सुबह-सुबह ट्रेन सोनागिरी पहुंच गई। कड़ाके की ठंड थी। ओवरकोट का कॉलर ऊपर करता मैं अटैची पकड़े प्लेटफार्म पर उतरा। प्लेटफार्म खाली पड़ा था। दस-पंद्रह सवारियां ही उतरी थीं। मैं टैक्सी ड्राइवर का इंतजार करने लगा। गाड़ी जब सीटी बजाती चली गई, मैं उलझ गया।… यही तो पता दिया था।… प्लेटफार्म पर ड्राइवर पहुंच जाएगा। मोटा तगड़ा, छोटे कद का आदमी है, पहचाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। दूर-दूर तक मेरी निगाह उठी दो-तीन लोग ही कंबल में दुबके दिखे। टिमटिमाती ट्यूबलाइटें जल रही थीं। कोहरे ने पूरा कब्जा कर रखा था।
मैं अटैची घसीटता हुआ थोड़ा आगे बढ़ा कि एक दुबला सींक-सा युवक दौड़ता मेरे पास आया- ‘साब माफ करो… भोपू भैया को फीवर आ गया…। मैडम ने मुझे भेजा है।… आपका सामान?’
‘यही अटैची है, तुमसे उठाते बनेगा?’
‘अरे साब, क्यों मजाक करते हो, रोज बड़े-बड़े ट्रंक ढोता हूं ट्रेन से।’
‘तुम्हारा नाम क्या है?’
‘कोदू।’
मैं सोच उठा अजीब नाम है भोंपू, कोदू…।
उसने अटैची सिर पर रखी और लड़खड़ाता चलने लगा।
‘देखो संभल के।’ मुझे उसकी दुबली सींक-सी काया पर विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन जब वह सरपट चला, तो थोड़ा बल मिला। जल्द से उसने अटैची जीप पर पटकी और मुझे बैठने को कहा। मैंने पूछा- ‘ड्राइवर?’
‘साब मैं ही ड्राइवर हूं, आप बैठो तो! अभी दस मिनट में आपको हवेली छोड़ता हूं।’
मैं बैठ तो गया, लेकिन रास्ते भर सोचता रहा कि यह भिड़ न जाए। वह गाड़ी तेजी से चला रहा था। गाड़ी ऊबड़-खाबड़ रास्ते में उचकती हुई बढ़ रही थी। दो-तीन बार तो मैं एक फिट उचक गया। मैंने उसे टोका, ‘धीरे चलो, क्या करता है?’
‘साब रास्ता ऐसा है, जगह-जगह गड्ढे हैं। आप चिंता न करें। आपको मैं आराम से पहुंचा दूंगा।’
मन में आया कि गाड़ी से उतर जाऊं। ऐसा बेवकूफ ड्राइवर मैंने नहीं देखा था। जरा भी चतुराई नहीं थी। किसी तरह उचकती जीप हवेली के सामने रुकी।
‘साब आ गई आपकी मंजिल, कोई दिक्कत तो नहीं हुई?’
‘हां हां बहुत बहुत शुक्रिया… अब सामान भी अंदर पहुंचा दो।’
‘अरे साब ऐसा क्यों बोलते हैं, हुक्म करो… मैं तो आप लोगों का दास हूं। उधर से ध्यान हटा कर मैंने हवेली की तरफ देखा, बहुत पुरानी लग रही थी। लगा कई वर्षों से पुताई नहीं हुई। खिड़कियों-दरवाजों पर धूल की परत जमी थी। मीनारों पर चिड़ियों के घोंसले बने थे। दीवारों पर काई जमी थी। लगता ही नहीं था कि कोई अंदर रहता है।
मैं दो कदम आगे बढ़ा ही था कि एक बूढ़ी औरत सफेद घेरनुमा चोंगा पहने, आखों पर मोटा चश्मा डाले आई। मैं देखता रह गया, इसने मुझे बुलाया! फोन पर आवाज तो कितनी मधुर थी। यह कौन है? मस्तिष्क में मंथन चल ही रहा था कि वह बोली, ‘साब ऊपर चलो। आपको कमरा दिखाती हूं।’ मैंने सोचा कि मैं यहां रुकने थोड़े ही आया हूं, मैं तो उस मधुर आवाज के नेह निमंत्रण पर आया था, जो मेरे अंदर पैठ गई थी और उसकी झलक के लिए मन तड़फ उठा था। रास्ते भर यही सोचता आया कैसी होगी! राजकुमारी सी, अप्सरा सी या एक्ट्रेस सी। उसके आमंत्रण को मैं ठुकरा नहीं सका। रोज ही तो उससे बातें होती थी।
सपनों के रंगों की क्यारियां खिलती थीं, ठहाके लगते थे, सांसें गरमा जाती थीं। खिड़कियों को तोड़ता मन बाहर उचकता। आखिर अत्कंठाएं आने को मचल गर्इं।
उस बूढ़ी औरत ने अटैची कमरे में रख दी। कमरा भव्य था, फर्श पर कालीन बिछा था। डनलप के सोफे थे। शाही पलंग था। खिड़कियों पर रेशमी पर्दे झूल रहे थे। सोच भी नहीं सकता था कि बाहर से काली भुतही हवेली अंदर से इतनी भव्य होगी।
‘साब पानी रखा है। किसी चीज की जरूरत हो, तो कॉल बेल बजाइए।’
‘हां… हां… ठीक है।’
मैं बड़े पशोपेश में था कि यह सब प्रबंध मेरे लिए क्यों किया जा रहा है? कौन है वो, सामने क्यों नहीं आ रहीं है। कुछ देर में ब्रेकफास्ट भी आ गया, कटलेट, चिप्स और कॉफी…। मैं चकित रह गया इन्हें कैसे मालूम कि कटलेट मुझे पसंद है। मैं तुरंत खाने बैठ गया। भूख जोर से लगी थी, सफर से आया था। खाते-खाते मेरी नजर कमरे में घूमी, देखा हर चीज पिंक थी। फैन भी पिंक था, कमरे की टीवी, एसी सोफा पलंग और उस पर बिछे चादर…। मेरा सिर घूम गया। इतनी समानता… जरूर जो भी है वह मुझे जानती है, लेकिन फोन पर पसंद-नापसंद की बात तो कभी नहीं हुई! फिर यह सब केसे?
नाश्ते के बाद मैं उसका इंतजार करने लगा, जिससे मिलने आया था। मैंने कॉलबेल बजाई। वही बूढ़ी औरत आई। मेरा सिर घूम गया। कहां से आ गई, उसका चेहरा मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था। मुझे चुप देख बोली, ‘क्या चाहिए साब?’ मैं सोच में पड़ गया… क्या बोलूं… कैसे उसका नाम लूं… कुछ गलत अभिप्राय न समझे। आखिर होठों पर शब्द आ ही गए, यह कोठी रायसाहब की है।
‘हां… लेकिन अब वह यहां नहीं रहता।’
‘फिर कौन है यहां?’ मेरे दिल से निकल ही गया।
‘आप फ्रेश हो जाइए, लंच तैयार हो रहा है।’ मुस्कुराती हुई चली गई।
मेरी बेचैनी और बढ़ गई, क्या चल रहा है। मैं जिससे मिलने आया हूं उसका पता नहीं… वो यहां रहती है कि नहीं… ऐसे तमाम सवाल मन में कौंध गए। मैंने उठ कर खिड़की का परदा खोला, सामने हरी वादियां दिखीं। बड़े-बड़े वृक्ष, लतिकाएं सरोवर में पहाड़ से झरता पानी, मुग्ध कर गया। प्रकृति का अनुपम सौंदर्य बिखरा था। सुबह के कुहरे में धुंधली तस्वीर अब सूर्य की किरणों से साफ हो चली थी। कुछ क्षण विमुग्ध होता मैं सोफे पर पसर गया। देखा, टेबल पर लिट्रेचर की बुक्स और मैगजींस भी रखी थी। ऐश-ट्रे भी थी। मैंने तुरंत सिगरेट निकाली और सुलगाता हुआ बाथरूम में घुस गया। फ्रेश होने के बाद मैं कमरे में आया, देखा तो सेंटर टेबल पर खाने की प्लेटें सजी थीं। तंदूरी रोटी, दाल मखानी, रायता, गोभी की सब्जी- सब मेरी पसंद का।
मैं कौतुक से भर उठा। जो भी है, वह मेरी पसंद से परिचित है। मैं तुरंत खाने में जुट गया।
खाने के बाद देखा, तो वहीं बूढ़ी औरत स्वीट डिश लेकर आ गई। अब मुझसे रहा नहीं गया, ‘अरे वो कहां है?’
‘मैडम आ रही हैं।’
तभी परदा खुला। देखा, चालीस-पैंतालीस वर्ष की एक छरहरी गोरी महिला पिंक साड़ी में लिपटी खूबसूरती बिखेर रही थी। बाल खुले हुए थे, होठों पर लिपस्टक, पैरों पर साड़ी से मैच करती हाईहील की सैंडिल। मेरी नजरें उस पर जम-सी गर्इं। लगा, कहीं देखा है। तभी वह बोली, ‘पहचाना?’
मैं आंख मलता रह गया।
‘कुछ याद आया?’ मेरी बाजू में बैठती हुई वह बोली। बदन में भीनी खुशबू तैर गई। लेकिन यादें अभी बोझिल किए थी।
‘मैं गरिमा…।’
यह नाम वर्षों बाद मेरे अंदर घुला और बर्फ सी यादों को पिघला गया।
‘तुम गरिमा… राय साहब की लड़की?’
‘हां… हां… कुछ और याद करो।’
यादों का पानी दरिया सा झरने लगा। गरिमा के बिना मैं एक क्षण नहीं रह पाता था। वही गरिमा, जो मेरे साथ स्केटिंग करते थकती नहीं थी। चोरी-छिपे हम कितनी बार सिविल लाइन जाते, कॉफी हाउस में बैठते, शापिंग करते, गंगा की लहरों में तैरते। हम लोगों की कम उम्र देख लोग हैरत में पड़ जाते, कुछ हंसते, लेकिन हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम निर्भय बढ़ते रहे। यौवनावस्था का प्रेम चरम सीमा पर था, पर तभी स्थानांतरण से टूट गया। मुझे पिताजी के साथ काशी जाना पड़ा। दो वर्ष बाद आया, तो पता चला रायसाहब परिवार सहित बाहर चले गए।
‘कहां खो गए?’ मुस्कुराते हुए उसने कहा।
मैं नींद से जागा, ‘तुम अभी तक कहां रही… कुछ खबर नहीं दी?’
‘पापा के साथ आस्ट्रेलिया चली गई थी। पापा ने वहां कपड़े की फैक्ट्री खोली थी। डी.लिट करने के बाद मेरी शादी हो गई। सब अच्छा चल रहा था, लेकिन एक एक्सीडेंट में सब बर्बाद हो गया। पापा-मम्मी के साथ मेरे हसबैंड की भी मृत्यु हो गई। आज उस हादसे को दस वर्ष हो गए, लेकिन वे जख्म आज भी मेरे दिल में भरे हैं, जो भर नहीं पाए। मैंने उन क्षणों को बिसारने की बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं भुला पाई। इंडिया आ गई।’
उसकी कहानी सुन कर मेरा रोम रोम द्रवित हो गया।
‘तुम कैसे हो…?’
‘वैसा ही जैसे पहले था, लेकिन तुमको मेरी खबर कैसे लगी?’
‘खूब कहानियां लिखते हो। अब भी मजनू बने हो… तुम्हारा नाम मैग्जीन्स में देखा।’
सारी हकीकत मेरे सामने आ गई। अच्छा यह बात है! मोबाइल, वाट्सएप में मुझसे बात करती रही, लेकिन अपना परिचय छुपाए रखा।
‘तुम तो बहुत बड़ी तीरंदाज निकली।’
‘इसमें शक क्या… आस्ट्रेलिया में मैंने कई अवार्ड तीरंदाजी में जीते हैं।’
‘मैं उसकी बात नहीं कर रहा… मैं कुछ और जानना चाहता हूं।’
‘हां, जानती हूं तुम अकेले हो। तुम्हारी एक बच्ची है। तुम्हारी वाइफ का देहांत कैंसर की बीमारी से हो गया। तुम उस गम से अभी उबर नहीं पाए हो।…’
मैं आवाक रह गया। गरिमा को तो मेरी पूरी हिस्ट्री मालूम है। फिर भी मुझे बुलाया। मैं हवेली के भंवर जाल में उलझ गया। गरीब इंसान से यह कैसी अपेक्षा?… क्या बचपन का प्रेम अब भी शाश्वत है? नहीं नहीं, वह गुजरे वक्त की बात है। उसमें न पड़ना ही अच्छा।…
मैंने तुरंत फूटने का मन बना लिया।
‘किस सोच में पड़ गए, इस तरह तुम्हें नहीं जाने दूंगी। मैं प्रयाग में फाइव स्टार होटल खोल रही हूं। तुम मैनेजिंग डाएरेक्टर होगे।…’
आसमान मेरे कदमों में ऐसा गिरेगा, सोचा भी नहीं था।
योगेश दीक्षित
