मम्मी, आप मुझे कहती हो न कि सर्दियां आ गई हैं, स्वेटर पहने रहा करो।’ मोनू कह रहा था। ‘हां बेटू, सर्दियों में गर्म कपड़े न पहनने से ठंड लग जाती है और फिर बीमार पड़ जाते हैं न।’ मम्मी ने जवाब दिया। ‘तो फिर मम्मी, कम्मो आंटी स्वेटर क्यों नहीं पहनती हैं? वे सुबह-सुबह हमारे घर में बरतन मांजने और झाड़ू-पोंछा करने आती हैं। उस समय तो बहुत ठंड होती है न।’ मोनू बोला। ‘स्वेटर तो उसे पहनना चाहिए।’ मम्मी ने कहा। ‘तो फिर पहनती क्यों नहीं हैं वे स्वेटर?’ मोनू ने पूछा। ‘स्वेटर है ही नहीं उसके पास। पिछले दिनों पूछा था मैंने।’ मम्मी ने बताया। मम्मी की बात सुन कर मोनू कुछ देर तक सोचता रहा, फिर कहा, ‘मम्मी, आप कम्मो आंटी को अपना कोई स्वेटर नहीं दे सकती क्या?’ ‘चलो, ठीक है। मैं देखूंगी कोई पुराना स्वेटर।’ मम्मी ने कहा और फिर अपने काम में लग गर्इं। उन्हें आॅफिस जाने की जल्दी भी थी।

दो-तीन दिन निकल गए, पर मम्मी को कम्मो के लिए स्वेटर ढूंढ़ने का वक्त नहीं मिल पाया। सुबह से शाम तक आॅफिस में समय बिताने के बाद घर आकर खाना बनाने, मोनू का होमवर्क कराने के अलावा और भी कई छोटे-बड़े काम थे, जो मम्मी को निपटाने पड़ते थे। मोनू ने कम्मो आंटी के लिए स्वेटर ढूंढ़ने की बात दो-तीन बार मम्मी को याद दिलाई, लेकिन इस काम के लिए उन्हें वक्त मिला ही नहीं।

सुबह स्कूल जाने से पहले मोनू देखता कि कम्मो आंटी सर्दी में ठिठुरते हुए रसोई में बर्तन मांज रही हैं या घर में झाड़ू-पोंछा कर रहीं हैं। यह देख कर वह इशारे से मम्मी को स्वेटर वाली बात याद दिलाता। मम्मी भी इशारे से जवाब देतीं कि वे स्वेटर ढूंढ़ेंगी, मगर ऐसे ही चार-पांच दिन बीत गए, लेकिन मम्मी को स्वेटर ढूंढने का समय नहीं मिला।

मोनू को मम्मी से यह तो पता चल चुका था कि उनका कोई पुराना स्वेटर उनकी कपड़ों की अलमारी में ही होगा। मोनू जानता था कि कपड़ों से भरी मम्मी की अलमारी से स्वेटर ढूंढ़ना इतना आसान काम नहीं है।

इतवार का दिन आया। मम्मी को आॅफिस नहीं जाना था, पर सुबह से वे घर के कामों में बुरी तरह व्यस्त थीं। पापा किसी काम से कहीं गए हुए थे।
मोनू ने चुपचाप मम्मी की अलमारी खोली और कोई पुराना स्वेटर ढूंढ़ने लगा। अलमारी कपड़ों से भरी हुई थी।
मोनू ने देखा कि मम्मी के बढ़िया-बढ़िया स्वेटर हैंगरों पर टंगे थे। ‘ये तो बढ़िया स्वेटर हैं। इन्हें तो मम्मी देंगी नहीं कम्मो आंटी को।’ सोचते हुए मोनू कोई पुराना स्वेटर ढूंढ़ता रहा।

तभी उसने देखा कि तह किए हुए कुछ कपड़े अलमारी में एक तरफ पड़े हैं। मोनू ने उन कपड़ों को टटोला, तो उसे एक स्वेटर मिल गया। उसने वह स्वेटर निकाल कर देखा। वह एक पुराना-सा स्वेटर था।
मोनू ने अलमारी बंद की और वह स्वेटर लेकर मम्मी के पास रसोई में चला गया।
‘मम्मी, यह स्वेटर मैंने आपकी अलमारी से ढूंढ़ा है। इसे दे सकते हैं क्या कम्मो आंटी को?’ मम्मी को स्वेटर दिखाते हुए मोनू ने कहा।
स्वेटर को देखते ही मम्मी कहने लगीं- ‘यह तो बड़ा पुराना स्वेटर है। इसका डिजाइन फैशन में नहीं है, इसलिए मैंने इसे पहनना छोड़ दिया है। वैसे है यह स्वेटर बड़ा गरम। दे सकते हैं इसे कम्मो को।’

मम्मी की तरफ से ‘हां’ सुनते ही खुशी से उछलते हुए मोनू बोला, ‘तो ठीक है मम्मी, शाम को बर्तन मांजने जब कम्मो आंटी आएंगी, तब आप दे देना उनको यह स्वेटर।’
‘लेकिन बेटू, यह स्वेटर साफ नहीं है। इसे धोकर ही देंगे कम्मो को। तुम इसे वापस मेरी अलमारी में रख दो। जिस दिन वाशिंग मशीन पर कपड़े धोऊंगी, उस दिन धो दूंगी इसे भी।’
मम्मी की बात सुन कर मोनू रसोई से बाहर आ गया।

‘मम्मी तो तीन-चार दिन बाद ही धोती हैं कपड़े। आज सुबह ही तो धोए हैं। न जाने कब मम्मी इसे धोएंगी और न जाने कब यह सूखेगा।’ मोनू सोच रहा था।
तभी मोनू के दिमाग में एक बात आई और वह स्वेटर लेकर बाथरूम में चला गया। फिर उसने एक बाल्टी को पानी से आधा भर दिया और उसमें थोड़ा तरल साबुन डाल दिया। उसके बाद उसने तरल साबुन की झाग बनाई और उस स्वेटर को पानी में डाल दिया।
स्वेटर को थोड़ी देर तक पानी में डुबोए रखने के बाद उसे अच्छी तरह धो दिया और सूखने के लिए बालकनी में बंधी रस्सी पर फैला दिया।
मोनू कुछ देर तक स्वेटर से टपक रही पानी की बूंदों को देखता रहा। फिर वह रसोई में काम कर रही मम्मी के पास चला गया। मम्मी के पास गया और स्वेटर धो देने वाली बात उन्हें बता दी। मोनू को डर था कि उसकी बात सुन कर मम्मी उसे डांटेंगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसकी बात सुन कर मम्मी हल्के-से मुस्कुरार्इं और फिर बोलीं, ‘अच्छा किया, बेटू।’

मोनू थोड़ी-थोड़ी देर बाद बालकनी में जाता और स्वेटर को छूकर देखता। स्वेटर हर बार काफी गीला मिलता।
दोपहर का खाना खाने के बाद मोनू फिर से बालकनी में गया। स्वेटर अब भी थोड़ा-थोड़ा गीला था।
मोनू चाहता था कि स्वेटर आज ही कम्मो आंटी को दे दिया जाए, ताकि वे ठंड से बच सकें। लेकिन ऐसा तभी किया जा सकता था जब स्वेटर सूखा हो।
तभी मोनू के दिमाग में एक बात आई। कमरे में जाकर उसने अपनी गुल्लक से कुछ रुपए निकाले और फिर स्वेटर लेकर घर से बाहर चला गया। घर के पास ही कपड़ों पर इस्त्री करने वाले श्यामू काका के पास वह गया और इस्त्री करके वह स्वेटर सुखाने के लिए उन्हें कहा। श्यामू काका ने कुछ ही देर में स्वेटर को सुखा दिया और उसे तह करके मोनू को दे दिया। मोनू ने श्यामू काका के पैसे चुकाए और स्वेटर लेकर घर आ गया।
मोनू ने मम्मी को सूखा हुआ स्वेटर दिखाया और गीले स्वेटर को इस्त्री करके सुखाने वाली बात भी बता दी।
उसकी बात सुन कर मम्मी बिल्कुल भी नाराज नहीं हुर्इं, बल्कि बड़ी खुश हुर्इं।
शाम को कम्मो आई, तो मम्मी ने वह स्वेटर उसे दिया और कहा कि वह उसे अभी पहन ले। मोनू रसोई के दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था। कम्मो ने स्वेटर पहना तो बहुत खुश हुई, मगर कम्मो से ज्यादा खुश मोनू था।

हरीश कुमार ‘अमित’