आनंद कुमार सिंह

लोचना पहले कि रचना? यह प्रश्न पहले भी रचनाकारों और आलोचकों को उलझाता रहा है। जाहिर है भर्तृहरि होते तो यही कहते कि शब्द और अर्थ की ‘संप्रति-सत्ता’ तो पहले से उपस्थित है और अंतत: उसे ही दोनों को पाना है। रचनाकार अपनी कृतियों से उसी को प्रकट करता और उसे ही जगा देता है, जो अर्थ पहले से विद्यमान है। लेकिन यह कौन-सा अर्थ है, जिसकी ओर रचनाकार अपने पाठकों को चुपचाप हांक कर ले जाना चाहता है, इसका पता तो तभी चलेगा जब आलोचक उसे पाठक को बता दे कि अर्थ की वह हरी-भरी जमीन किधर है। भर्तृहरि के शब्दों मे अर्थ के संचरण को संभव बनाने वाली यही ‘उपचार-सत्ता’ विमर्श की शक्ति है। दोनों सत्ताओं को जोड़ने की प्रक्रिया को ही शब्द योगह कहा गया है। अत: एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि आलोचक एक ‘शब्द योगी’ है। इससे स्पष्ट है कि अर्थ को प्रकट करने वाली या विमर्श को संभव बनाने वाली शक्ति ही आलोचना है। वही कृति को अर्थ प्रदान करती है। इसलिए वह रचना की पिछलग्गू नहीं, बल्कि संपूरक है।

परंपरागत रूप से पाठक को सहृदय माना गया है। वह प्रमाता है, क्योंकि रचना का रस उसी के चित्त में अंटेगा। लेकिन वह चित्त एकाकी नहीं, बल्कि सामाजिक है। वह अपने समाज की संवेदना से बंधा हुआ है, इसलिए रस के व्यापार में प्रवृत्त होकर ही वह अपनी सामाजिकता को खोज पाता है। एक साथ रस पाने की यह सामाजिकता सहृदय जनता को जातीय रूप से जोड़ती रहती है। इसलिए प्राचीन काल में नाटक और काव्य का अभिनय रंगमंच पर होता था। आलोचकों का काव्य विवेक भी उस सामाजिकता रसबोध की अवहेलना नहीं कर सकता था।

यह विचार ग्यारहवीं सदी में इतना सशक्त हो गया कि आचार्य क्षेमेंद्र ने घोषित ही कर दिया कि काव्य की आत्मा औचित्य में निवास करती है। लेकिन जबसे समाज अधिक व्यक्तिनिष्ठ होने लगा है, तबसे आलोचकों की धुरी बदल गई। उनके लिए भर्तृहरि का पूर्व से उपस्थित अर्थबोध, जिसको उन्होंने ‘संप्रति सत्ता’ कहा था और नित्य उपस्थित माना था, उसका लोप हो गया। जब शब्दकर्म का पहले से कोई ‘परम अर्थ’ उपस्थित ही नहीं है, यानी जब शब्दार्थ की ‘नित्यसत्ता’ है ही नहीं, तो किसी कृति का व्यंजित या वास्तविक अर्थ क्या है, यह किसी को नहीं पता। फिर तो कोई भी कृति केवल सापेक्ष-पाठ है, जिसका कोई निरपेक्ष मूल्य लगाया ही नहीं जा सका। इसलिए आज हम देखते हैं कि आलोचक प्राय: मूल्य निर्णय से बचने की जुगत करता है। वह समीक्षक भर दिखाई देता है।
हिंदी आलोचना के प्रारंभ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोकमंगल आदि अवधारणाओं के माध्यम से उसे प्रतिष्ठित करने की कोशिश की थी। चित्त की रसिक भूमियों की तलाश करते हुए शुक्ल जी ने हृदय की भाव सत्ता और बुद्धिमत्ता के योग से समन्वयवादी आलोचना को जन्म दिया था। तुलसी-जायसी-सूर पर लिखी उनकी आलोचनाओं में यह बात दिखाई देती है। इन महाकवियों की वास्तविक चिंताओं को लेकर आचार्य शुक्ल ने आवश्यक जीवन-कल्याण के सनातन मूल्यों को नैतिक और मनोवैज्ञानिक कसौटियों पर कसने की चेष्टा की।

काव्य को जीवन से जोड़ने के लिए या उसकी अर्थवत्ता तलाशने के लिए आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य में उस आलोचना कर्म की शुरुआत की, जिससे भर्तृहरि द्वारा प्रस्तावित अर्थ की नित्य उपस्थित मनोभूमि प्रकट होती है। आगे चल कर आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने उस परम अर्थ को प्रकृति और मनुष्य के द्वंद्व के माध्यम से राष्ट्रीय या जातीय रूपक में ढालने की कोशिश की। हम देखते हैं कि वाजपेयी जी की आलोचना दृष्टि में राष्ट्रीयता एक मूल्य की तरह प्रतिष्ठित दिखाई देती है। उनके लिए अच्छी या महान कविता के लिए केवल लोकमंगल कसौटी नहीं है, बल्कि कविता के लिए अपने भूगोल से जीवंत संबंध भी प्रमाणित करने की चुनौती है। दरअसल, उसी से जातीयता का विनिर्माण होता है। इसलिए कविता की सार्थकता या उसका रसबोध उसकी प्रत्यक्ष सामाजिकता की अभिव्यक्ति में है।

लेकिन हम देखते हैं कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कविता को पुन: देशकाल से ऊपर मानवता की शाश्वत भूमि पर प्रतिष्ठित किया। उन पर रवींद्रनाथ की अंतरराष्ट्रीय मानवता का बहुत गहरा प्रभाव था। इस तरह हिंदी आलोचना का परम अर्थ अपनी उद्देश्यपरकता में आचार्य शुक्ल की भावभूमि के एक बार फिर पास आ गया। केवल राष्ट्रीयता का जातीय स्वर कविता को सार्थक कर सकता है, यही सच नहीं है। उसका परमार्थ इस बात से निर्मित होगा कि कितना अधिक मानवीय और कितनी गहराई तक वह सार्वजनीन है। मानवता की ऐतिहासिक जययात्रा और रसबोध उनके केंद्र में है। आचार्य शुक्ल की दृष्टि में प्रकृति केंद्र में है, परम चेतना या परम ईश्वर वहां कहीं नहीं है। आचार्य वाजपेयी में प्रत्यक्ष प्रकृति ही विद्यमान है, जो मूर्तिमान होकर राष्ट्र के चैतन्य रूपक में ढल गई है। कविता या उपन्यास उसे किस तरह और कितनी तेजस्विता से उसे उद्घाटित करते हैं, मुख्य सवाल यह है।

लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी में अर्थ की ‘संप्रति सत्ता’ या शब्दार्थ की सतत उपस्थिति जिसे रचनाकार अपनी कृति द्वारा संकेतित करता है उस विश्वमानवता की बुनियाद पर खड़ी है, जिसमें मानवता के सारे उदार मूल्य समाए हुए हैं- ‘यत्र विश्वं भवति एकनीडम’। करुणा उसके मूल में है, उसी ने मनुष्य को बर्बर जंगलीपन से पृथक कर सौम्य सभ्य नागरिक बनाया है। उनके अनुसार प्रकृति से संस्कृति की जययात्रा- यही सभ्यता का विवेक भी है। यही वह परमार्थ है, जिसके लिए आलोचना कर्म उद्घाटक कर्म है।

जबसे मार्क्सवादी या प्रगतिवादी आलोचना ने हिंदी में अपनी उपस्थिति दर्ज की है तभी से शब्दार्थ का वह संतुलन बिगड़ गया है, जो परम-अर्थ के रूप में नित्य विद्यमान रहा करता था। हिंदी आलोचना में उसने पहले से चले आते परंपरागत अर्थसंभार को तोड़ कर छिन्न-भिन्न कर दिया और उसके बदले नई अर्थचेतना को प्रतिस्थापित करने की बहुतेरी कोशिश की। लेकिन हुआ अंतत: यही कि शब्दकर्म के परम अर्थ का आसन खाली हो गया। वहां पर कोई मूल्य नहीं बचा और रचनाओं द्वारा व्यंजित अर्थों के पूरी तरह समाजीकृत न हो पाने के कारण शब्दार्थ की नित्यता गौण और मतवाद-सापेक्ष हो गई। आगे चल कर उसका विरूपण इतना अधिक होने लगा कि उसमें राज्य सत्ता की प्रत्यक्ष राजनीति ने शब्दार्थ को अपदस्थ ही कर दिया। या तो प्रगतिवादी आलोचना को ऐतिहासिक रूप से हिंदी के आचार्यों द्वारा बहुत कठिनाइयों से विकसित लोकमंगल, राष्ट्रीयता और विश्वमनावता को अर्थांतरित करने का अवसर नहीं मिला या उसकी अपनी ‘संप्रति सत्ता’ का सम्यक् दार्शनिक निर्वाह ही नहीं हुआ। जो भी हो, हिंदी आलोचना की स्थिति ही संशयग्रस्त हो गई। इससे रचनाकारों के लिए भी समस्या हुई, जिससे संप्रेषण की समस्याएं उत्पन्न हुर्इं और आलोचना में फांक पैदा हो गई, जिसे आचार्य शुक्ल ने बहुत तैयारी से एक किया था।

आगे चल कर व्यावहारिक आलोचना तीव्र राजनीतिक मतवादों और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में अपघटित होने लगी और व्यावहारिक तथा सर्जनात्मक आलोचना का मार्ग ही अवरुद्ध हो गया। रमेश चंद्र शाह ने बहुत पहले इस पद को पुनर्सृजित करने का काम किया था और ‘सर्जनात्मक समीक्षा-अर्थ और प्रयोजन’ नाम से एक निबंध भी लिखा था। उसमें वह खोए हुए अर्थ को पुनर्प्रतिष्ठत करने का ही आग्रह करते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने खोए हुए अर्थ को पुन: तलाशने के लिए काव्यभाषा पर चिंतन किया। उनकी विवक्षा के केंद्र में काव्यभाषा है, लेकिन यह जाहिर है कि केवल काव्यभाषा के तंतुओं के सहारे शब्दार्थ के परम वैभव को पुनर्सृजित नहीं किया जा सकता। रामविलास शर्मा की आलोचकीय यात्रा अनेक टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर गुजरती है। प्रारंभ में मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिमानों के कारण उन्होंने पूर्व प्रचलित पारंपरिक अर्थों को नकार दिया, लेकिन बहुत बाद में उन्होंने अपने तर्इं शब्दयोग की उसी भारतीय परंपरा को खोजने की जबर्दस्त कोशिश की, जिसे सारभूत रूप में भर्तृहरि ने ‘वाक्पदीयम्’ में खोजा था। इसे लेकर नामवर सिंह ने उनके ऊपर आरोप लगाया था कि वे इतिहास की शवसाधना कर रहे हैं। जबकि स्वयं नामवर सिंह आलोचना की उसी समन्वयकारी जमीन से उठे हुए हैं, जिसे आचार्य शुक्ल ने प्रशस्त किया था और आचार्य द्विवेदी ने वैश्विक बनाया था।

नामवर जी ने वाजपेयी जी के ‘राष्ट्रीय शब्दार्थ’ को बीच से हटाने में सक्रियता दिखाई और वहां पर वामपंथी प्रतिवाद की दूसरी परंपरा को रख दिया। परिणाम यह हुआ कि मूलत: ध्वनिवादी आलोचक होते हुए भी वे पकड़ाई में नहीं आते। यद्यपि वह शब्दार्थ की गहराई को पारंपरिक रूप से जानने वाले गंभीर आलोचक हैं, किंतु उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता परम अर्थ को रेखांकित करने से बरज देती है। पर उनकी प्रमुख पुस्तकें उनके प्रच्छन्न रसबोध की भारतीयता को या शब्दार्थ की नित्यसत्ता को जोर से उद्घाटित करती हैं। लेकिन यहीं से हिंदी आलोचना अपने सैद्धांतिक पथ से विचलित हुई जान पड़ती है।

शीर्ष पर केंद्रीय अर्थ के अभाव से आलोचकों और रचनाकारों के सामने सृजनात्मकता के आयाम संकुचित हो गए। आलोचकों के लिए समस्या पैदा हो गई कि कृति-सापेक्ष मूल्यों का निर्वचन किस प्रकार से करें और किस तरह के पाठक या समाज के पास अर्थ को पाने के लिए जाएं। न वह पाठक बचा, न वह समाज। वह बीच की पद्धति ही लुप्त हो गई, जिससे रचनाकार और आलोचक एक ही साथ स्पंदित होते थे। यह संकट गहरा होने लगा।

वर्तमान समय में हिंदी में विश्वसनीय आलोचना की स्थिति ही अब संशयग्रस्त हो चुकी है। अब रचनाकार और आलोचक जनसंपर्क अभियान चलाते हैं और पुस्तक समीक्षा तक सीमित हैं। कुछ समीक्षक इस तरह प्रशिक्षित हैं कि वे एक-सी भाषा में हरेक कृति को आलोचित करते हैं। उनके पास कोई पैमाना नहीं बचा। उन्हें अच्छा लगना ही एकमात्र पैमाना है। या फिर जनसंपर्क दल में से निकली हुई कोई पुकार जो चीखती है कि मुझ पर कुछ लिख देना। उसे पढ़ कर यह समझ में नहीं आता कि आलोचित रचनाओं में कोई अंतर है या नहीं। समीक्षक मूल्य निर्णय नहीं देता, क्योंकि उसे रचनात्मक युग के प्रस्थानों की कोई समझ नहीं है। फलत: यह अहसास गहराता जाता है कि रचना अब आलोचना की पिछलग्गू होती जा रही है। इससे रचनाकार विखंडित हो गए हैं और आलोचकों को सुख देने और उनकी सूची में आने की बातें प्रमुख हो गई हैं। कोई सैद्धांतिक समझ नहीं दिखती।