शिल्पा जैन सुराणा
जग्गू, फ्रिज में पड़ी चॉकलेट तुमने खाई?’ मम्मी ने गुस्से में पूछा।
‘नहीं मम्मी।’ जग्गू अपने खिलौने से खेलते हुए लापरवाही से बोला।
‘तो ये चॉकलेट का रैपर तुम्हारे बैग से कैसे निकला?’ मम्मी ने गुस्से से कहा।
‘वो मम्मी, मैंने… मैंने ही खाई।’ जग्गू धीमी आवाज में बोला।
‘जग्गू, मैं परेशान हो गई हूं तुम्हारी इन गंदी आदतों से। चॉकलेट, चिप्स और बाहर का खाना खाना अच्छी बात नहीं है। कितनी बार समझाना पड़ेगा तुमको। कोई भी चीज लिमिट में खाएं तो ही सही रहती है। अपनी चटोरी जीभ पर काबू रखो, वरना तुम्हें ही ये नुकसान पहुंचाएंगी।’ मम्मी ने कहा।
‘सॉरी मम्मी।’ जग्गू ने मम्मी को गले लगाते हुए कहा।
पर जग्गू तो जग्गू था। जग्गू उर्फ जगन अपने घर का लाड़ला बेटा था। दादा, दादी, बुआ, चाचा सबका दुलारा, बस उसकी ख्वाहिश पूरी करने के लिए उसके पास इतने लोगों का साथ था, नतीजा यह हुआ कि जग्गू को बाहर का जंक फूड, चॉकलेट्स, केक ही पसंद आते, घर का खाना और खासतौर से सब्जियां दूध तो उसे दुश्मन लगते। मम्मी की नजर बचा कर वह उन्हें इधर-उधर फेंक देता, पर जबसे उसके दांत खराब होने शुरू हुई है, सबने उसे चॉकलेट और जंक फूड दिलाना बंद कर दिया।
जब भी मम्मी उसे खाना टिफिन में देतीं, तो वह जिद करता कि उसे खाने में नूडल्स, सैंडविच चाहिए। जब भी परांठा, रोटी सब्जी उसके टिफिन में होते, तो वह सबकी नजरें बचा कर उसे स्कूल जाते वक्त कचरे के डिब्बे में फेंक देता और स्कूल के कैंटीन से चिप्स लेकर खा लेता।
एक दिन वह पार्क में अपने दादाजी के साथ गया, तो देखा कि एक नया पानीपूरी वाला आया है। उसने खने की जिद की, पर दादाजी ने साफ मना कर दिया। ‘जग्गू, जब मम्मी घर में इतनी अच्छी पानीपूरी बनाती है, तो यह बाहर की क्यों? यह अच्छी भी नहीं है। ‘दादाजी उसे समझा-बुझा कर घर तो वापस ले गए, पर उसका मन वहीं अटका रहा। जब भी वह दादाजी के साथ पार्क जाता, पानीपूरी देख कर उसके मुंह मे पानी आ जाता।
आज बुआ दादी उसके घर आई थीं। जाते वक्त उन्होंने जग्गू को रुपए दिए। जग्गू खुश था कि वह आज पानीपूरी खाएगा। शाम को वह जब दादाजी के साथ पार्क गया, तो दादाजी पास वाले ही एक बूढ़े व्यक्ति दादाजी से बात करने लगे थे। तब उसने कहा, ‘दादाजी बिट््टू मुझे बुला रहा है, मैं अभी आता हूं।’
जग्गू चुपके से पानीपूरी वाले के पास चला गया और जम कर पानीपूरी खाई।
‘अहा, क्या स्वादिष्ट पानीपूरी है! पेट भर गया, पर मन नहीं भरा।’ जग्गू पानीपूरी खाकर दादाजी के पास पार्क में चला गया। घर पहुंचे थोड़ी ही देर हुई थी कि जग्गू के पेट में जोर से दर्द होने लगा। जग्गू जल्दी से बाथरूम की तरफ भागा। बस फिर क्या था, जग्गू की हालत खराब हो गई। हर थोड़ी देर में उसे बाथरूम भागना पड़ा। वह पंद्रह बार टॉयलेट हो आया। फिर उसे चक्कर आने लगे और उस पर बेहोशी छाने लगी। फिर उसके मम्मी-पापा उसे अस्पताल ले गए।
अगले दिन जब होश आया तो वह अस्पताल के बिस्तर पर था। मम्मी उसके पास ही थीं।
‘अब सब ठीक है जग्गू, तुझे फूड प्वाइजनिंग हो गई थी। कल तो तूने हम सबको डरा दिया। अब सच सच बता, कल तूने क्या खाया?’ मम्मी ने सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
जग्गू ने रोते रोते मम्मी को सारी बात बता दी। तभी डॉक्टर अंकल भी आए। उन्होंने जग्गू को समझाते हुए कहा, ‘देखो बेटा, ये बाहर की चीजें दिखने में भले ही स्वादिष्ट लगती हैं, पर वाकई में ये बहुत नुकसान करती हैं। तुमने जो पानीपूरी खाई, उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमें केमिकल डाले गए थे और उसी का नतीजा है कि तुम आज हॉस्पिटल में हो। बाहर का खाना कभी भी घर के खाने जितना हेल्दी नहीं होता है। अगर तुम खाना चाहते हो, तो अपने मम्मी-पापा के साथ जाओ, ताकि वे तुम्हे सही जगह से तुम्हारी पसंद की चीजें खिलाएं। सड़क पर मिलने वाली सभी चीजें अच्छी नहीं होतीं।’
जग्गू ने हां में अपना सिर हिलाया और कान पकड़ लिए कि अगली बार वह जीभ के लालच में नही आएगा और अब से सिर्फ हेल्दी खाना खाएगा। जग्गू की चटोरी जीभ को सबक मिल गया था।
