रामदरश मिश्र
कैलाश की शादी के लिए अच्छे-अच्छे घरों से प्रस्ताव आ रहे थे। उसकी पंगुली मां मना कर देती थी। कहती थी, अभी पढ़ रहा है। कैलाश ने अब दसवीं पास कर लिया। एक प्रस्ताव आया है। गांव के लोग पंगुली मां के यहां उत्साह से जुटे हैं और प्रस्ताव स्वीकृत हो गया है। वर-छेंक की रस्म पूरी हो रही है और हल्का-सा खानपान चल रहा है। सभी लोग कैलाश और उसकी मां की प्रशंसा के पुल बांध रहे हैं। पंगुली मां ने बहुत उत्साह से बेटी वालों का स्वागत किया। बहुत प्रसन्न थीं कि अब गांव वाले उसकी जय बोल रहे हैं। उत्सव संपन्न होने पर जब वह अकेली हुई, तब उसकी आंखें भर आर्इं। याद आने लगे वे दिन, जब वह गांव में असहाय छोड़ दी गई थी। पंगुली मां का नाम पंगुली इसलिए पड़ा कि वह दोंनो पांवों से पंगु थी। वह थी तो बहुत सुंदर गोरी-चिट्टी, बड़ी-बड़ी दीप्त आंखें, किंतु शादी के बाद किसी समय लकवे ने उसके दोंनो पैर बेकार कर दिए। इसलिए गांव के लोग उसे पंगुली भाभी, चाची आदि कहने लगे और नए लड़के-लड़कियां उसे पंगुली मां कह कर पुकारने लगे थे। लकवा मारने के बाद वह अपने पैरों को देख कर रोती थी। याद आते थे उसे पहले के दिन।
घर के लोग कहते थे- ‘शोभा बेटी के पांव कितने सुंदर हैं। सीधे पांव, लंबी-लंबी अंगुलियां सुंदर नाखून और स्वस्थ गोरी टांगों में गजब की स्फूर्ति, उसकी चाल में अद्भुत त्वरा थी। स्कूल में पढ़ती थी, तो खेल-कूद में, दौड़ में सबसे आगे रहती थी। त्योहारों को नारी समाज में अद्भुत लय से नाचती थी। पूरे गांव में उसकी गतिविधियों की चर्चा होती थी। गांव में वह अकेली लड़की थी, जिसने दर्जा चार पास किया था। वह एक सामान्य घर की लड़की थी, किंतु उसकी विशेषताओं का बखान सुन कर एक बड़े घर के बाप ने अपने बेटे के लिए उसका हाथ मांगा था। वह काफी खेती-बारी वाली ससुराल में आकर प्रसन्न थी। उसे पति, सास, ससुर सबका प्यार मिला था। सास-ससुर उसके आने के कुछ समय बाद ही संसार से विदा हो गए थे। वह पति के साथ प्रसन्न चल रही थी। समय से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। अच्छी खेती-बारी, अच्छा पति, और अब एक प्यारा-सा बेटा। उसे और क्या चाहिए था?
समय की गति किसने समझी है। वह अपने भीतर क्या-क्या छिपाए है, कब क्या कर देगा, कौन जानता है। एक दिन वह लकवा बन कर आया और शोभा के पांवों पर टूट पड़ा। पति ने बहुत दवा की, किंतु कुछ फर्क नहीं पड़ा। दुखी शोभा को पति ने समझाया- ‘दुखी मत हो कैलाश की मां। ईश्वर की करनी पर किसका वश? तुम्हारे साथ मैं हूं न, कैलाश है न। घर के काम-काज के लिए नौकरानी रख दूंगा। कैलाश बड़ा हो जाएगा, तो उसकी पत्नी आ जाएगी और तुम्हें बहू का सहारा मिल जाएगा। कुछ दिनों तक शोभा अपने पैरों के अतीत को याद कर-करके चुपके-चुपके रोती रही, फिर वक्त से समझौता कर लिया। पति और बेटे के प्यार ने उसे संभाल लिया। कैलाश बहुत होनहार बालक निकला। पढ़ने में भी बहुत अच्छा था। एक-एक कक्षा प्रथम श्रेणी में पार करने लगा।
एक दिन फिर समय ने अपना कू्रर कारनामा दिखा दिया। शोभा के पति एक दुर्घटना के शिकार हो गए। अब तो शोभा का दुख हाहाकार करने लगा। धीरे-धीरे दुख कुछ शमित हुआ, तो खेतों के जुताने-बोवाने की समस्या सामने दहाड़ मारने लगी। इतने खेत! अब इनकी संभाल कैसे हो? कैलाश अभी दस साल का था। स्वयं पंगु थी। खेतों को जोतने-बोने का समय आया, तो वह कभी इस पट्टीदार से, कभी उस पट्टीदार से सहायता मांगने लगी। सभी लोग इनकार कर देते थे। सबके मन में यह लालच जाग गया कि अब यह असहाय औरत अपने खेत हमारे हवाले कर देगी, यानी बंटाई देगी और हम धीरे-धीरे उन खेतों पर कब्जा कर लेंगे। वे लोग स्वभाव से भी उजड्ड थे, इसलिए गांव के हलवाहों को भी उनका काम करने से मना कर दिया था। जो हलवाहा शोभा के यहां काम करता था, उसे भी धमका कर मना कर दिया।
एक दिन शोभा मन मारे बैठी थी। सोचती रहती कैसे क्या किया जाए? उसके सामने कैलाश की पाठ्य-पुस्तक रखी थी। उसे यों ही उलटने-पलटने लगी। एक पृष्ठ पर रामचरित मानस की कुछ चौपाइयां छपी थीं, जिनमें हनुमान का सागर-प्रसंग था। पढ़ते-पढ़ते उसने पढ़ा- ‘का चुप साध रहा बलवाना।’ उसकी दृष्टि इसी पंक्ति पर अटक गई। बार-बार इसे पढ़ने लगी। उसने अपने पांवों की ओर देखा। उसका अतीत कौंध गया। पांवों को संबोधित करती हुई बोली- ‘का चुप साध रहा बलवाना?’ उसे लगा कि उसके पांवों में जुंबिश हो रही है। वे कह रहे हैं- ‘हम अभी भी तुम्हारे साथ हैं। हमारा इस्तेमाल करो।’ वह जोश से भर गई। वह दो डंडों के सहारे चलती थी, पर अभी तक उसके चलने का क्षेत्र घर-द्वार ही था। दूसरे दिन वह डंडों के सहारे अपने खेत की ओर चल पड़ी। लोंगों ने आश्चर्य से देखा। वह अब रोज अपने किसी न किसी खेत की ओर जाने लगी। उसके हलवाहे को लगा कि उसने गलत काम किया है। किसी के धमकाने से उसने अपने मालिक का काम छोड़ रखा है। उसका हृदय उसे धिक्कारने लगा और मालकिन के पास आकर बोला- ‘मैं आ गया हूं मालकिन।’
शोभा हलवाहे के साथ खेत की ओर निकल जाती थी। वह मेड़ पर बैठ जाती थी और खेत को जोताती-बोवाती थी। खेत से घर तक शोभा की सक्रिय गतिशीलता गांव वालों को चकित करने लगी। अब उसके पट्टीदारों की स्वार्थी उम्मीद ठंडी पड़ गई। अब शोभा निरुपाय नहीं थी, वह स्वयं में उर्जा बन गई थी। उसकी शक्ति के साथ उसका बेटा कैलाश भी तो था। अब शोभा के खेतों में उमड़ती हुई फसलों का उल्लास विरोधियों के मन में ईष्या भर रहा था।
कार्तिक का स्नान था। गांव के तमाम लोग सरयू में नहाने चले गए थे। कैलाश भी गया हुआ था। शोभा के घर में दो चोर घुस आए। खटपट हुई, तो शोभा ने पूछा- ‘कौन हो?’ एक चोर बोला- ‘चुप रह पंगुली, बहुत बोलेगी तो हाथ भी तोड़ दूंगा।’ शोभा ने देखा कि वे निर्भीक होकर उसके घर के कीमती सामान समेट रहे हैं। फिर क्या था, उसने एक डंडा खींच कर एक को मारा, वह तिलमिला उठा। दूसरा डंडा दूसरे को मारा, वह भी तिलमिला उठा। शोभा डंडा मारती थी और जब तक चोर संभलें, डंडा उठा लेती थी। उसकी मार और आवाज से आसपास के दो-चार लोग भी जाग गए। चोर भाग गए। गांव के लोग जब नहा कर लौटे, तो उन्हें यहां बचे लोगों से शोभा की वीरता की कहानी ज्ञात हुई। सभी लोग शोभा के प्रति सम्मान भाव से भर आए और वह पंगुली भाभी या चाची से शोभा भाभी या शोभा चाची बन गई और एक जाती हुई जिंदगी अपने पूरे शबाब के साथ लौट आई थी।
