मधु अरोड़ा

शिखर, तुम ऐसा करोगे, कभी सोचा नहीं था। तुम अगर पहले ही बता देते कि तुम्हारे जीवन में मेरे सिवाय भी कोई लड़की थी, तो मैं पीछे हट जाती। तुमने सच क्यों छुपाया बोलो न… यदि पहले बता दिया होता तो आज ऐसी नौबत न आती। इन हालात के लिए तुम्ही जिम्मेदार थे और मुझे कोई अफसोस भी नहीं है।
मैं बुजदिल तो नहीं थी, यह तुम जानते थे। अपनी इज्जत को बचाने के लिए मैं किसी भी सीमा तक जा सकती थी, यह भी तुम्हें पता था… फिर भी तुमने ऐसा किया… मैं तुम्हारे लिए अपना घर-बार छोड़कर आई थी तुम्हारे साथ अपना घर-परिवार बसाने। तुम क्यों नहीं अपने माता-पिता को रोक पाए कि वे मेरे साथ बदसलूकी न करें। तुम क्यों अपने माता-पिता के साथ हो लिए और मुझे एकदम अकेला कर दिया!
शादी से पहले तुम प्यार जताते थे कि मेरे बिना नहीं रह सकते। तुम्हारे घर में मेरी पूरी इज्जत होगी। क्या इसी को इज्जत कहते हैं? मेरा यही कसूर था न कि तुम्हारे प्यार को कबूल कर लिया था और शादी के लिए राजी हो गई थी।
मेरे माता-पिता भी खुश थे कि लड़का जान-पहचान का था, खाते-पीते घर का था, मुझे खुश रखेगा… पर तुमने क्या किया शेखर, तुम नहीं जानते, तुमने मेरे परिवार का विश्वास तोड़ा था, सबसे अधिक मेरा दिल दुखाया था।
तुम्ही मुझे मिनी कश्मीर ले गए थे और अपने प्यार का इजहार किया था… तुम ही थे जो मेरे माता-पिता की अनुमति से मुझे अपने घर ले गए थे, यह कह कर कि तुम्हारे माता-पिता मुझे देखना चाहते थे।
बोलो, तुमने ही शुरुआत की थी न… मैं अजीब पेशोपेश में थी। कैसे भरोसा कर लेती तुम्हारी बात का। पूरी जिंदगी का सवाल था। तुम्हारे पास तो नौकरी भी नहीं थी। आखिर बोलना ही पड़ा, ‘बिना नौकरी के तुम शादी की बात सोच कैसे सकते हो! तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूं।’
इस पर तुम बोले थे, ‘मेरे भाई का बिजनेस है। मेरी पार्टनरशिप है। मुझे नौ से पांच की नौकरी तो करना नहीं है। हां, ग्रेजुएशन जरूर करना है। मेरे घर में तुम रानी बन कर रहोगी। घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं है। बहन तो एअर लाइन में है। खूब विदेशी चीजें आती हैं घर में। सभी तुम्हें पसंद करते हैं। तुम किसी बात का टेंशन मत लो।’ बस, यहीं मैं धोखा खा गई थी।
तुमने बिल्कुल भी तो सोचने का समय नहीं दिया था। दोनों परिवारों की सहमति से अगस्त में शादी तय कर दी गई। अगस्त भी आना ही था। आया और हम दोनों शादी के बंधन में बंध गए। दोनों खुश थे।
मैं नई नवेली पैर में पायल की रुनक झुनक और चूड़ियों की खनखनाहट के साथ पूरे घर में घूमती। पूरे एक महीने हनीमून मनाया। तुम कॉलेज नहीं जाते थे। बस, घूमना, खाना और सोना… मैं रसोई में थोड़ा भी काम करती तो तुम्हारी मां निहाल हो जातीं। इस तरह छह महीने बीत गए थे।
शायद बुरे दिन कह कर नहीं आते। एक दिन तुम्हारी मां को कहते सुना, ‘शेखर, अब तो तू ब्याह कर चुका है। कुछ काम भी कर। तेरे पिता की नौकरी खत्म होने को है। घर के खर्चे तो वही रहेंगे। बहन भी अपने घर चली जाएगी।’ इस पर तुमने कहा था, ‘भइया का बिजनेस है न। मैं उसके साथ काम कर लूंगा।’ इसके बाद तुम्हारी मां ने जो कहा, वह बम फोड़ने से कम नहीं था।
‘देख, तेरे बड़े भइया ने साफ मना कर दिया है तुझे पार्टनर बनाने से। उसका कहना है कि जिस तरह से तू होटलबाजी करता है और मंहगे शौक पाल रखे हैं, उनको पूरा करने में वह कंगाल हो जाएगा। दूसरे, अब कमला भी है। घर के खर्चे भी बढ़े ही हैं। हम सबकी राय है कि तू अलग घर ले ले। घर का भाड़ा हम दे दिया करेंगे। गृहस्थी के बर्तन-भांडे हम दे देंगे। अब तुझे अपने खर्चे खुद संभालने होंगे।’
यह सुन कर तुम सन्न रह गए थे। मैं चुप थी। तुम्हारी मां का कहना एक हद तक सही भी था। रात को मेरी और तुम्हारी बात हुई और तय किया कि अलग हो जाना ही ठीक होगा। इससे ज्य़ादा बेइज्जती ठीक नहीं।
इस तरह हमने अलग रहने का मन बना लिया था। हम दोनों के बीच बड़ी दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। पर आने वाले हालात का सामना तो करना था। तुम्हारे पास नौकरी नहीं थी। मैं ज्य़ादा पढ़ी-लिखी नहीं थी।
तुम्हारे घरवालों ने यह कहकर पढ़ने नहीं दिया कि मुझसे कोई नौकरी तो करानी नहीं थी और न मेरी कमाई खाना था। सब कुछ तुम बच्चों का ही तो है। कैसे बरगला लिया था मुझे। मैं खुद को ठगी और छली महसूस कर रही थी। अचानक आकाश से जमीन पर फेंक दिया था। एक महीना जैसे तैसे काटा। बजटहीन थे हम।
हमें जैसे तैसे एक चाल में घर मिल गया। दो कमरे थे। किराया था दो हजार रुपए। मैंने अपने जेवर बेच कर पैसों का जुगाड़ किया था। सोच लिया था कि एक समय खा लेंगे, पर किसी के सामने हाथ नहीं पसारेंगे। जमीन पर एक गद्दा डलवा लिया। जरूरत का सामान ले लिया।
हां, मेरे पापा ने दो महीनों का राशन भरवा दिया था, ताकि रोटी की तंगी न हो। उनको मना भी नहीं कर पाई। अपनी कसम जो दे दी थी कि यह राशन लेना ही होगा मुझे। तुम नौकरी खोजने लगे थे। तुम्हारी बहन एअर लाइन में थी। सो, अपनी जान-पहचान से कार्गो में नौकरी लगवा दी।
तुम अचानक व्यस्त हो गए थे। सुबह नौ बजे जाना और रात के दस बजे वापस आना आम बात थी। घर आकर थक जाते थे तो एक पैग विस्की का लेते और खाकर सो जाते थे। मैं कभी प्यार की इच्छा जताती तो मुंह फेरकर सो जाते।
मैं यह सोच कर हैरान होती कि रोज पीने के लिए शराब का जुगाड़ कैसे करते थे। एक दिन मैंने तुमसे पूछा, ‘तुम पहले तो नहीं पीते थे। ऐसे रोज पियोगे तो सेहत खराब हो जाएगी। फिर ये पैसे कहां से आते हैं?’
इस पर तुमने बताया, ‘तुम तो जानती हो… मेरी बहन एअर लाइन में है तो वह मेरे लिए विदेश से अच्छी से अच्छी शराब लाया करती है। मैं तो दसवीं में था, तभी से पी रहा हूं। आज फोन करके उससे दो बॉटल भेजने के लिए कहता हूं।’
‘शेखर, अच्छा नहीं लगता। अब हम अलग रह रहे हैं। ये चीजें मत मांगो।’ मेरे यह कहने पर तुम चिढ़ गए थे और बोले थे, ‘हम अलग हुए हैं। तुम मुझे मेरे परिवार वालों से क्यों अलग करना चाहती हो। हम दो सप्ताह से मिलने नहीं गए हैं। कल रविवार है। मिलने जाएंगे और मैं दो बॉटल भी ले आऊंगा। खत्म होने को है दारू।’
सच कहूं, मुझे तुम्हारी यह बेगैरती बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी। तुम इतनी शराब पीते थे शादी से पहले, मुझे हवा तक नहीं लगने दी थी तुमने अपने पीने की।
जिस तरह से उन्होंने हमें अलग किया था, मेरा बिल्कुल भी मन नहीं था वहां जाने का। लेकिन मन मार कर तुम्हारे साथ जाना पड़ा। जाते ही सासू मां ने कहा, ‘कमला, मेरे बेटे को इत्ता भी बांध कर मत रख। उसे यहां आने से रोका मत कर।’
मैंने सिर्फ इतना ही कहा, ‘मैं थोड़े ही रोकती हूं। ये रात को इतना थक जाते हैं कि रविवार ही मिलता है आराम करने को।’ मैं चुपचाप सबकी सुनती रही। अब मैं उनके लिए बाहरी थी। तुम सबसे बातें करने में मशगू़ल हो गए थे। सबने खाना खाया।
घड़ी देखी तो शाम के साढ़े पांच बज गए थे। मैंने कहा, ‘शेखर, अब घर चलना चाहिए।’ तुम एक ही बार के कहने में चलने के लिए कैसे तैयार हो गए, यह देख कर ही मैं हैरान थी। चलते समय तुम्हारी बहन ने तुम्हें विदेशी विस्की की दो बोतल यह कहते हुए पकड़ा दीं, ‘तुझे यह ब्रांड पसंद है न। इस बार अमेरिका गई थी। स्पेशली तेरे लिए लाई हूं और हां शेखू, तुझे शैनी याद कर रही थी। कभी मिल लेना।’ इस तरह हम विदा होकर घर से निकले। रास्ते में मैंने पूछा, ‘यह शैनी कौन है, कभी जिक्र नहीं किया।’
‘अब हर बात बताना जरूरी है क्या, मेरी दीदी के साथ एअर लाइन में है। मेरी बहुत पुरानी दोस्त है।’ दो दिन बाद ही तुम बोले, ‘मैं शाम को शैनी से मिलने जा रहा हूं। डिनर करके आऊंगा। शादी के बाद से मिला नहीं हूं उससे।’
मैंने भी सोचा कि चलो पुरानी दोस्त थी। उसका भी तो हक बनता था कि कभी-कभार वह अपने दोस्त के साथ खाना खाए। बस, मेरी यही सोच मुझे भारी पड़ गई आगे चलकर। अब तुम सप्ताह में तीन बार शैनी से मिलने लगे थे और रात को नशे में ही घर लौटते थे। खाना भी खाकर ही आते थे।
तुम अक्सर नींद में बड़बड़ाते, ‘शैनी, मैं तुझे कैसे भूल सकता हूं। कमला मेरी पत्नी है, पर तू तो मेरी सबसे पक्की दोस्त है। दोस्त हमेशा पत्नी से बेहतर होती है।’ तुम्हारा यह बड़बड़ाना मुझे अंदर तक छील देता था। अब घर में शैनी को लेकर अक्सर झगड़े होने लगे थे।
कोई भी पत्नी नहीं चाहेगी कि घर के काम के लिए पत्नी और अय्याशी के लिए दूसरी लड़की और वह भी एअर लाइन की, ताकि शराब मुफ्त की मिलती रहे। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं।
आखिरी कोशिश की और तुम्हारी मां के पास गई और घर के हालात बताए। उन्होंने यह कह कर अपने हाथ खड़े कर लिए, ‘तुम पति-पत्नी के बीच के झगड़े हैं, खुद ही निपटाओ। तुम मेरे बेटे को नहीं संभाल सकतीं, यह तुम्हारी समस्या है। आइंदा मेरे बेटे की शिकायत लेकर मेरे पास मत आना।’
अब समझ में आ रहा था कि यहां तो सारा आंवा ही बिगड़ा है। मेरे ससुराल वाले गिरगिट की तरह रंग बदल रहे थे। मैं अपना-सा मुंह लेकर वापस आ गई। उस रात को तुम दो बजे घर आए थे। पूरी तरह नशे में। पैर लड़खड़ा रहे थे।
तुम जूते पहने ही गद्दे पर लेट गए थे और बोले थे, ‘कमला, तू अपने को समझती क्या है, मुझे रोकने की कोशिश मत करना। शैनी से मेरा पुराना याराना है। उससे शादी करूंगा और तुझे ‘कीप’ की तरह रखूंगा। रहना हो तो मेरे साथ रह, नहीं तो घर के दरवाजे खुले हैं बाहर जाने के लिए।’
यह सुन कर मैं सन्न रह गई। पहली बार यह बात कही थी तुमने मेरे सामने। यह मेरे मुंह पर थप्पड़ था। पहली बार मेरा गुस्सा फूटा था। मैंने गुस्से से कांपते हुए कहा, ‘शेखर, तुमने यह पहली बार कहा है, इसलिए जाने देती हूं। अगली बार कहा तो ठीक नहीं होगा।’ यह सुन कर तुम झटके से उठे थे और बोले थे, ‘क्या कर लेगी मेरा? मैं हजार बार कहूंगा। ले सुन, कीप…कीप…कीप’ और यह कहते-कहते सो गए थे।
अब तुम मुझे ‘तू’ कहने लगे थे। नींद में तो तुम बार-बार मुझे रखैल कहते और अपनी ओर खींचते। मैं तुम्हारा हाथ झटक देती थी। अजीब-सी हिकारत पैदा होने लगी थी मन में तुम्हारे प्रति।
तुम्हारी बदतमीजियां और बदमिजाजी बढ़ती ही जा रही थी। अब तुम रात को गायब भी रहने लगे थे। मैं अकेली जाती भी कहां। अब तुम मेरी बजाय शैनी को बाइक पर घुमाने लगे थे। फटी फटी आंखों से सब देख रही थी।
कब तक देखती यह नंगई! मेरी अपनी भी तो कोई जिंदगी थी, जिसके लिए निर्णय लेना था। कब तक इकतरफा प्यार देती। संवेदनाएं मरने लगी थीं। क्या अपना सब कुछ खत्म हो जाने दूं, कितने दिन सहूं यह सब। एक रात तुम फिर नशे में झूमते आए थे और बोले थे, ‘देख कमला, मैं कहता था न कि मैं शैनी से शादी करूंगा और तू रखैल होगी। आज हम दोनों ने मंदिर में शादी कर ली है। यह देख फूलों की माला।’ और तुमने जेब से गेंदे के फूलों की माला निकाल कर मेरे सामने लहरा दी थी।
इससे ज्य़ादा मेरा अपमान क्या हो सकता था! मैंने कुछ नहीं कहा। उस दिन से मैंने अपने होठों को सिल लिया था। आंखों का पानी सूख गया था। मानो मेरी पूरी-पूरी रातें आंखों में कट रही थीं और मैं अपने में बड़बड़ाती रहती, ‘नहीं, मैं तीन जिंदगियां बर्बाद नहीं होने दूंगी।’ उस दिन पहली बार मैंने विस्की के दो पैग एक के बाद एक पिए और वह भी बिना पानी या सोडे के। यह पीना मेरे लिए जरूरी था। जो काम करने जा रही थी उसके लिए नशा जरूरी था। होश में तो कर ही नहीं सकती थी।
घड़ी की टिक-टिक ने रात के तीन बजाए और मैं उठी। पैर लड़खड़ा रहे थे, पर संभलना किसे था। मैंने किचन से सिल का लोढ़ा (बट्टा) उठाया और बाहर आकर पूरे जोर से तुम्हारे माथे पर दे मारा था। तुम्हारे माथे से खून की धार फूट पड़ी थी। मैं चुपचाप बहते खून को देख रही थी… किरच रहा था अंदर से कुछ… पर और कर भी क्या सकती थी। तुमने मेरे अस्तित्व को ललकारा जो था, निर्णय तो लेना ही था।