फिराक गोरखपुरी भारत के समकालीन उर्दू शायर थे। उनका जन्म गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका मूल नाम रघुपति सहाय था। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उर्दू, फारसी और अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की। फिराक की रुचि शुरू से ही उर्दू शायरी में रही। उनके समकालीनों में अल्लामा इकबाल, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, कैफी आजमी और साहिर लुधियानवी जैसे प्रसिद्ध शायर शामिल थे। फिराक को उर्दू साहित्य जगत में अपने आप को स्थापित करने में बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी। इसलिए कि उनकी शायरी रिवायत से थोड़ी हट कर थी। मगर उनका ढंग कुछ लोगों को पसंद आता था। इस तरह बेहद कम उम्र में वे उर्दू शायरी में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। 29 जून, 1914 को उनका विवाह किशोरी देवी से हुआ।

सिविल सेवा से प्रोफेसर
वे प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) और भारतीय सिविल सेवा (ब्रिटिश भारत) (आईसीएस) के लिए चुने गए। मगर नौकरी छोड़ कर वे महात्मा गांधी के अहसयोग आंदोलन में कूद पड़े और अठारह महीने की जेल की सजा भी काटी। जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के कार्यालय में अवर सचिव का पद दिला दिया था। नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने यह पद छोड़ दिया। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में व्याख्याता के रूप में नौकरी की। यही समय था जब उन्होंने ज्यादातर उर्दू शायरी लिखी। उसमें उनकी कृति ‘गुल-ए-नगमा’ शामिल थी, जिस पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1960 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। वे उर्दू साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले रचनाकार थे।

मस्तमौला इंसान
फिराक गोरखपुरी बेहद मस्तमौला किस्म के इंसान थे। इसके अलावा उनके व्यक्तित्व में विद्रोही, अलग अंदाजे-गुफ्तगू, गुस्सा, अपार करुणा और दरियादिली का अद्भुत समन्वय था। हिंदी साहित्यकारों में सिर्फ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से उनकी बनती थी।

प्रमुख रचनाएं
फिराक गोरखपुरी की प्रमुख रचनाएं हैं- ‘गुल-ए-नगमा’, ‘मश्अल’, ‘रूह-ए-कायनात’, ‘नग्म-ए-साज’, ‘गजलिस्तान’, ‘शेरिस्तान’, ‘शबनमिस्तान’, ‘रूप’, ‘धरती की करवट’, ‘गुलबाग’, ‘रम्ज व कायनात’, ‘चिरागां’, ‘शोला व साज’, ‘हजार दास्तान’, ‘बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी’। इनके अलावा उन्होंने ‘हिंडोला’, ‘जुगनू’, ‘नकूश’, ‘आधी रात’, ‘परछाइयां’ और ‘तरान-ए-इश्क’ जैसी खूबसूरत नज्में और ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ जैसी रुबाइयों की रचना की है। उन्होंने एक उपन्यास ‘साधु और कुटिया’ तथा कई कहानियां भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में उनकी दस गद्य कृतियां प्रकाशित हैं।

सम्मान और पुरस्कार
‘गुल-ए-नगमा’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार और भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान के अलावा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। फिराक गोरखपुरी को भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए 1968 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। 1970 में उन्हें साहित्य अकादेमी फेलोशिप और 1981 में गालिब अकादमी पुरस्कार से विभूषित किया गया था।

उनकी जीवनी, ‘फिराक गोरखपुरी : द पोएट आॅफ पेन एंड एक्स्टसी’, उनके भतीजे अजयमान सिंह ने लिखी, जो 2015 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उनके जीवन और उनके कुछ कार्यों के अनुवाद को शामिल किया गया था।

निधन : लंबी बीमारी के बाद नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।