रश्मि दीक्षित
पापा आज आपका जन्मदिन है, हम आपके लिए छोटा-सा उपहार लाए हैं।’ बेटा, बहू ने जब गोविंद जी को उपहार दिया तो उस पर लगी कीमत का पर्चा देख कर वे स्तब्ध रह गए। नाराज होते हुए बोले- ‘इतनी महंगी कमीज! पंद्रह सौ रुपए की शर्ट होती है क्या! तुम लोग बहुत फिजूलखर्ची करते हो। बेटा बोला- ‘पापा आपने हमारे लिए जो किया है उसके आगे तो यह कुछ नहीं है।’
गोविंद जी को वह दिन याद आ गया जब वे नया पैंट-शर्ट पहन कर आॅफिस चले गए थे और उनके साहब ने उस पर कटाक्ष किया था। उस दिन के बाद से आज तक उन्होंने नई जोड़ी कपड़े साथ नहीं पहने। न जाने क्यों साहब के वे शब्द कानों में गूंजते रहते हैं। हालांकि आज वे भरे-पूरे परिवार, जमीन-जायदाद मालिक थे, पर पुराने दिनों के संघर्ष को भूल नहीं पाए थे।
सुबह के नौ बज रहे थे। वे अपनी आराम कुर्सी पर बाहर गैलरी में आकर बैठ गए। बेटे ने अपनी नौकरी के चलते शहर में मकान ले लिया था, जो दसवीं मंजिल पर था। सो, बार-बार चढ़ना-उतरना संभव नहीं था। गैलरी में बैठ कर बाहर की रेलमपेल देखा करते थे। वहीं से पत्नी को आवज लगाई- ‘अजी आज नाश्ते की तैयारी है या सीधे खाना ही खिलाओगी। और मुस्कराते हुए अखबार के पन्ने पलटने लगे। अंदर से श्रीमतीजी चाय और पकौड़ों की प्लेट ले आर्इं। दोनों गैलरी में ही बैठ गए। गोविंदजी बोले-‘संध्या! कितना समय निकल गया, हम कहां से कहां आ गए। आज सुहास ने जब मुझे इतनी महंगी शर्ट दी, तब मुझे अपनी हैसियत का आभास हुआ, नहीं तो मैं अभी तक अपने आप को साहब का नौकर ही समझता था।
जिस दिन साहब ने मुझे नए कपड़ों को लेकर टोका, पता नहीं क्यों तबसे मन में हीन भाव आ गया था। कभी अपने लिए कुछ सोचा ही नहीं, सिर्फ काम मेरा मकसद था। मुझे आज भी याद है मेरा बचपन। गांव से दस मील दूर स्कूल। बारिश हो, गर्मी या कड़कड़ाती ठंड, चले जाते थे। पढ़ाई का जुनून था मन में। स्कूल दसवीं तक ही था, फिर आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना था। शहर जाने वाले दिन अम्मा दिन भर रसोई से बाहर नहीं निकलीं। मेरे लिए न जाने क्या-क्या बनाती रहीं। बाबूजी भी दिन भर चैपाल पर ही बैठे रहे। घर में उदासी छा गई थी। पर मुझे तो जाना था शहर। अम्मा, बाबू आए थे बरगद तक छोड़ने, पर बोले कुछ नहीं। उनका मूक आशीर्वाद था मेरे साथ। आंखें बोल रही थीं, मेरी और उनकी भी। बस में बैठ कर शहर आ गया। गांव के कुछ और बच्चे शहर में रह कर पढ़ रहे थे। उनकी मदद से शहर के कॉलेज में दाखिला ले लिया और अपने सपने को साकार करने में लग गया। पराए शहर और ग्रामीण भाषा का संयोजन बड़ी मुश्किल से हो पा रहा था। बहुत परेशानी और झिझक का सामना होता था, फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हुआ।
कभी-कभी मां, बाबू की बहुत याद आती थी, पर घर जाने के पैसे नहीं होते थे। बाबू आने-जाने वालों के हाथ कुछ पैसे भिजवाते थे, उन्हें ही गिन-गिन कर खर्च करता था। वह भी कहां से भिजवाते, कहां से लाते। मां के दिए पीतल के गिलास को सिरहाने रख कर सोता था, जो मां की कमी पूरी करता था। धीरे-धीरे इसी तरह समय बीतता गया और मेरी पढ़ाई भी पूरी हुई। उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, जब मुझे पहली कोशिश में ही नौकरी मिल गई थी। घर में उत्सव का माहौल था। अम्मा, बाबू तो पागल हुए जा रहे थे। इतने दिनों बाद मैं घर आ रहा था। दोनों बरगद के नीचे सुबह से आकर बैठ गए थे। जैसे ही मैं बस से उतरा, दोनों के आंसुओं ने मेरा स्वागत किया था।
उस दिन अम्मा ने कितना खाना बनाया था। मैंने भी जम कर खाया। कितने दिनों बाद घर का खाना मिला था। रात को अम्मा के पास ही सोया और रात भर उनके हाथों को अपने ऊपर सहलाते हुए महसूस किया। बहुत बार कोशिश की कि नौकरी के बारे में बता दूं, पर हिम्मत ही नहीं हो रही थी। सुबह बाबूजी को बताया और समझाया। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे मान गए, पर अम्मा को बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी। शाम तक हिम्मत कर बोल ही दिया- ‘अम्मा मेरी नौकरी लग गई है, मुझे बड़े शहर जाना पड़ेगा।’ अम्मा थोड़ी देर चुप बैठी रहीं, फिर बोली- ‘तुम हम दोई हैं, कुआं में पटक आओ, फिर चरे जइए जिते जानौ है। पहले पढ़न जाएं, फिर नौकरी करन जाएं। तुमाओ मन नहीं लगे इतै। अब झां का खान के नहीं मिले तुमैं जो शहर जाए रहे हो।’
बाबूजी सब सुन रहे थे। धीरे से बोले- ‘जान दे गोर्इं! जीते जानो हैं, करन दे नौकरी, बाकी उमर है करन कि। हमरे दिन निकर गए, बाहे तो निकरन दे बाहर। जा मोड़ा। सामान बांध ले और कछु चइए हो तो बता दियो।’ और वह उसी चैपाल पर जाकर बैठ गए और अम्मा भी रसोई के धुएं में अपने आंसू छुपाने लगीं।
सुबह सब तैयारी कर अम्मा, बाबू ने उसी बरगद से मूक विदाई दी। बस में सामान लादे मैं अपने नए सफर पर निकल पड़ा। मेरी पहली पोस्टिंग अलीराजपुर के पास एक गांव में थी। वहां पहुंचते-पहुंचते रात हो गई। ठंड के दिन थे। पूरा बस स्टैंड सुनसान पड़ा था। सामान उतारने गया, तो बिस्तर का बंडल नहीं मिला। ड्राइवर से पूछा, तो बोला- ‘हमें क्या पता, गिर गया होगा कहीं।’
उस समय मेरी उम्र महज इक्कीस साल थी। डर के मारे बचे सामान को बटोर कर वहीं बेंच पर सो गया। इतनी ठंड थी कि सूटकेस के सारे कपड़े पहन लिए, फिर भी कंपकंपाते हुए रात निकाली। सुबह आॅफिस का पता पूछ कर पहुंच गया और ज्वाइनिंग लेटर साहब की टेबल पर रख दिया। मेरी वेशभूषा और इस हरकत से बड़े साहब नाराज हो गए और चिल्लाते हुए बोले- ‘यह कौन है! और बिना पूछे अंदर कैसे आ गया?’ फिर ज्वाइनिंग लेटर देख कर थोड़ा शांत हुए और बोले- ‘इतना पढ़े-लिखे हो,पर तहजीब सीखे नहीं। जाओ, थोड़ी देर से आना।’ मैं बाहर आ गया। इस घटना क्रम से मैं बहुत सहम गया था। एक बाबू बोला- ‘तुमने आते ही बड़े साहब को नाराज कर दिया है, अब पता नहीं क्या होगा।’
थोड़ी देर बाद साहब ने बुलवाया और कहा- ‘कल से ज्वाइन कर लेना, और अपनी वेशभूषा सुधार कर आना। यह आॅफिस है, सब्जी बाजार नहीं, जो कैसे भी चले आए। अगले दिन मैं नए कपड़े पहन कर आॅफिस पहुंचा, जो बाबूजी ने अभी सिलवा कर दिए थे। बड़ा खुश था मैं। आॅफिस का पहला दिन और नए कपड़े। सीधा साहब के कमरे में पहुंचा। साहब किसी काम में व्यस्त थे। मैंने जाते ही कहा- ‘साहब नमस्ते! और हाथ जोड़ कर उनके सामने खड़ा हो गया, इस आशा में कि वे तारीफ करेंगे और मेरे नए कपड़ो को देखेंगे, क्योंकि गांव में तो नए कपड़े सिलवाना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। नए कपड़े लगभग महीने भर तक नए रहते। जो देखता वह पूछता- ‘नए सिलवाए हैं’ बड़ा अच्छा लगता है। साहब ने मेरी और देखा और खींझ कर बोले- ‘देखो इन्हें चले आए हैं नए पंछी, नए कपड़े दिखा रहे हैं हमें। सूट-बूट पहन कर आए हैं आॅफिस। मेरी शादी में आए हो क्या।’ मेरा सारा उत्साह खत्म हो गया, वे नए कपड़े शरीर पर कांटों से चुभ रहे थे। वह दिन था और आज का दिन, कभी नए कपड़े एक साथ नहीं पहने। शर्ट पुराना हो जाता, फिर पेंट पहनता।
आॅफिस में साहब का दबदबा था, सब डरते थे। साथ वालों ने कई बार कहा- ‘नए हो, तबादला करवा लो।’ पर मैं भी धुन का पक्का था। अपने काम से सबका दिल जीत लिया। मेरे सामने साहब रिटायर हुए तो नए कपड़े और ढेर सारा आशीर्वाद देकर बोले-‘बेटा इसी तरह लगन से काम करना, हमेशा आगे रहोगे।’
गोविंद जी अपनी पुरानी यादों में खोए अपनी पत्नी को पुराने दिनों के संघर्ष की यादें सुना रहे थे। संध्या बोली- ‘अब उन यादों से बाहर आ जाओ और चाय पियो, ठंडी हो रही है। सुहास और बहू आते होंगे, आज वे लोग तुम्हारा जन्मदिन मनाने वाले हैं, तैयारी करनी है।’ गोविंद जी ने घड़ी देखी, बहुत समय हो गया था। वे उठ कर बाथरूम में चले गए और तैयार होकर गैलरी में आ गए। आज उन्हें अपना पुराना वक्त बहुत याद आ रहा था। आज वे पैंसठ साल के हो गए थे। रिटायर होने के बाद बेटे के पास आ गए। बेटा-बहू दोनों नौकरी करते थे। वे और उनकी पत्नी दिन भर अकेले रहते।
बेटा बहुत ध्यान रखता था। हर तरह की संपन्नता थी, पर आज वे अपने अतीत को पता नहीं क्यों भूल नहीं पा रहे थे। उन्हें याद आ रहा था, कैसे उन्होंने शुरुआती दिनों में नौकरी की। साहब उन्हें गांव में सर्वे करने भेज देते, जहां न आने जाने की सुविधा होती और न रुकने की। एक बार ऐसे ही गांव में चला गया। सर्वे करते रात हो गई और लौटने के लिए कोई साधन नहीं था। मजबूरन एक किसान के घर रात बिताई। बेचारे ने चने भंूज कर खिलाए। वही खाकर पानी पीकर, उसकी फटी गुदड़ी में रात बिताई। जीवन के संघर्ष ने कई बातें सिखाई कि बाहर जाओ तो कुछ खाने-पीने के लिए जरूर रखो, पता नहीं कब जरूरत पड़ जाए।
एक बार सर्वे से लौटते समय रास्ते में पड़ने वाली नदी में बाढ़ आ गई। घर पहुंचना भी जरूरी था। गाड़ी बाढ़ में बढ़ा दी। आधी नदी पार हुई थी कि तेज बहाव में गाड़ी बह गई। मैं जैसे-तैसे तैर कर किनारे लगा। घर में पत्नी और दो महीने का सुहास अकेला था। पता नहीं कितने संघर्षों को पार कर आज इस मुकाम को हासिल किया था। नौकरी में प्रमोशन और जगह-जगह स्थानांतरित होता रहा। हर जगह अपने अच्छे काम और ईमानदारी के कारण सबका प्रिय बना रहा।
शाम को सुहास और वीणा बड़ा-सा केक ले आए और गोविंद जी को सामने बैठा कर कटवाया। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। संध्या समझ गई कि इन आंसुओं की वजह क्या है। वह बोली- ‘क्यों उन पुरानी यादों को याद करते हो और बार-बार परेशान होते हो। जो सामने है, उसी को सच मान कर जियो। आपने जिंदगी भर कभी आराम नहीं किया, हमेशा अपना वक्त दूसरों को दिया। अब परिवार के साथ खुशी से रहो। गोविंद जी बोले- ‘यह याद ही असली भट्ठी है, जिसमें जीवन भर जला और तप-तप के सोना हो गया। आज मेरा मान-सम्मान है, आज भी लोग मुझे याद करते हैं। आज अम्मा की बहुत याद आ रही है, वह मेरे जन्मदिन पर आटे का हलवा बनाया करती थी। बड़े प्रेम से मुझे खिलाती। बाबूजी भी खेत से जल्दी आ जाते थे, बहुत अच्छा लगता था।
सुहास ने उदासी दूर करने के लिए पुराने गाने लगा दिए, जो गोविंद जी को बहुत पसंद थे। गोविंद जी संध्या से बोले- ‘तुम्हें याद है, सुहास के जन्म के बाद अम्मा कितनी बीमार हो गई थीं, कैसे उन्हें कैंसर ने जकड़ लिया था। बेचारी बहुत भोली थी, कभी अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताई। जब बीमारी बहुत बढ़ गई तब पता चला। छोटा सा सुहास, और अस्पताल के चक्कर, कितना कठिन समय था वह। उस समय दूसरे शहर में दिखाना पड़ा था उनको। आज तो कदम कदम पर अस्पताल और दवा की दुकानें हैं, पर उस समय उन्हें डॉक्टर के पास ले जाने तक के लिए साधन नहीं मिला था। वह तड़पती रही और जब डॉक्टर के पास ले गए तब तक बहुत देर हो गई थी। अम्मा मुझसे विदाई लेकर हमेशा के लिए चली गई थी। उस दिन से मैंने अपना जन्मदिन मनाना छोड़ दिया था। ऐसा लगता था, अम्मा के साथ मेरी खुशियां भी चली गई हैं। बाबूजी भी अकेले बैठे रहते। कभी कहते, लल्ला मुझे कुछ दिन गांव में छोड़ आ, तेरी अम्मा की यादों के साथ वही रहूंगा कुछ दिन। मैं कुछ दिन तो टालता रहा, पर उन्होंने ज्यादा जिद की तो छोड़ कर आना पड़ा। पर कुछ दिनों बाद ही गांव से खबर आई कि बाबूजी बहुत बीमार हैं। दौड़ा-दौड़ा गया और उन्हें लेकर आया, कुछ दिन बाद वे भी अम्मा के पास चले गए। मैं बिल्कुल अकेला रह गया था।
तब आज जैसी व्यस्त दुनिया नहीं थी और न ही इतनी सुविधाएं, पर लोग अच्छे थे। उनमें प्रेम था, पड़ोसी भी भाई जैसा प्रेम रखते थे, आज तो भाई भी भाई को नहीं पूछता। सारी दुनिया मशीन बनी हुई है। हम मशीनों से काम नहीं करवाते, बल्कि मशीनों ने हमें अपने जैसा निर्जीव बना दिया है। एक ही परिवार के लोग महीनों अपने घर के लोगों से ही नहीं मिल पाते। क्या करें! खैर छोड़ो सब, जमाना बदल गया है। चलो बच्चो, अब सो जाएं। सुबह तुमसे कुछ बातें करनी हैं।’ इतना कह कर वे अपने कमरे में चले गए।
गोविंद जी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। कल अपने बरसों के सपने को सुहास के सामने रखने वाले थे। उसे मना करने की उम्मीद तो नहीं थी, पर क्या पता आज के बच्चों का मन, मना कर दिया तो। इसी कशमकश में पता नहीं कब सुबह हो गई। बारिश के दिन थे, सुबह से ही बादल अंधेरा किए हुए थे। चिड़ियों की चहचाहट से गोविंद जी की नींद खुली। देखा तो छह बज रहे थे। संध्या उठ चुकी थी। गोविंद जी भी तैयार होकर गैलरी में आ गए और संध्या को आवाज लगाई- ‘अजी सुनती हो! सुहास और बहू उठ गए हों, तो भेजना। थोड़ी देर में सुहास और वीणा उनके सामने खड़े थे। सुहास बोला- ‘क्या बात है पापा, इतनी सुबह-सुबह! तबीयत तो ठीक है आपकी? कल से बहुत अनमने लग रहे हैं आप।’ गोविंद जी बोले- ‘बैठो, मुझे तुम लोगों से आज बहुत जरूरी बात करनी है। मैं चाहता हूं कि गांव की जमीन पर एक छोटा-सा दवाखाना खुलवाया जाए, जहां बहुत कम पैसों में गांव वालों का इलाज हो, ताकि कोई बिना इलाज के न मरे। मैं इस अनुभव से गुजर चुका हूं कि सुविधाओं के न होने से कितनी परेशानी होती है। अगर गांव में दवाखाना होता तो शायद अम्मा, बाबूजी आज मेरे साथ होते। तुम्हारा क्या विचार है? तुम दोनों तो अपना-अपना कमा-खा रहे हो, मैं अपनी पेंशन वहां लगा दूंगा। अपनी हैसियत के अनुसार काम करवा लूंगा। तुम बताओ यह सही है या गलत?’
सुहास बोला- ‘पापा, आप क्या सोच रहे थे कि मैं मना कर दूंगा? आपके हर फैसले का स्वागत है। हम दोनों से भी जितना होगा, आपकी मदद करेंगे। पापा मैंने दादी को नहीं देखा पर उनका प्यार महसूस कर सकता हूं। आप चिंता न करें, हम गांव चल कर बात कर आते हैं। काम शुरू करवा देते हैं और बीच-बीच में जाकर देख आया करेंगे।’
बेटे की हिम्मत मिलते ही गोविंद जी बेफिक्र हो गए। वे मन ही मन अपने अम्मा, बाबू को याद कर कह रहे थे।

