि दीदी के पास तुरंत पहुंच जाती है। शहर में खुद इस तरह की महिलाएं स्वयं रुचि से सपर्क करती हैं। अपने पुनर्विवाह के लिए बॉयोडेटा देकर जाती हैं। ऐसे परिवारों में खासी लोकप्रिय है रुचि। रुचि से बात करने लोग स्वयं आते हैं। बिना मांग किए ही रुचि को दान-दक्षिणा भी दे जाते हैं। अपने यहां होने वाले सामाजिक कार्यों में लोग रुचि को कार्ड देना कभी नहीं भूलते और वह उनके बुलावे का कभी अपमान नहीं करती।
दो बार विधवा हो चुकी रुचि को विभिन्न राजनीतिक पार्टियों वाले लोग चुनाव लड़ने का निमंत्रण भी देने आते हैं।
‘देख लो, किसन भाभी ऐसे रिश्ते फिर बार-बार नहीं आते। मुझे लगता है अभी तो मीनाक्षी शादी करने की हां भी नहीं भरेगी और उसके माता-पिता भी क्या सोचते होंगे? सातवें दिन कौन क्या सोच सकता है? वह घर सदमें से कब तक उबर पाएगा, कौन जानता है? कहते-कहते रुचि अपनी पहली और दूसरी शादी में खो गई। वह बहुत प्यार करती थी महेश से। मिस कॉलेज चुनी गई थी। लड़कों की लाइन लगी रहती थी। रुचि को हर कोई लड़का पसंद करता था। बात करके ही धन्य समझते थे लड़के। रुचि को अपने सुड़ौल और चमकते बदन का बिल्कुल अहंकार नहीं था। वह हर किसी से बात करती। शहर के नामी-गिरामी रईस परिवार की इकलौती बेटी रुचि ने शादी मां-पापा की इच्छा से उनके पारिवारिक मित्र और व्यापारिक प्रतिष्ठा वाले सुनील से की। शादी तो बस देखते ही बनती थी। देश-विदेश से सैकड़ों की संख्या में मेहमान शरीक हुए थे।
सुहागरात की तैयारी धरी रह गई। एक भयंकर एक्सीडेंट में सुनील की मृत्यु हो गई। रुचि को अकेली जान कर सुनील के माता-पिता चार्टर हवाई जहाज से गोवा के लिए रवाना हुए, पर रास्ते में वह प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हो गया और दोनों की मृत्यु मौके पर ही हो गई। विधि को जो मंजूर होता है, वही होता है। गोवा में रुचि अकेली रह गई। सुनील की मृत देह के साथ वह जयपुर पहुंची, जहां तीनों को मुखाग्नि भी रुचि ने ही दी। अब लंबे-चौड़े फैले कारोबार को संभालने वाली रुचि अकेली थी। घर वालों और दोस्तों ने खूब समझाया, लेकिन रुचि कभी शादी के लिए तैयार नहीं हुई। कॉलेज के पुराने दोस्तों ने भी शादी के प्रस्ताव दिए, पर रुचि कहां मानने वाली थी।
जैसे-तैसे एक वर्ष निकल गया। कारोबार पटरी पर आ चुका था। महेश का आना-जाना और रुचि के कामों में रुचि लेना एक वर्ष से जारी था। पर न तो कभी महेश ने शादी का कोई प्रस्ताव दिया और न ही रुचि ने इच्छा जताई। लेकिन महेश ने रुचि के अलावा किसी अन्य लड़की को शादी के लिए पसंद नहीं किया। यह बात मन ही मन रुचि जानती थी।
महेश भी अपने परिवार की इकलौती संतान होने के कारण व्यापार में व्यस्त रहता था। पिता की मृत्यु कैंसर से बहुत पहले हो चुकी थी। महेश और उसकी मां मिल कर भुजिया नमकीन के बड़े व्यापार को संभालते थे। महेश छोटी उम्र से ही दानवीर था। शहर में जरूरतमंद लोगों की मदद करना, कुएं, बावड़ी, मंदिर बनवाने में खूब पैसा लगाता था। लड़कियों की शिक्षा के लिए खूब पैसा दान करता था। महेश की समस्त गतिविधियों से रुचि परिचित थी। यदा-कदा उसके नेक कामों में सहभागी भी रहती। महेश की मां से भी अत्यंत स्नेह रखती थी रुचि।
जब भी महेश शहर से बाहर होता तो रुचि महेश की मां के पास रहती थी, लेकिन महेश की उपस्थिति में कभी नहीं।
एक वर्ष बाद महेश की मां के कहने पर, रुचि महेश से शादी करने को राजी हो गई। महेश का संकल्प ही था कि शादी करेगा तो रुचि से ही। एक बरस पहले की कॉलेज ब्यूटी आज भी वैसे ही लगती थी महेश को। एक सादे समारोह में महेश-रुचि की शादी कुछ चुनिंदा मेहमानों की उपस्थिति में बीकानेर में हो गई।
महेश-रुचि का दाम्पत्य जीवन बहुत खुशी-खुशी चलने लगा। हनीमून बाहर नहीं हुआ। शहर के धोरों पर ही मनाया गया।
थोड़े दिन हुए थे। शादी की खुशियां परवान पर थी। रुचि महेश को खूब प्यार करने लगी थी। पुराने जख्मों के निशान मिटने लगे थे।
‘इन दिनों महेश तुम उदास रहने लगे हो, क्या परेशानी है तुहें? कोई व्यापार संबंधी परेशानी तो नहीं?’
महेश ने कहा- ‘ऐसी कोई परेशानी नहीं है।’ रुचि ने पता कर लिया था कि व्यापारिक परेशानी नहीं थी। महेश की सुस्ती बढ़ती जा रही थी। रुचि और महेश की मां की चिंता बढ़ने लगी। महेश को शहर के नामी चिकित्सक को दिखाया गया।
रुचि की किस्मत को किस घड़ी में लेखमाता ने लिखा होगा? अभी रुचि की गोद तो भरी ही नहीं थी, मेडिकल रिपोर्ट्स ने कैंसर की घोषणा कर दी। अगले छह माह तक सचेत रहने के लिए डॉक्टर ने हिदायत दी। चार माह बाद खून की उल्टी के साथ महेश ने प्राण त्याग दिए।
अब महेश और सुनील दोनों के व्यापार को अकेली रुचि संभालने लगी। महेश की मां ने रुचि को खूब समझाया कि अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? तुमको शादी कर लेनी चाहिए। पर दो शादियों के बाद रुचि ने अपना फैसला सुना दिया कि अब वह शादी नहीं करेगी।
पता नहीं भगवान को क्या मंजूर था? थोड़े दिनों बाद महेश की मां को भी कैंसर ने घेर लिया और अब रुचि अकेली रह गई। रुचि खुद को संभालने का प्रयास करने लगी। लबा-चौड़ा व्यापार होने के कारण बड़े-बड़े व्यापारियों से रुचि ही डील करती थी। उसे देखने से ऐसा नहीं झलकता कि रुचि दो बार विधवापन ओढ़ चुकी है। उसके व्यवहार से कभी यह नहीं लगता कि उसके भीतर कुछ नहीं है। रुचि के पास जो था वह ऊपर का चेहरा ही था, अकेलेपन के साथ जिंदगी काट रही रुचि को अब जीने में कोई रुचि नहीं थी।
पर जो पुरुष रुचि से मिलता वह व्यापार में कम और रुचि में ज्यादा रुचि रखता। रुचि अब घर के अंदर रहने लगी। सारा काम स्टाफ के भरोसे होने लगा।
एक दिन शहर की तीन औरतों ने किसी तरह रुचि से मिलने में सफलता प्राप्त क्या कर ली, रुचि का जीवन ही बदल दिया। वे तीनों विधवा बेटियों की माताएं थी। गरीब माताएं, विधवाओं की शादी के लिए मदद मांगने आई थीं। रुचि को बात ऐसी समझ आई कि उसकी फैक्ट्री में तीन कुंवारे लड़कों से उन तीनों की शादी करवा दी।
पूरे घटनाक्रम को याद करती रुचि को झकझोरते हुए किसन ने कहा- ‘रुचि कहां हो तुम? बात करती-करती नींद तो नहीं ले रही हो।’
अपने आप को संभालती रुचि ने फिर से कहा- ‘भइया-भाभी अपना हेमेंद्र भी तो बेरोजगार है, फूटी-कौड़ी की कमाई नहीं है और आप भी रिटायर हो चुके हो, पेंशन से कब तक तीन-तीन संतानों का पेट भरोगे? बेटी की शादी भी करनी है। एक बात और बता दूं भाभीजी, मीनाक्षी तो नौकरी भी करती है। हेमेंद्र को कौन देगा इससे अच्छी, सुंदर संस्कारित लड़की। मुझे तो लगता है कि मीनाक्षी हां भी नहीं भरेगी।
हेमेंद्र पड़ोस वाले कमरे में अपनी शादी की सारी बातें सुन रहा था। बरसों पहले मीनाक्षी को दिल दे बैठा था, जो मीनाक्षी के दिल तक पहुंचा नहीं था।
‘अरे हेमेंद्र की मां, तुम बातें ही करती रहोगी या रुचि को चाय-नाश्ता भी कराओगी!’ किसन ने कहा।
हेमेंद्र की मां खाना परोसते हुए बोली- ‘आप भी क्या बात करते हो, बरसों बाद आई है दीदी और वह भी खाने के समय, तो ऐसे थोड़े ही जाएगी।’ वह थाली लगाते हुए बोली- ‘दीदी, शादी-ब्याव तो होते रहेंगे, आओ भोजन तैयार है।’
थोड़ी देर में हेमेंद्र बाहर आकर रुचि बुआ की खुशामद करने लगा।
भोजन के बाद रुचि ने कहा- ‘किसन भाई साहब, हेमेंद्र को बेरोजगार ही रखोगे क्या? भेज दो कल से भुजिया फैक्ट्री में।’
मन ही मन प्रसन्न होकर हेमेंद्र की मां ने कहा- ‘तो फिर मीनाक्षी से कब बात करोगी रुचि दीदी?’
रुचि का एक ही संकल्प रह गया है कि शहर में कोई भी लड़की विधवा न रहे और न ही तलाकशुदा। रुचि बताने लगी- ‘किसन भाई साहब, मैं विधवा से शादी करने वाले लड़के को और उस लड़की को मेरी फैक्ट्री में तुरंत नौकरी देती हूं। विधवा-तलाकशुदा की जानकारी होते ही पहुंच जाती हूं, उनके घर पर। किसन भाई साहब, अब तो मेरा आॅफिस अलग से इसी काम के लिए चलता है। विधवा जिंदगी का दर्द मुझसे अधिक कौन जान सकता है? जब तक जिंदा हूं इस शहर में एक भी लड़की को विधवा नहीं रहने दूंगी।’
