मोनिका शर्मा

आज की आपाधापी में जिंदगी एक अंतहीन दौड़ बन कर रह गई है। मगर यह भागमभाग बेहद चिंताजनक हो जाती है, जब सेहत बिगड़ने और रिश्तों के छूटने की स्थितियां बनने लगें। न आपसी संवाद का समय बचे और न ही जुटाई जा रही सुविधाओं को पल भर ठहर कर जीने का वक्त मिले। हाल ही में देश के तेरह शहरों में कराए गए एक सर्वे में 68.2 फीसद लोगों ने माना कि वे अपनी शर्तों पर जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं। न अपने परिवार को समय दे पाते हैं, न अपने बच्चों को। चंडीगढ़, मुंबई, जयपुर, कोयंबतूर, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, दिल्ली और बंगलूरू जैसे शहरों में किए गए इस ताजा अध्ययन में सामने आया है कि पड़ोसी देश चीन के बाद अब भारत में भी 996 वर्क कल्चर तेजी से अपने पांव पसार रहा है, जिसके चलते जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो गया है। गौरतलब है कि 996 वर्क कल्चर में सप्ताह के छह दिन बारह घंटे काम करना पड़ता है। चीन की बड़ी तकनीकी कंपनियों और स्टार्टअप्स में यह कार्य संस्कृति आम बात है। भारत में भी अब यही कार्य संस्कृति देखने को मिल रही है, जिसने जीवन से समय का संतुलन छीन लिया है। इस सर्वे में चौंतीस फीसद भारतीय पेशेवरों ने कहा है कि वे अपने बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं। कामकाजी व्यस्तता के चलते वे परिवार, दोस्तों और अपने शौक पूरा करने के लिए वक्त नहीं निकाल पाते।

यह कामकाजी संस्कृति पूरे सामजिक-पारिवारिक ढांचे को प्रभावित कर रही है। हालिया बरसों में हमारे यहां न केवल तलाक के मामले बढ़े हैं, बल्कि अभिभावकों और बच्चों में भी दूरियां आ रही हैं। यहां तक कि घर के बड़े-बुजुर्ग भी अकेलेपन और अवसाद का शिकार हो रहे हैं। निस्संदेह इन स्थितियों की एक अहम वजह आपसी संवाद का रीत जाना है। मौजूदा समय में हर आयु वर्ग के लोग इस आपाधापी के खमियाजा भुगत रहे हैं। कामकाजी अभिभावक बच्चों के साथ समय ही नहीं बिता पा रहे, तो नई पीढ़ी को मार्गदर्शन देने और मनोबल बढ़ाने की बातें ही बेमानी हैं। बच्चे स्मार्ट गैजेट्स के साथ वक्त बिता रहे हैं और बड़े कामकाज के डेडलाइंस पर खरा उतरने के लिए जूझ रहे हैं।

आजकल बड़े शहरों में ज्यादातर पति-पत्नी दोनों ही नौकरीशुदा हैं। ऐसे परिवारों में शादी के रिश्ते में भी कई उलझनें देखने को मिल रही हैं। कामकाजी व्यस्तता ने जाने-अनजाने वैवाहिक संबंधों में भी दूरियां और शिकायतें बढ़ा दी हैं। अपनेपन का भाव और लगाव कम कर दिया है। यानी समय की कमी और कामकाज का बोझ रिश्तों में दरारें लाने से लेकर सेहत बिगाड़ने तक के काम कर रहा है। इस अध्ययन में भी चौंसठ फीसद पेशेवरों ने माना है कि वे परिवार को पूरा वक्त नहीं दे पाते हैं। अठाईस फीसद कामकाजी लोगों ने बताया कि वे अपनी पत्नी को ज्यादा समय नहीं दे पा रहे। वहीं 21.2 फीसद पेशेवरों का कहना है कि काम की भागदौड़ में दोस्तों से मिलने का समय नहीं बचता है। 16.2 फीसद लोगों का कहना है कि वे अपने माता-पिता को ज्यादा वक्त नहीं दे पाते हैं।

कॉरपोरेट क्षेत्र को सेहतमंद बनाने के उद्देश्य से हुए कई अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि अपने काम में बहुत अधिक व्यस्त रहने की वजह से करीब सत्तर प्रतिशत पेशेवर लोग अपनी शारीरिक या मानसिक अस्वस्थता को नजरंदाज कर डॉक्टर के पास जाने की जरूरत को भी टालते रहते हैं। प्रतियोगी हो चले आज के जीवन में यह भागदौड़ नकारात्मक असर डाल रही है। यही वजह है कि चीन के युवाओं ने कई बड़े मंचों पर इस कार्य संस्कृति को लेकर शिकायत भी जताई है। 996 वर्क कल्चर की वहां आलोचना हो रही है। गौरतलब है कि चीन में ऐसी करीब 139 कंपनियां हैं, जिनमें नौकरीशुदा लोगों को कार्य संस्कृति के इस फॉर्मूले का अनुसरण करना पड़ता है।

दरअसल, तकनीक के आने से कामकाज सहज तो हुआ है, पर काम करने का समय भी बढ़ा है। तकनीकी सुविधाओं से अब काम हरदम साथ चलता है। पहले घर और दफ्तर का समय बंटा हुआ था। अब हर समय आॅनलाइन रहना और अपने कामकाज को निपटाना, जरूरी और मजबूरी दोनों बन गया है। गौरतलब है कि 996 वर्क कल्चर के तहत काम में जुटे अधिकतर लोग युवा हैं। यह व्यस्तता उनके स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा असर डाल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कामकाजी समय सारणी से न केवल इंसान की सेहत बिगड़ती है, बल्कि एक समय के बाद व्यक्ति की काम करने की क्षमता भी कम होने लगती है। इतना ही नहीं, इस कामकाजी दबाव से व्यक्ति की एकाग्रता भी घटती है। लगातार चलने वाली कामकाजी गतिविधियों से यादाश्त काम होने लगती है। गौरतलब है कि भारत में भी बड़ी संख्या में लोग कामकाज की व्यस्तता से जुड़े तनाव की चपेट में आ रहे हैं। विशेषकर कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम का दबाव बहुत ज्यादा है। कुछ समय पहले हुए मणिपालसिग्ना के एक अध्ययन के मुताबिक हमारे यहां बयासी फीसद लोग काम, सेहत और रुपए-पैसे से जुड़े मामलों को लेकर तनाव में रहते हैं। खासकर पैंतीस से उनचास साल की उम्र वाले नवासी फीसद भारतीय तनाव का शिकार बन रहे हैं। उनके तनावग्रस्त रहने के प्रमुख कारणों में दफ्तर में बढ़ते काम, परिवार की सेहत, निजी स्वास्थ्य, कामकाजी प्रदर्शन में गिरावट, नियमित रूप से सिरदर्द और थकान खास वजहों के तौर पर सामने आए हैं। कॉर्पोरेट कर्मचारियों में नींद की कमी, आक्रामक व्यवहार और सहज अपनेपन की कमी अब आम बात हो गई है।

एसोचैम हेल्थकेयर समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉरपोरेट जगत में कर्मचारियों को दिए गए लक्ष्य इतने ऊंचे रहते हैं कि करीब उनसठ फीसद कर्मचारी छह घंटे से भी कम नींद लेते हैं। काम का तनाव कर्मचारियों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और अवसाद जैसी परेशानियां बढ़ा रहा है। इतना ही नहीं, इस अति-व्यस्त कार्यशैली के कारण लोग अपने सामाजिक-पारिवारिक परिवेश से भी कट रहे हैं। आपसी संवाद की कमी के चलते अकेलेपन और आक्रामकता का व्यवहार भी अब देश की श्रमशक्ति के बड़े वर्ग को घेर रहा है।

स्वस्थ, सधी और सकारात्मक जीवनशैली के लिए काम और आराम में संतुलन जरूरी है। इंसान का दिमाग हो या शरीर, सही देखभाल के बिना लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता। चिंताजनक है कि हमारे यहां कामकाज के दबाव के चलते काफी लोगों की जीवनचर्या असंतुलित बनी हुई है। पैंतीस से उनचास साल की उम्र वाले जो लोग तनाव का शिकार बने हुए हैं, वे हमारे देश के कार्यबल का अहम हिस्सा हैं। गौरतलब है कि बीते कुछ बरसों में हमारे देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। भारत जैसे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे वाले देश में महिलाओं के कामकाजी समूह पर दफ्तर के साथ ही घर की जिम्मेदारियों के निर्वहन का भी दबाव रहता है। यही वजह है कि तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं आधी आबादी के कामकाजी वर्ग को भी घेर रही हैं।

एसोचैम के सर्वे के अनुसार अठहत्तर फीसद कामकाजी महिलाएं जीवनशैली से जुड़े किसी न किसी विकार की शिकार हैं। ऐसे में स्त्री हों या पुरुष, देश के कामकाजी तबके की शारीरिक-मानसिक सेहत का बिगड़ना हमारी सामाजिक-पारिवरिक और आर्थिक स्थितियों को गहराई से प्रभावित करने वाली बात है। जरूरी है कि हर क्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए काम और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाए रखने के हालात बनाए जाएं। ताकि हर वक्त काम में लगे रहने की जद्दोजहद देश की श्रमशक्ति के मन-जीवन को बीमार न बना दे।