सोनी पांडेय

हम बेटियों के हिस्से चाह कर भी मन की शिक्षा नहीं रही। इंटर में ही मेरी शादी कर आजी ने गंगा नहाया। आजी तो पिता की जंघा पवित्र करना चाहती थीं मेरा बाल विवाह करा कर, पर शुक्र है कि पिता के लाख अत्याचार को सह कर मां अड़ गई कि बिना जवान हुए लड़की नहीं ब्याही जाएगी। साल भर आजी मां से मुंह फुलाए बैठी रहीं। बात-बात पर अपमान सहती मां ने पढ़ना-लिखना भाइयों से चिट्ठी-पतरी भर ही सीख पाया था, पर घर के काम निबटा कर चुपके से अखबार लेकर बैठ जातीं पढ़ने और हमें भी पढ़ने को कहतीं।

उसे याद आ रहा था रह-रह कर मां का चलते रहना, सुबह से देर रात तक पूरे घर में। साढ़े चार फीट ऊंची, सुडौल देह-धज वाली मां का गोरा-चिट्टा चेहरा देख आजी मुंह बिचका कर कहतीं- ‘एगो रंगवे भर त है ना त खेद देले रहतीं नइहर।’आजी और मां में पूरे जीवन कभी पटरी नहीं बैठी। लंबी-चौड़ी आजी में मां जैसी दो स्त्रियां समा जाएं, ऐसी थी आजी और अपार धैर्य सीने में सहेजे खटती-पिटती मां। उसे याद आ रहा है…
आंगन में लल्लू ने दाना छींट दिया है… पूरे आंगन में चने का दाना डगर-मगर लुढ़क रहा है…
अरे राम हो राम! इ अन्न क दुरगति देखा। कहां हो बाबा जी बो!….

धबड़-धबड़ लल्लू की पिटाई और हुआं हुआं के तीव्र स्वर के साथ उसका रुदन। पिताजी का दुवार से आंगन में प्रवेश और भंडारे में कुछ फटकती-पछोरती मां। आजी का एक मन उलाहना और तमतमाते हुए पिता का मां पर हाथ-लात चलाना, पूरे घर में सिसकती मां की हिचकियां। मां के साथ-साथ उसका भी रोना और अंत में मां की छाती से सट कर हचक-हचक रोना, फिर बैल की तरह काम में जुट जाना। पिता को शिकायत रही जीवन भर कि बौनी लड़की से शादी हो गई। दादी का दुख कि जो लड़कियां जनी तो बौनी न हो जाएं। इन तमाम दुखों के बीच मां ने चार संतानों में एक भी बौनी औलाद नहीं जना। सब हट्टे-कट्टे छह फुटे। उसका श्रेय भी आजी को ही जाता कि उसने बड़े देवता-पित्तर पूजे थे। बस हिचकोले खाते किसी गढ्ढे से निकलती है, तो उसकी तंद्रा टूटती है। आंंखों से अविरल धार बह रही है। आंचल से पोंछ कर खिड़की से बाहर देखती है। मौसम आज कुछ ठंडा है… आसमान में बादल घिर रहे हैं। स्मृतियों के कपाट रह-रह कर खुल रहे हैं।

हे गोपालगंज वाली! देखो त छत पर रहर भीग रहा है। ई डुमरांव नरेश की बेटी तान कर सोई हैंं का? आजी दुवार से चिल्लाते घर में घुसती हैं। छोटी बहन को चारपाई पर रोता छोड़ मां छत पर भागती है। उठाते-उठाते पानी की धार और रहर का भीगना। पिता का छत पर आना और फिर वही लात-हाथ। अभी तीन महीने ही तो हुए थे उसे बेटी जने। आजी छाती कूट-कूट कर चौखट पर बैठ रोई थीं। बेचारी छोटी को जीते जी आजी ने कभी गोद में नहीं लिया। कितना तो भरा है हलाहल, आकंठ हलाहल। वह जार-जार रोती है चलती बस में। बगल में बैठी बूढ़ी औरत सांत्वना देती है। यही दुनिया की रीत है बेटी!… जो आया है सबको एक दिन नौ मन चइली पर ही राख होना है, पर माया जो न कराये। वह थोड़ी संयत होती है। सोचती है, कैसे जान लिया इस औरत ने बिना कहे कि मैं मृत्यु के शोक में हूं। कितना अजीब है न औरतों का एक-दूसरे का दुख समझ लेने की अनुभूति। पिता की नफरत और आजी के उलाहनों के दो पाटों में मां आजीवन पिसती चली गई, पीछे छूट गया भरा-पूरा परिवार। वह सोचती है। क्या मां के बाद भी उन्हें वैसे ही तीज-खिचड़ी, सावन, आद्रा में याद किया जाएगा? मन में एक हूक उठती है… हूं! जिस पिता ने कभी सिर पर स्नेह से हाथ नहीं रखा, उससे क्या उम्मीदें। भाई पहले ही साड़ी-कपड़े के नाम पर बहनों को लालची और अचार-चटनी देते देख चटोरी घोषित कर अपमानित करते रहे, अब तो यह स्नेह भी खत्म। उस आंगन से जहां पली-बढ़ी। उसका दिल तरह-तरह की कल्पनाओं में उफन रहा था।

बारिश छूट गई है, बस के यात्री खिड़की का शीशा बंद कर रहे हैं। बीच-बीच में कंडेक्टर यात्रियों को उनके स्टापेज पर उतार रहा है। दर्द का रास्ता और विरह की रात कटती ही नहीं है। रास्ता जैसे पहाड़-सा होता जा रहा है। मन में खीझ उठती है… ई बस है कि बैलगाड़ी, हर पांच मिनट में रोकता, चढ़ाता-उतारता चल रहा है। दृदय दर्द से फटा जा रहा है… इस सावन को भी आज ही इतना बरसना था? इस साल आधा सावन सूखा रहा और आज न जाने कहां से इतने बादल उमड़ आए थे आकाश के सीने पर और हहर-भहर बरस रहे थे। सोचती है- सावन से मां को बहुत प्रेम था,चूड़िहारिन से भर-भर हाथ हरी चूड़ियां पहनती थी मां। कूटते-पीसते, मांजते-धोते सावन के गीत गुनगुनाती, गाती- कजरी केही संग खेलूं मोरी सखियां… पिया मोरे गए विदेसवा ना…

कितना प्रेम था इस सावन से मां को! अरुई के पत्ते का रीकवच, महुवे का लाटा, पुआ और अदउरी कोहड़े की सब्जी खूब मन से बना गरम-गरम पूड़ियों संग भर-भर पेट खिलाती। जांत में चने का बेसन पीसती, ओखल में दाल छांटती, मधुर कंठ से कजरी गाती। हरी सूती साड़ी पर पीले सरसों के फूल की छाप-सी, तो कभी कोहबर में हल्दी,गेरू, चंदन की गंध-सी मोहक मां। वह फिर से फूट-फूट कर रोती है। यात्री सांत्वना देते हैं… कंडेक्टर अब यात्रियों से जल्दी उतरने-चढ़ने को कहने लगा है। समझ रहा है कि अब मुझसे यात्रा असहनीय हो चली है। बस की रफ्तार भी कुछ पहले से तेज हुई है। कुछ पहचाने हाट-बाजार दिखने लगे हैं।

गांव भी दीखने लगा है… कलेजा धौंकनी की तरह धड़क रहा है। दर्द के ताप से झुलसती वह तड़प उठती है। वह कैसे देखेगी मां का मृत चेहरा। आज पहली बार मां उसकी नजर उतारते हुए धार नहीं देगी। उसके चेहरे को देख कर दुबले होने का उलाहना नहीं होगा… आह! कैसे वह सहेगी यह वेदना। सोचती है और छाती को कस कर मींजती है। कंडक्टर आवाज देता है- महुवारी आ गया, चलो उतरो… चलो उतरो…।

वह साहस बटोर कर अपना छोटा-सा बैग पकड़ बस की भीड़ को धक्का देते जैसे-तैसे उतरती है। गांव अभी भी एक कोस दूर है। वह पगडंडियों का शॉर्टकट रास्ता पकड़ तेजी से आगे बढ़ती है। कुछ दूर आगे बढ़ते ही बस्तियां दीखने लगती हैं।… लाठी टेके बूढ़ी मंगइ बो धीरे-धीरे चली जा रही हैं। उसे देख कर ठिठकती हैं… आंचल मुंह में ठूस लेती हैं… वह उन्हें पकड़ कर खूब रोती है। गांव की पहली स्त्री की छाती से सटी वह ऐसे बिलख उठती है जैसे पहली विदाई में मां से। मंगइ बो समझा-बुझा कर ले चलती हैं टोले की ओर। उसे याद आता है- मंगइ बो की दावेदारी पूरे टोले के बच्चों पर है। सबका नार इन्होंने ही काटा है। इन दिनों नई बहुएं शहर जा रही हैं। हर किसी का पेट काट बच्चा पैदा होते देख वह बहुत दुखी रहने लगीं हैं। हम चार भाई-बहनों के सात बच्चे और भरी-पूरी मां की कोख की अक्सर बलाएं उतारने वाली गांव की जाय मां मंगइ बो मेरा हाथ थामें चली आ रही हंै दुवार पर, पीछे औरतों का हुजूम। सामने दरवाजे पर चद्दर से ढ़की मां की मृत देह। पास में विलाप करती छोटी बहन। मुझे देखते ही भाइयों की आवाज आती है- अब जल्दी से नहलाओ-धुलाओ सब! देर हो रही है।

सब मेरे इंतजार में थे! मैंने कांपते हाथों से मुंह से चद्दर हटाया। भर मांग पीला सिंदूर, लाल बिंदी… हरी साड़ी और कलाइयों में आज भी हरी-भरी चूड़ियां। चेहरे पर हल्की मुस्कान संग चीर निद्रा में सोई मां के गालों को छोटी थपथपा कर जगाना चाहती है। छोटी सबसे छोटी मां की संतान… चालीस की उम्र में एक और बेटे की चाहत में पैदा हुई अनचाही संतान। अभी पिछले साल ही इसकी शादी की थी मां ने। कितनी खुश थी कि अब बेटियां ब्याह गर्इं, सावन में गंगा नहाएगी। पता नहीं यह भी उसका सपना पूरा हुआ या नहीं। रोतीं-बिलखतीं बेटियों के कान में पिता की रोबदार आवाज पड़ी- अच्छा अब बस करो तुम लोग, जो होना था हो चुका… अम्मा की विदाई की तैयारी कराओ मिल कर। विदा- शब्दकोश का सबसे कू्रर शब्द तीर-सा चुभता है कलेजे में। मां की यह अंतिम विदाई पिता के लिए कितनी सहज प्रक्रिया है, देख रही हूं। वह सबसे बोल-बतिया रहे हैं, बिना किसी शोक के। जैसे मां का जाना उनके जीवन से कोई कमी नहीं होगा। वह सिर पकड़ लेती है…उफ्फ! अगर मां की जगह आज यहां पिता की लाश होती तो क्या मां भी इतनी ही सहज होती? नहीं! उसकी तो दुनिया ही उजड़ जाती।…

बुआ लोग समझा-बुझा हमें वहां ले गर्इं जहां मां को भावजें नहला रहींं थीं। बड़ी भाभी कैंची से देह के कपड़े काट, गहने उतार रही थी। भावजों ने मां को नहला-धुला कर तैयार कर दिया। हमें इस काम से बड़की अम्मा ने दूर रखा यह कहते हुए कि यह बहुओं का काम है, बेटियों के छुए मुक्ति बिगड़ जाएगी। लाल चुनरी में मां को खूब अच्छे से उन बहुओं ने आज सजाया था, जो जीते जी पानी देने के लिए भी एक-दूसरे का मुंह देखती थीं। पिता ने पंडित के कहने पर मांग में पीला सिंदूर भरा और पिंडा पार अरथी उठी। छोटी दौड़ कर अरथी से लिपट गई, बड़े भाई ने उसे बड़ी मुश्किल से अलग किया। सभी रो पड़े… मां की पेटपोछनी औलाद।

हम बेटियों के हिस्से चाह कर भी मन की शिक्षा नहीं रही। इंटर में ही मेरी शादी कर आजी ने गंगा नहाया। आजी तो पिता की जंघा पवित्र करना चाहती थीं मेरा बाल विवाह करा कर, पर शुक्र है कि पिता के लाख अत्याचार को सह कर मां अड़ गई कि बिना जवान हुए लड़की नहीं ब्याही जाएगी। साल भर आजी मां से मुंह फुलाए बैठी रहीं। बात-बात पर अपमान सहती मां ने पढ़ना-लिखना भाइयों से चिट्ठी-पतरी भर ही सीख पाया था, पर घर के काम निबटा कर चुपके से अखबार लेकर बैठ जातीं पढ़ने और हमें भी पढ़ने को कहतीं। सोचती हूं कि मां को बागी बनाने वाला अखबार ही था। यह अखबार ही था जिसने हमारे जीवन में उजास भरा, वरना मां का मौन हमें वहीं पटकता जहां मां का जीवन था और इस तरह जाना कि शिक्षा की लौ स्त्री मुक्ति के लिए सबसे जरूरी तत्व है।

मां की अरथी उठने के साथ ही दरवाजे से भीड़ छंट गई। टोले के पुरुष दाह-संस्कार के लिए गंगा जी चले गए, औरतें नहाने-धोने चली गर्इं। दोनों भावजें बेटियों की मदद से घर-आंगन धोने-पोतने में लग गर्इं।… छोटी नहा चुकी थी। अपने बच्चों को रसोई का बचा खाना जल्दी-जल्दी खिलाने लगी, तो बड़ी भड़क उठी- अरे! घर में अउर लइका छेहर हैं, तनी उनका भी खयाल रहे, अब चूल्हा में आग कल सांझ से पहले नहीं जलेगा।
छोटी झनकते हुए अपनी कोठरी में चली गई। बड़ी दो मिनट सुन्न रही, नल चलाती तेरह साल की बड़ी भतीजी अचानक जोर-जोर से रोने लगी। मैं हिम्मत कर आंगन में पहुंची। मुझे देख भाभी भी विलाप करने लगी। एक अज्ञात भय ने हम सब को घेर लिया। मैं अंदर ही अंदर डर से कांपने लगी… तो क्या मां की अरथी के साथ ही घर की एकता भी चली गई? बड़ी भाभी को बड़ी मुश्किल से मैं संभाल पाई आज… बड़की बीबी! अम्मा को दिया वचन कैसे पूरा करूं? अब आप ही लोग बताइए। इ महरानी तो हमेशा बात बिगाड़ने में लगी रहती हैं। किसी की जायज-नाजायज एक भी बात बर्दाश्त नहीं। आखिर हम भी कितना सहें? बड़ी भाभी ने सिसकते हुए हम दोनों बहनों से कहा।

आप बड़ी हैं भाभी, छोटी तेज तो है ही। इसमें किसी को शक नहीं, लेकिन संभालना तो अब आपको ही घर पड़ेगा। दुनिया क्या कहेगी कि रामायन बाबा के लड़के साल भर भी मां का मृत्यु शोक न मना सके। बड़ी भाभी का हाथ अपने हाथ में ले खुद से बारह साल बड़ी भाभी को मैंने सजल आंखों से देखा… वह लिपट गर्इं। मैं कहे जा रही थी- अब तो आप ही मां भी हैं हमारी… हम कहां जाएंगे? मेरी बात सुनते छोटी बहन और दोनों भतीजियां भी भाभी से लिपट गर्इं। हम सब पर उस चालीस साल की स्त्री ने उस दिन आंचल डाल सांत्वना दिया कि कुछ भी हो, वह घर नहीं टूटने देगी।

छोटी बहन निढाल निखहरी खटिया पर पड़ी थी। रोते-रोते थकी अपने तीन माह के शिशु को छाती से चिपकाए। बड़ी भाभी ने छोटी से कहा- एक गिलास दूध छोटकी बबुनी को पिला दो, लड़का पिलाना है। बीमार पड़ गई, तो बच्चे को दिक्कत होगी और हां, बचा दूध लड़कियों को पिला दो। दूध घंट से पहले मरद-मानुस और हम लोग नहीं पी सकते। छोटी उठ कर चली गई। बड़ी मुश्किल से छोटी बहन आधा गिलास दूध पी पाई थी। धीरे-धीरे रात घिरने लगी। चारों तरफ सन्नाटा। बादल आसमान में जमे थे,गनीमत थी कि बरखा नहीं हो रही थी। दोनों बुआ लोग दुवार पर बैठी टकटकी लगाए आसमान को देख ईश्वर से गुहार लगा रही थीं कि जब तक लाश न जल जाए बरखा न हो। घर में क्या, पूरे टोले में निरवता इस कदर आज बसी थी कि कुत्ते-बिल्ली की आवाज पर सिहरन उठ जाती। रात के नौ बजे अचानक बिजली की कड़क के साथ बारिश छूटी तो सबके कलेजे जोरों से धड़कने लगे। हम सब अब ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि सभी मर्द सकुशल घर लौट आएं। इधर बरखा पूरे वेग में थी और बड़की फुआ का अलाप भी… मउअत में बरखा का करा दे केहू ना जाने धिया। दउवो के आजे बरखे के रहल है।

हम सब चिंता से घिरे अब दुवार के बरामदे में आ बैठे। आज बिजली भी नहीं आई। इन दिनों रात को बिजली आती थी। गांवों में बिजली एक हफ्ते रात को तो एक हफ्ते दिन में आती थी। रात बारह बजे दाह से लोग लौटे। बड़की भाभी ने तगाड़ में गोंइठी सुलगा पत्थर और लोहा रखा। कटोरी में काली मिर्च। सबने हाथ-पैर धोकर आग, पत्थर, लोहा छुआ और काली मिर्च मुंह में डाल घर में घुसे। पिता की चारपाई बरामदे में अलग बिछी। वह एक कंबल और मारकीन की चादर संग अब बारह दिन अलग रहने वाले थे। घर में दिन भर के उपासे, थके-मादे लोग जहां-तहां निढाल पड़ गए। रात बीती और अगली सुबह बिना मां के चेहरे के घर में हुई… पिता संग भाई दयाद नहाने और घंट बांधने चले गए। इधर बड़ी भाभी संग कुटुंब की स्त्रियांं इनार पर नहाने चली गर्इं। हम बेटियां मां के शोक की इन क्रियाओं से वंचित चुपचाप सब देखती रहीं। बड़की माई ने हमारे उदास चेहरे को देख कर कहा- काहें मुंह गिराए बैठी हो बड़की बबुनी! अरे! बेटियों का खाना और पतोहों का नहाना मिरतक को मिलता है। जाकर तनी नमकीन, बिस्कुट मुंह में लगा लेती लोग। अब हम सबको तो संझा तक भात मिलेगा।

बड़ी भतीजी को भेज उन्होंने नमकीन, बिस्कुट मंगाया, हम बड़ी मुश्किल से एक चम्मच खा पाए। पेट मरोड़ रहा था। शरीर अन्न मांग रहा था, लेकिन आत्मा थी कि कुछ स्वीकार ही नहीं करती थी। मुंह में कुछ डालते उबकाई आने लगती थी। अजीब स्थिति थी शरीर और मन की। दिन भर हीत-नातों का तांता लगा रहा। दोपहर तीन बजे दुवार पर चूल्हा जुड़ा और आम की चइली (लकड़ी) जला बड़े से पतीले में पानी चूल्हे पर चढ़ा दिया गया, अदहन खौलने लगा। हम दोनों बहनें मां की कोठरी में उसके पलंग पर निखहरे पड़े हुए थे। बाहर से खौलते पानी में चावल के डालते भात की मीठी सुगंध नथुनों में भरने लगी। याद आने लगा कि नयका भात माड़ संग मां हम सबकी थाली में गरम-गरम परोसती और आजी की नजर बचा भाइयों संग हमें भी देसी घी एक-एक चम्मच देती। देसी घी संग माड़-भात की गंध मां की स्मृति संग आंखें के रास्ते बह निकली। हम दोनों ने बिना आवाज मुंह से निकाले मन भर रोया और थक कर चुप भी खुद ही हो गर्इं। आंगन में पिता संग पुरुषों की पंगत बैठी और दूध-भात गिरा रस्म पूरी की। पुरुषों के बाद स्त्रियां बैठीं और लड़कियों से कहा गया कि वे खुद ही लेकर खा लें। भतीजियां थाली में बिना हल्दी की दाल, भात और उबले आलू का चोखा लाकर हमें भी दे गर्इं। भात ठंडा हो गया था। मां होती तो ठंडा भात कभी हमारे हिस्से नहीं आता।