श्रीभगवान सिंह

उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसी विचारक हिपोलाइत तेन ने साहित्य-सृजन के संदर्भ में ‘नस्ल’ परिवेश और समय के प्रभाव का प्रतिपादन करके साहित्य की समाज-काल सापेक्षता के महत्त्व को रेखांकित किया, जो परवर्ती काल में साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन का आधार बना। पर देखा जाए तो यह अवधारणा साहित्य के बाह्य प्रभाव पर अधिक बल देती प्रतीत होती है। जिसे हम ‘अंतरात्मा’ कहते हैं, उसे तो बाह्य प्रभाव से आगे बढ़ कर ही समझा जा सकता है। चित्त और मानस अंतरात्मा से संबद्ध है, इस लिहाज से साहित्य मनुष्य के अंत:करण या आभ्यंतरीकरण से अधिक संबद्ध होता है। चित्त और मानस से संयुक्त भारत की अंतरात्मा कुछ दूसरे ढंग की रही है- अधिक समावेशी रही है।

गांधीवादी चिंतक धर्मपाल साहित्य-विषेषज्ञ तो नहीं थे, फिर भी इस संबंध में उनका यह कथन गौरतलब है- ‘भारतीय सभ्यता का जो पुराना साहित्य है, उसे भी भारतीय चित्त और काल की एक अभिव्यक्ति के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उस साहित्य में शायद भारतीयता की, सहज भारतीय चित्त और काल की बहुत विषद झलक मिल जाए। यह सही है कि भारतीय साहित्य में जो है, वह सब का सब सीधे चित्त और काल के स्वरूप से संबंधित नहीं होगा। इस विशाल साहित्य में अनेक विषयों पर अनेक प्रकार की बातें हैं। पर वे सब बातें भारतीय चित्त और काल के सहज धरातल से, संसार की भारतीय समझ के अनुरूप और भारतीय मुहावरे में ही की गई होंगी। फिर जो बातें इस साहित्य में बहुत मौलिक दिखाई देती हैं, जो सारे कथ्य का आधार-सा लगती हैं और जो विभिन्न प्रकार के साहित्य में बार-बार दोहराई जाती हैं, वे बातें तो शायद भारतीय चित्त और काल की सहज वृत्तियों की परिचायक ही होंगी।’

जाहिर है कि भारत के विशाल साहित्य में ‘अनेक विषयों पर अनेक प्रकार की बातें हैं’ पर यहां के विभिन्न प्रकार के साहित्य में वे बातें बार-बार दोहराई जाती रही हैं, जिसे भारतीय चित्त और काल की सहज वृत्तियों की उपज ही माना जा सकता है। वस्तुत: भारतीय चित्त और मानस की जो सहज प्रवृत्तियां रही हैं वे हैं समन्वयात्मकता की प्रक्रिया से गुजरते हुए आत्मसातीकारण की। अंग्रेजी समीक्षक आईए रिचर्डस के शब्द उधार लें, तो कहा जा सकता है कि भारतीय चित्त ‘अंतर्वेशी काव्य’ की तरह ही समावेशी-प्रवृत्ति का रहा है और यही यहां के दीर्घकालीन साहित्य-सृजन में अभिव्यक्ति पाता रहा है।

इतिहास सम्मत तथ्यों के आलोक में सिद्ध है कि भारतवर्ष के हजारों वर्षों के इतिहास में कितनी जातियां, समुदाय या नस्लें यहां आती रहीं और कालांतर में घुल-मिल कर एक-सी हो गई। यही कारण है कि आर्य, द्रविड़ या अनार्य, शक, हूण जैसी नस्लों की बात करने वाले भी आज ठीक-ठीक यह नहीं पहचान कर सकते कि कौन आर्य है कौन द्रविड़, कौन शक है कौन हूण? सभी ने साथ रहते हुए खूनी संघर्ष भी किए, लेकिन इसके साथ-साथ उनके बीच जीवन-शैलियों, उपासना, पूजा-विधियों का भी इतना आदान-प्रदान होता रहा कि वे विभिन्नता के बावजूद एक चित्त का अंग बन गई। शिव किसी समय, जैसा कि कहा जाता है, द्रविडों के देवता हुआ करते थे, लेकिन वे आर्यों के भी उतने ही पूज्य देवता ही नहीं, देवाधिदेव महादेव के रूप में समादृत हो गए। जो हिंदू राम-कृष्ण की पूजा करते हैं, हरे राम, हरे कृष्ण जपते हैं, वे ही शिवलिंग पर जल भी ढारते हैं, हर-हर महादेव का मंत्रोचार करते हैं। एक ही परिवार में पिता का नाम शिवप्रसाद होता है, तो पुत्र का नाम रामप्रसाद, एक भाई का नाम शिवशंकर होता है, तो दूसरे-तीसरे भाइयों के नाम रामचंद्र, भरत या लक्ष्मण, एक बहन का नाम पार्वती होता है, तो दूसरी बहन का नाम सीता या जानकी। इसी तरह आर्येतर समझी जाने वाली जाति नागवंशियों की नागपूजा को आर्य-पूजा पद्धति में भी स्थान मिल गया, जिसका प्रमाण है प्रतिवर्ष सावन महीने में हिंदुओं द्वारा ‘नागपंचमी’ का त्योहार मनाना।

विभिन्न जातियों, समुदायों के बीच परस्पर आदान-प्रदान के उदाहरणों से यहां का साहित्य भरा पड़ा है, जिनकी अभिव्यक्ति ‘रामायण’, ‘महाभारत’ जैसे हमारे प्राचीन काव्यग्रंथों में यथेष्ट मात्रा में मिलती है। ‘महाभारत’ में ही चंद्रवंशी पांडव पुत्र भीमसेन के असुर कन्या हिडिंबा से विवाह का प्रसंग है, तो दूसरे पांडव पुत्र अर्जुन के नाग कन्या उलूपी से विवाह का प्रसंग है। एक तरफ एक पतिव्रता होने के कारण सावित्री, सीता जैसी स्त्रियों का गौरव-गान है, तो दूसरी तरफ एक पतिव्रत की सीमा के पार जाने वाली कुंती, द्रौपदी, अहिल्या, तारा, मंदोदरी जैसी स्त्रियों को ‘प्रात: स्मरणीय कन्याओं’ के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। यह ऐसा इसलिए हो सका कि जिसे भारतीय चित्त और मानस कहते हैं, वह अत्यंत समावेशी प्रकृति का रहा है। भारत एक देश के साथ-साथ एक ऐसा लोक भी रहा है, जो विभिन्न चित्त वृत्तियों के बीच सामंजस्य जन्य अंतरात्मा का पालना रहा है। भरत मुनि के शब्दों में कहें तो इसी ‘लोकवृत’ (लोकचित्त) का अनुकरण यहां के साहित्य में होता रहा है। इसे देखते हुए रवींद्रनाथ ने उचित ही कहा कि ‘हेथाय आर्य हेथाय अनार्य हेथाय द्रविड़, चीन, शक-हूण दल, पठान-मोगल एक देहे होलो लीन।’
वस्तुत: जो ‘लोकचित्त’ या ‘लोकवृत्त’ भारतीय साहित्य को आकार देता रहा है वह ‘रेस मिल्यू तथा मोमेंट’ से आगे की चीज है, क्योंकि ये तीनों समय-प्रवाह में जहां परिवर्तित होते रहते हैं, वहां विभिन्न प्रवृत्तियों के आत्मसातीकरण से निर्मित चित्त और मानस स्थायित्व प्राप्त कर लेते हैं और वे ऐतिहासिक तथ्यों तथा साक्ष्यों के मोहताज न रह कर जन-जन के कंठहार बन जाते हैं। राम, कृष्ण, शिव के जन्म, विवाह आदि के संबंध में भले ही ऐतिहासिक तथ्य चूक जाते हों, लेकिन उनसे जुड़ी जन्म, विवाह की लीलाएं ही लोक में प्रचलित हैं, जबकि अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर जैसे महान सम्राटों के ऐतिहासिक प्रमाण होने के बावजूद उनकी लीलाओं को लोक-जीवन में कोई स्थान नहीं प्राप्त हो सका।
मतलब यह कि सभी सभ्य देशों में हुए साहित्य-सृजन में यद्यपि बहुत कुछ सामान्य प्रवृत्ति के रूप में पाया जाता है, बावजूद इसके हरेक देश के साहित्य में आंतरिक अंतर हुआ करता है और यह अंतर संबद्ध देश के निजी चित्त और मानस की उपज हुआ करता है। इस दृष्टि से भारतीय साहित्य की कुछ अपनी विशिष्टताएं रही हैं। यहां पर साहित्य को न सत्य का मिथ्यारोपण माना गया, न राजनीति और समाजनीति का प्रतिपक्ष माना गया। यहां तो साहित्य को स्वायत्त सत्ता मानते हुए इसे ईश्वरकृत सृष्टि के समानांतर सृष्टि रचने का श्रेय दिया गया। चूंकि भारत के लोकचित्त में मनुष्य-मनुष्येतर-धरती, आकाश, पशु-पक्षी, नदी, समुद्र, पर्वत-पेड़ आदि सबको सम्मानजनक, आत्मीयतापूर्ण स्थान दिया गया, इसलिए यह समग्र चित्त ही यहां के साहित्य में अभिव्यक्त होता रहा। यही कारण है कि हमारे साहित्य में आधुनिक युग के पूर्व अलग से वर्ग विमर्श, दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी विमर्श या फिर पर्यावरण विमर्श जैसे अस्मितामूलक विमर्शों को स्थान न देते हुए सबका यथोचित ढंग से समावेश किया जाता रहा। मसलन, आज दलित विमर्श वाले शंबूक या एकलव्य को दलित चेतना का प्रतिनिधि-पात्र बना कर जिस तरह अलग से दलित विमर्श का अभियान चला रहे हैं, वह शंबूक भी तो ‘रामायण’ का और एकलव्य ‘महाभारत’ के पात्र हैं। फिर यह विलाप कि भारतीय साहित्य में दलित चेतना का अभाव है, कितना बेमानी है। पांडवों का बारह वर्षों तक और राम-सीता का चौदह वर्षों तक वन में रहना क्या हमारे साहित्य में वन्य जीवन के समावेश का प्रमाण नहीं है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रम अरण्य में ही हुआ करते थे जहां वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों की रचना हुई। इसे ही रवींद्रनाथ भारतीय सभ्यता का ‘तपोवन’ युग कहते हैं। राजा दुष्यंत का वन-कन्या शकुंतला से प्रेम विवाह क्या नागर और वन्य जीवन के समागम का सच नहीं है? अहिल्या के साथ छलात्कार, द्रौपदी का चीर हरण की कथाएं क्या स्त्रियों के साथ किए जाने वाले मनुष्यता विरोधी तथा स्त्री-उत्पीड़न जैसे कार्यों के प्रमाण नहीं हैं? मतलब कि जिसे हम भारतीय साहित्य कहते हैं, वह नाना द्वंद्वों, संघर्षों के उपरांत भारतीय लोकचित्त में बसे समग्र जीवन-बोध की अभिव्यक्ति रहा है।