विप्रम
विवार का दिन था। सुबह के दस बज रहे थे। सिद्धांत और तजिंदर अपनी-अपनी साईकिलों पर सवार टेंगु घाटी घूमने निकल पड़े थे। शहर बहुत पीछे छूट गया था। चारों ओर पेड़ ही पेड़ थे। पेड़ों के झुरमुट से सूरज की किरणें सड़क पर विभिन्न आकृतियां बना रही थीं। चिड़ियों की चैं-चैं और तोतों की टें-टें वातावरण को रोमांचित कर रही थी। कुछ कदम आगे एक मोड़ था। वहां से सड़क टेंगु घाटी की ओर जाती थी। दोनों मित्र उस ओर अपनी साईकिलें दौड़ा रहे थे। तभी सिद्धांत को लाल-पीले बेरों से लदी अनेक झाड़ियां दिखीं। जिन्हें देख सिद्धांत उछल पड़ा- वाह! क्या सुर्ख लाल-पीले बेर लटक रहे हैं। आओ, तज्जी! इन्हें तोड़ते हैं। फिर रास्ते भर खाते चलेंगे।
तजिंदर उसके पास आ गया। इधर-उधर देखते हुए उसने सामने के पेड़ों की ओर देखा। फिर पेड़ों के नीचे उसकी नजर गई। अपनी साईकिल खड़ी करते हुए बोल पड़ा- सिद्धू, अरे हां! इधर देख कटारे ही कटारे गिरे पड़े हैं। कटारे यानी कच्ची इमली। तज्जि, तू कटारे बटोर। मैं इधर बेर तोड़ रहा हूं। हां, अभी खाना मत, वरना दांत खट्टे हो जाएंगे- कहते हुए सिद्धांत ने दो बेर अपने मुंह में उछाले और फिर बेर तोड़ने में व्यस्त हो गया।
तजिंदर ने अभी कटारे रूमाल में समेटे ही थे कि पता नहीं कहां से चौदह-पंद्रह साल का एक लड़का सम्मुख खड़ा था। आंखें मिचमिचाते हुए लड़का पलट कर चिल्लाया- टेंगा! शूमा! टीरी! हुर-हुर!
तजिंदर फौरन घूमा। सिद्धांत की ओर देखा। लड़का खाकी नेकर पहने था। उसके ऊपर कुछ न था। लड़के का रंग भक्क काला चमकता हुआ। सिर के बाल बड़े-बड़े थे पर बिखरे-उलझे। अपलक उसे देखते हुए तजिंदर कुछ पीछे हटा। फिर सिद्धांत की ओर मुंह करके बोला- सिद्धू, इस पाजी को संभाल। बेवकूफ कैसे घूर रहा है? नंग धड़ंग कहीं का।
हिस्ट, स्पीक स्लोली… बट… इन… इंग्लिश- यह सिद्धांत ने तजिंदर को सतर्क करते हुए टूटी-फूटी अंग्रेजी में कहा था। तिस पर तजिंदर मन ही मन बड़बड़ाया- मैं कल ही कह रहा था, ये टेंगु घाटी आदिवासी लोगों की बस्ती है। बहुत ही खतरनाक। पागल सिद्धू अपने आगे किसी की चलने नहीं देता। अब भुगतो। थोड़ी देर में और लड़के आ जाएंगे यहां। तब क्या होगा हमारा? ये लो, यू आर.., सिद्धांत बोला था। उसने आगे जोड़ा- वाट यू आर थिंकिंग? डोंट वरी… तज्जी, यू आर… मोस्ट हिम्मत वाला। प्लीज… इसे ललकारो। आई एम विद यू फुल्ली।
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तजिंदर समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे क्या नहीं। कैसे ललकारे? कोई हथियार भी पास नहीं। अपने घर के आसपास होते तो एक आवाज पर पचासों मित्र-दोस्त परिचित दौड़े चले आते। उफ्फ! कमबख्त सिद्धू के बच्चे ने कहां फंसा दिया? अब भलाई इसी में है कि अपनी-अपनी साईकिलों को थामो और भाग चलो- मन ही मन उधेड़-बुन करता तजिंदर चिल्लाया- सिद्धू! होल्ड साईकिल एंड रन अवे यहां से। अदर वाईज वी… इन ट्रवल (साईकिल पकड़ो और यहां से भाग लो। वरना परेशानी में फंस जाएंगे।)
डोंट वरी, तज्जी! कैरी आॅन इन इंग्लिश- सिद्धांत ने हिम्मत जुटाने की मानिंद तज्जी से कहा था।
यस प्रिंसिपल! हैड टीचर! हाथ से इशारा करते हुए तजिंदर दहाड़ा। शायद उसका भीतरी मन जाग उठा था। सिद्धांत ने उकसाते हुए कहा- नो, नो, टू दा प्रिंसिपल।
हां, हां, दैट इज राईट- तजिंदर ने स्वीकृति में अपनी गर्दन हिलाई और अपनी आवाज को कड़क करते हुए चिल्लाया- यस, यस, टू दा प्रिंसिपल। आई बैग टू स्टेट दैट आई एम सफरिंग फ्रॉम द फीवर लास्ट नाइट।… थोड़ी देर वह रुका। लीव एप्लीकेशन मतलब छुट्टी का प्रार्थना पत्र भूल गया। ध्यान लड़के पर भटक गया।
हिस्ट! वाट यू आर टेलिंग, तज्जि! सी… देयर अबाउट टेन ब्वॉयज कमिंग विद छड़ी एंड डंडा- कहते हुए सिद्धांत उस लड़के की ओर बढ़ा। उसके और नजदीक जाने लगा। लड़का पहले ही सहमा हुआ था। उसने अपने कदम कुछ पीछे किए थे। फिर दूर से आते लड़कों की ओर जैसे ही देखना चाहा। तभी सिद्धांत ने उछल कर लड़के को जोर का धक्का दिया। लड़का हड़बड़ाता सड़क के बगल रेत में जा गिरा। सिद्धांत ने बिजली की सी फुर्ती दिखाते हुए फौरन लड़के के मुंह पर ढेर सारी रेत फेंक दी। लड़के को इसका पूर्व अनुमान न था। वह तिलमिलाता हाथ-पैर मारने लगा। उधर सिद्धांत ने पुकारा- तज्जि, संभाल साईकिल और भाग यहां से। अब यहां और अधिक देर रुकना खतरे से खाली नहींं होगा।
सिद्धांत और तजिंदर भागते हुए जैसे ही मेन रोड पर पहुंचे, तो उन्हें पीछे से एक ट्रक आता दिखा। उसे देख दोनों मित्रों की जान में जान आई। दोनों ने उसे रुकने का इशारा किया। सचमुच, ट्रक रुक गया। ड्राईवर शायद दयालु था और जंगल में आए दिन होने वाली घटनाओं से परिचित भी। सो, उसने दोनों को साईकिलों सहित ट्रक में बिठा लिया। अब दोनों बिल्कुल शांत थे। बल्कि मुस्करा रहे थे। तभी तजिंदर ने पूछा- यार सिद्धू! तूने बड़ी हिम्मत दिखाई।
एक लंबी सांस खींचते हुए सिद्धांत बोला- तज्जि, मैं समझ गया था, उसे इंग्लिश तो आती नहीं होगी। सो, वह हमारी अंग्रेजी में उलझ जाएगा। रही बात धक्का मारने की। यार यह तो पता नहीं मुझमें कहां से इतनी हिम्मत आ गई थी। मैं खुद आश्चर्यचकित हूं। हां, मैं यह जरूर समझ गया था कि उसमें इतनी हिम्मत होती तो वह हमें अकेला ललकारता। अपने दोस्त-साथियों को नहीं पुकारता। ऐसे में भागने से पहले उसे जमीन पर गिराना बहुत जरूरी था। फिर कहते हैं, लड़ाई हो या कोई खेल। जिसने पहल की वही अव्वल रहता है।
सच्च! सिद्धू, तूने तो कमाल कर दिया। हम अपने दोस्तों को अब बता सकेंगे कि कैसे जंगली आदिवासी लड़के को हमनें बुद्धू बनाया था अंग्रेजी में। तिस पर सिद्धू हंसने लगा था।

