अतुल कनक

हिंदी का यह सामर्थ्य है कि वह आज भी देश में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। बेशक, अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय प्रभावों और जलवायु के कारण उसके रूप में कुछ भेद दृष्टिगोचर होता है, लेकिन अपने मूल में हिंदी के समस्त रूप संप्रेषण को आम आदमी से जोड़ते हैं। यही कारण है कि आजादी के कुछ ही दिनों बाद सेठ गोविंद दास ने हिंदी को ‘जगन्नाथ का रथ’ कह कर संबोधित किया था। उल्लेखनीय है कि जब जगन्नाथ के रथ को खींचा जाता है, तो वह सर्वजन का उत्सव होता है। हिंदी का विकास भी दुनिया के सबसे बड़े संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक देश के लिए सर्वजन का उत्सव होना चाहिए।

दुर्भाग्य से आजादी के बाद से हिंदी को जितना प्रोत्साहन राजकाज या सामाजिक जीवन में मिलना चाहिए था, आभिजात्य बने रहने की मानसिकता ने इस भाषा को उतना प्रोत्साहन नहीं मिलने दिया। लंबी राजनीतिक परतंत्रता ने हमारे सांस्कृतिक स्वाभिमान को इतना पराभूत किया कि समाज का एक विशेष तबका विदेशी भाषा, विदेशी रहन-सहन और विदेशी जीवन-शैली को अपनाए रखने में ही अपने संभ्रांत होने की अनुभूति की सार्थकता तलाशने लगा। केसियानो बेलिगत्ती (इटली), अलेक्सई पेत्रोविच, हेरासिम लेबिदोव (रूस), जान जेशुआ केटलेर (डेनमार्क), जॉन बार्थविक गिलक्राइस्ट और जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (ब्रिटेन), डॉ. ओदोलन स्मेकल (चेकोस्लोवाकिया) सहित कितने ही विदेशी विद्वान हैं, जिनका योगदान हिंदी भाषा के विकास और संरक्षण के क्रम में महत्त्वपूर्ण तरीके से रेखांकित किया जाएगा। मगर भारतीय आभिजात्य वर्ग का मोह हमेशा अंग्रेजी के प्रयोग के प्रति बना रहा। शायद ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि अंग्रेजियत को संभ्रांत मानने की मानसिकता से एक वर्ग आजादी के दशकों बाद भी मुक्त नहीं हो सका। चूंकि हिंदी आम आदमी की भाषा है और आम आदमी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीजों से खास होने का ठसका कुछ क्लांत पड़ता है, इसलिए कथित तौर पर बड़े कहे जाने वाले लोग एक ठसके के तौर पर गलत हिंदी और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने लगे। हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए करोड़ों रुपए का पारिश्रमिक लेने वाले कुछ लोगों के दैनिक इस्तेमाल में तो आज भी इस ठसके को महसूस किया जा सकता है।

मगर लोकतंत्र की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं। कुछ लोगों को वे विशेषताएं भले ही अपने लिए विवशता प्रतीत हों, लेकिन उन्हें आत्मसात करना ही होता है और उन्हीं विशेषताओं में एक है कि आम आदमी की भाषा का प्रयोग किए बिना कोई लोक के एक बड़े हिस्से से नहीं जुड़ सकता। गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ने तो छठी शताब्दी ईसा पूर्व ही अपने प्रवचनों में तत्कालीन लोकभाषा का प्रयोग करके इस तथ्य को प्रतिपादित कर दिया था। उन्होंने आभिजात्य वर्ग की भाषा के स्थान पर लोक द्वारा काम में ली जाने वाली भाषा में अपनी बात कही। इतिहासकारों का मानना है कि इस तथ्य ने भी जैन धर्म और बौद्ध धर्म को तत्कालीन समाज में लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लोक की भाषा से जुड़ना बाजार की भी मजबूरी है। आपको अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए उन्हीं की भाषा में स्वयं को संप्रेषित करना आ चाहिए। यही कारण है कि अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक हिंदी भाषा में अपने विज्ञापनों को प्रोत्साहित करने लगी हैं। यह अलग बात है कि बाजार की जरूरतों को ध्यान में रख कर तैयार किए गए विज्ञापनों में कई बार कुछ ऐसा घालमेल होता है कि भाषा की अस्मिता आंसू बहाती प्रतीत होती है। लेकिन हिंदी की सबसे बड़ी ताकतों में एक गुण यह भी है कि हिंदी विविध बोलियों और भाषाओं के शब्दों को भी उनकी पूरी गरिमा के साथ आत्मसात कर लेती है। कौन विश्वास कर सकेगा कि हिंदी भाषियों द्वारा नियमित तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द ‘तौलिया’, ‘अलमारी’ और ‘अचार’ का उत्स पुर्तगाली भाषा है। अरबी, फारसी, देशज बोलियों, अंग्रेजी, यूनानी, तुर्की, लैटिन, डच, पश्तो, फ्रेंच ही नहीं, जापानी और चीनी भाषा के शब्द तक हिंदी में धड़ल्ले से प्रयुक्त होते हैं। दूसरी भाषाओं के शब्दों को सहजता से आत्मसात करने की लोचशीलता ही हिंदी को दुनिया की सबसे संप्रेषणीय भाषाओं में एक बनाती है।

हिंदी के व्यापक प्रभाव क्षेत्र के कारण ही दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में हिंदी को पढ़ाया जाता है। यों भी भाषाएं कभी एक-दूसरे की विरोधी नहीं होतीं। एक भाषा का ज्ञान दूसरी भाषा में भी संप्रेषणीयता में वृद्धि कर देता है- विशेषकर लोक से जुड़ी हुई भाषाओं के संदर्भ में तो यह ध्रुव सत्य है। हिंदी के प्रभामंडल ने अगर बाजार को अपने उत्पादों के विज्ञापन हिंदी भाषा में बनाने के लिए मजबूर किया, तो अनेक जाने-माने अंग्रेजी लेखकों को अनुवादों के माध्यम से हिंदी क्षेत्र में संभावनाएं टटोलनी पड़ी हैं। कवि कुमार विश्वास तो कहते हैं कि- ‘हिंदी स्नेह, सम्मान और मानवीय मूल्यों की भाषा है। चूंकि यह रचनाकार को लोक की भावनाओं से जोड़ती है, इसलिए इसके प्रयोग में शुचिता भी महसूस होती है और जन-कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता भी।’ कुमार मानते हैं कि लंबे समय तक हिंदी को हाशिए पर रखे जाने की कोशिश इसलिए भी हुई, क्योंकि कुछ सामर्थ्यवान लोग लोक के कल्याण की प्रतिबद्ध चेतना से स्वयं को कुछ दूर रखना चाहते थे।

मगर पिछले कुछ वर्षों में स्थिति बदली है। देश की सबसे बड़ी पंचायत में हिंदी भाषियों का रुतबा भी बढ़ा है और हिंदी भाषियों की संख्या भी। संविधान हिंदी को विशेष दर्जा देता है। कतिपय लोगों की दृष्टि में यह विशेष दर्जा लोकभाषाओं को अवशोषित करता है। लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान में प्रवाहित होने वाली चंबल नदी को उत्तर प्रदेश के इटावा के निकट स्वयं में समेट कर यमुना अगर अंतत: स्वयं को भी गंगा में समाहित कर देती है, तो वह किसी धारा का शोषण नहीं करती, अपितु उसके विराट प्रवाह की प्रस्तावना लिखती है। हिंदी और देशज भाषाओं का भी रिश्ता परस्पर नदियों की तरह ही है।