बाबू जी, आज तो आपको आना ही नहीं था। कितना तेज बुखार है देखिए तो।… पूरा बदन जल रहा है।’ चौकीदार रामबली ने हीरामन को अपनी कुर्सी पर बिठाते हुए कहा। हीरामन की कांपती हुई बुजुर्ग देह और उसके लड़खड़ाते कदमों को गिरने से बचा कर रामबली आश्वस्त था। हीरामन को तेज हवा से बचाने के लिए रामबली ने उसी के अंगोछे को उढ़ा दिया था। हीरामन ने सारा प्राण लगा कर एक लंबी सांस खींच ली और संभलते हुए बोला, ‘अरे नहीं रामबली… अभी बहुत जान बाकी है मुझमें। मेरे शरीर में अभी कूबत है बच्चे। पहलवानी करता था मैं जवानी में। ये बुखार, ये बुढ़ापा ये सब तो आनी-जानी चीज…’ कहते कहते वह जोर से खांसने लगा और अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाया। रामबली ने अपनी बोतल से निकाल कर चौधरी साहब को साफ पानी पिलाया।

‘आप बैठिए साहब, मैं आपके लिए आॅटो लेकर आता हूं।… बादल घेरे हुए हैं, ना जाने कब बरस जाएं। उठिएगा नहीं, जब तक कि मैं ना लौटूं। कृपा करिएगा मुझ पर, वरना मैं चौधरानी को क्या जवाब दूंगा। उनका सवेरे से कई बार फोन आ चुका है।… मैं अभी आया साहब आॅटो लेकर।…’ इतना कहते हुए रामबली अपने एक साथी को दरवाजे की रखवाली सौंप कर सड़क की ओर निकल गया।

आॅफिस का वक्त खत्म हो गया था, कई और कर्मचारी भी निकले। जुलाई का महीना था। सभी को बारिश शुरू होने से पहले घर पंहुचने की हड़बड़ी थी। सभी ने हीरामन चौधरी को असहाय फाटक पर चौकीदार की कुर्सी पर अधमरा-सा सांस लेने के लिए संघर्षरत देखा। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि आगे बढ़ कर हीरामन को सहारा दे दे। सभी जीवन से ‘हारे’ हीरामन को ‘हरिनाम’ के हवाले करके आगे बढ़ गए।

वैसे उन सभी की इस लाचारी की वजह अपना-अपना स्वार्थ तो था ही, लेकिन उससे भी बढ़ कर सबसे बड़ी वजह दफ्तर का मालिक रमन बेंद्रे था। जिस बाबू की नौकरी पर चौधरी हीरामन आकर इस बुढ़ौती में काबिज हुए थे, वह बेंद्रे ने अपने साले के लिए सुरक्षित रखा था। अब न सही, साले कम से कम उसके अपने ‘पक्के चिड़ी के गुलामों’ को तो वह यह कुर्सी दे ही सकता था। कुछ नहीं तो ‘जी-हजूरी’ तो मिलती ही। लेकिन बेंद्रे लाख कोशिशों के बाद भी इसमें सफल नहीं हुआ। हीरामन की योग्यता, उसकी प्रतिभा के चलते बड़े बाबू का ओहदा उसे ही मिला। बेंद्रे की हीरामन के आगे एक न चली।

टकले बेंद्रे का ‘ईगो’ तो जो हर्ट हुआ सो हुआ ही, आॅफिस में उसकी एकछत्र राज चलाने वाली छवि भी धुंधली हुई। इसका बदला वह हीरामन की बीमारी से ले रहा था। अब मालिक और उसके तीखे बदले के बीच में किसकी जुर्रत जो टांग फंसाए, अपना जी हलकान करे। दया-मया, रहम-इबादत ये सब चोंचले रोजी-रोटी के बीच नहीं देखे जाते। यही दुनिया-जगत का सदा चलने वाला दस्तूर है। इस दस्तूर को सभी कर्मचारी निभा रहे थे, और हीरामन चौधरी और उसकी असहनीय हालत से आंख बचा कर निकलते जा रहे थे। उन सबकी खुदगर्ज और चोर आंखें आसमान में बादलों की बेकली का जायजा लेने में लगीं थीं, खासकर जब वे हीरामन के सामने से गुजर रहे थे।

हीरामन चौधरी की उम्र होगी यही कोई पचपन-साठ के आसपास। बड़े खानदान में जन्मे हीरामन को ऐसी कोई बड़े आदमियों वाली लत नहीं थी, जो न लगी हो। एकलौती संतान हीरामन चौधरी ने पैसे-रुपए को ताजिंदगी मिट्टी बराबर समझा और पूरी जवानी शबाब, कबाब और शराब को जी भर छका था। अब बुढौती में देह का मलिन और कमजोर होना कोई अनोखी बात नहीं थी।
रमन बेंद्रे, चौधरी खानदान, उसकी मिल्कियत और ठाठ-बाट से भी जनम से स्वाभाविक जलन रखता था।

अब जब हीरामन जैसी ‘विपदा’ उसके सिर, उसके दफ्तर, उसके कामकाज के दायरे से आ चिपकी तो वह हरसंभव कोशिश करता रहा कि हीरा को इतना सता दे कि हीरा खुद ही इस्तीफा देकर नौकरी छोड़ कर चला जाए। लेकिन हीरामन भी एक ही फौलाद जैसी औलाद था, अड़ गया तो बस अड़ा रहा। न नौकरी छोड़ रहा था, और न बेंद्रे का पिंड। वह सब कुछ सह कर नौकरी से चिपका हुआ था। अब उसका खानदानी-वैभव, हवेली-बंगला सब नष्ट हो चुका था। इस नौकरी के सिवा अब उसके पास कोई दूसरा आसरा बचा ही नहीं था। उसकी बीवी राधिका चौधरी दुआ-मिन्नत करके, ऊपरवाले का नाम लेकर किसी तरह टूटी-फूटी गृहस्थी चला रही थी। उसे पूरा भरोसा था कि एक न एक दिन उसकी सेवा, लगन और रखरखाव हीरा को वापस भला-चंगा कर देगी। राधिका हीरा की और हीरा राधिका की जान थे।

राधिका चौधरी का फोन फिर से टिनटिनाया। रामबली एक बार फिर से चौधराइन को वस्तुस्थिति बताने लगा, ‘जी मयडम, सर के लिए आॅटो खोजने आया हूं। जाम ना मिला तो साहेब एक घण्टे में घर पंहुच जाएंगे। बारिश से पहले वो घर पंहुच जाएं बस, यही प्रार्थना है मयडम।…’ रामबली ने आगे बताया, ‘आॅफिस से बीमार या जरूरत के लिए गाड़ी मिलती है, लेकिन सर को बेंद्रे कभी नहीं देंगे। आप तो जानती हैं सब मयडम।…’

अगले दिन हीरामन और परेशान था। उसकी तबियत पहले से ज्यादा बिगड़ गई थी, एक नोटिस उसकी टेबल पर इंतजार करता मिला। एक भी छुट्टी उसकी बाकी नहीं थी। बायोकेमेंट्री पर एंट्री अपरिहार्य हो गई थी। यानी हीरामन को ठीक दस बजे दफ्तर पंहुचना होगा और अपने रेटीना और हाथ के पंजे से एंट्री करके शाम छह बजे दोबारा दफ्तर छोड़ने की एंट्री भी खुद करनी होगी। एक वक्त भी ऐसा न करने पर उसकी पूरे दिन की तन्ख्वाह काट ली जाएगी। इस नए कायदे ने हीरामन की हालत में कोढ़ पर खाज का काम किया। वह जो पहले ही शारीरिक आंधियां झेल रहा था। अब मानसिक रूप से और त्रस्त हो गया। उसके सिर पर कई उधार और घरेलू खर्चों सहित दवा-टेस्ट-डॉक्टर्स का दबाव भी था। थोड़ी बहुत रियायत वह देर-सबेर आने की ले लिया करता था, अब इस नए फरमान के चलते वह नामुमकिन हो गई थी।

कुर्सी पर बैठने में वह असमर्थ था, फिर भी बैठना था, जिसके चलते उसकी जांघों और पिछवाड़े की खाल छिलने लगी। वह आठ घंटा एक ही कुर्सी पर गिरा रहता। बैठे-बैठे अपनी कमजोर देह को कभी इस करवट, कभी उस करवट डुला लेता। पेशाब जाने के लिए चपरासी, उसका असिसटेंट, चौकीदार सब मिल कर उसे शौचालय तक पंहुचाने में मदद करते। वह जब भी अपनी कुर्सी से उठता, कुर्सी पर खून के धब्बे साफ दिखाई देते थे।
समय हमेशा किसी का एक सा नहीं रहता। जमाना करवटें बदलता रहता है। लेकिन टुच्चे हमेशा एक जैसी ‘टुच्ची मानसिकता’ रखते हैं, ‘टुच्ची जबान’ ही बोलते हैं।

चौधरी खानदान से जलने-कुढ़ने वाले लोग, जिन्होंने हीरामन को उरूज पर देखकर हमेशा हाथ मला था, वे खिसियानी बिल्ली सरीखे, रंगे सियार पीठ पीछे हीरामन की इस बुरी दैहिक स्थिति को देखकर हंसी उड़ाने से बाज नहीं आते थे- ‘औरतों की माहवारी तो सुना था, बड़े खानदान में बुढ़वों की भी माहवारी आती है, ये राज आज जाना।…’

अर्दली लोग इन बातों को अनसुना करके, वापस हीरामन को उसकी उसी लहूलुहान कुर्सी पर बिठा जाते। उन आठ घंटों में वह बहुतेरी फाइलें निपटा देता था। निस्संदेह काम करने में वह उस्ताद था, लेकिन हांफती-कराहती-डूबती सांसों के आगे उसका बस नहीं चल रहा था। वह बेदम होकर कई बार फाइलों पर गिर जाता। चपरासी ‘बाबू जी, बाबू जी’ कह कर हंकारा लगाते, वह फिर उठता, चपरासी की ओर देखकर जीवित होने के अहसास के साथ मुस्कुरा देता। दो घूंट चाय-पानी पीता और अनमना-सा होकर फिर फाइलों में खो जाता।

कभी-कभार दफ्तर के फाटक पर आॅटो के इंतजार में जब उससे बैठा नहीं जाता था, वह अपने सिर पर ओढ़े अंगोछे को पेड़ के नीचे बिछा कर लेट जाया करता था। किसी की दया की भीख स्वीकार करना उसके चौधरी खून को गवारा नहीं था, जो फिलवक्त रिस रिस कर उसके पायजामे को भिगो रहा था।
कई दिन तक यही उपक्रम चलता रहा। हीरामन का बुखार से तपता जिस्म फाइलें निपटाता रहा।

लोगों की मदद से आॅटो में वह कुछ यों बिठाया जाता, जैसे कोई भारी-भरकम सामान संभाल कर रख दिया गया हो, दूसरे दिन वापस उतारने के लिए। आॅफिस जाते वक्त हीरामन की बीवी घर के दरवाजे तक आॅटो बुला कर लाती थी, दोपहर के खाने, दवाइयों और जरूरी कागजात के साथ उसे दफ्तर रुख्सत करती। जब वह वापस आता, फाइलों समेत पकड़ कर उसे घर के भीतर लिवा ले जाती।

कई हफ्ते यह सिलसिला चलता रहा। तेईस की सुबह पांच बजे हीरामन बिस्तर से नहीं उठा। रात दो बजे तक राधिका उसके पांव दबाती रही, माथा सहलाती रही। डॉक्टर-नर्स उसे नियमित दवा देते रहे, लेकिन बाईस की रात को वह ऐसा सोया, कि तेईस की सुबह नहीं उठ सका। उसके पीछे से रिसता खून जम गया था। उसका पाजामा अब गीला नहीं रहा। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। अगली सांस वह बहुत कोशिशों के बाद भी न ले सका।

हीरामन अब इस दुनिया में नहीं रहा। आॅफिस में बैठे रमन बेंद्रे को कुछ तसल्ली मिली। फिर भी उसके जी में यह खुन्नस बाकी रही, कि वह जीते-जी हीरामन का कुछ बिगाड़ नहीं सका। लिहाजा, उसने मौजूदा माह की उसकी तनख्वाह रोक दी। कर्मचारी जो मातमपुर्सी और अंतिम-यात्रा के लिए हीरामन के किराए के मकान पंहुचे थे, उन्होंने लिफाफे में महज शोक-संदेश रख कर राधिका को थमा दिया।

कई बाकी बिलों और उधारी के बोझ से दबी राधिका ने हीरामन की आखिरी तनख्वाह का चेक समझ कर लिफाफा थाम लिया, लेकिन वह महज शोक-संदेश निकला, जिसे देखकर रमन का कुटिल-कमीना चेहरा राधिका की आंखों में पानी के साथ तैर गया, और वह निर्विकार भाव से हीरामन की गतिहीन देह देखने लगी।

बहरहाल, हीरामन अपने तमाम सुख-दुख भुगत कर विदा हुआ। राधिका उस प्रेमी जीव हीरामन की आखिरी मोहब्बत थी, जिसे वह ईश्वर प्रदत्त आखिरी तोहफा समझता था, और बड़ी शिद्दत से उसकी गुलामी करता था। हीरामन ने पूरी दुनिया से बगावत की, लेकिन अपनी नई ब्याही खूबसूरत बीवी से कभी नहीं उलझा। हीरामन के लिए राधिका के वचन किसी हदीस से कम नहीं थे।

रमन बेंद्रे ने राधिका को भी हीरामन की आखिरी तनख्वाह के लिए बहुत परेशान किया। ठीक उसी माह की तनख्वाह, जब हीरामन खून की उलटियां करता वक्त से पाबंद होकर कुर्सी पर बैठा करता था। एक दिन छब्बीस तारीख को राधिका को उसी दर्ख्वास्त के पास होने की सूचना मिली, जो प्रकाश ने हीरामन के आने-जाने के वास्ते आॅफिस की गाड़ी के इंतजाम के लिए लिखी थी। राधिका ने जवाब में कहा, ‘उनके शरीर को घाट तक पंहुचाने के लिए एंबुलेंस आई थी, आॅफिस की गाड़ी रमन बेंद्रे को ढोती रहे, वही बेहतर है।…’

रमन यह सुन कर और कुढ़ गया। वह जानता था, राधिका किसी भी लहजे में अपने पति की खुद्दारी में कमतर नहीं है। लेकिन फिर भी राधिका को सता कर रमन को वह सुख नहीं मिलता, जो हीरा को सताने में मिलता था। उसने हीरा की आधी-अधूरी तनख्वाह रिलीज करवा दी।
कहते हैं, वक्त की लाठी का वार बहुत दमदार होता है। समय पलटा, रमन बेंद्रे पर भ्रष्ट्राचार के बड़े-बड़े आरोप लगे। मंत्रालय में उसकी शिकायतें बराबर पंहुचती रहीं थीं। जांच बैठी। आरोप सही पाए गए। बेंद्रे को न केवल पद से हटाया गया, बल्कि आने वाले वक्त में उसे लंबी सजा मिलने के आसार भी दिखने लगे। विरोधी जबानें मुखर हुर्इं।

अंतत: एक दिन उसे आॅफिस को विदा कहना ही पड़ा। इस आखिरी दिन रमन बेंद्रे बहुत झल्लाया हुआ था। गाड़ी जब दरवाजे तक पंहुची, तो रामबली ने फाटक खोला। रमन तैश में अपनी व्यक्तिगत गाड़ी में बैठने ही चला, कि उसके पांव लड़खड़ा गए। रमन उसी जगह गिरते-गिरते बचा, जहां पेड़ के नीचे कभी हीरामन आॅटो के इंतजार में अपना अंगोछा बिछाकर लेट जाता था। रामबली ने दौड़ कर बेंद्रे को संभाला। वह अचकचा कर संभलते हुए फौरन कार के अंदर जा बैठा। रमन बेंद्रे ने रामबली को ‘शुक्रिया’ कहते हुए फाटक पार किया।

रामबली ने कहा, ‘लड़खड़ाते कदमों को संभालने की मेरी आदत है साब।… आप तो अभी अच्छे-भले हैं।…’ और दोनों को ही हीरामन चौधरी का असहनीय तकलीफों में भी मुस्कुराता हुआ चेहरा याद आ गया।