गांधी कला या काव्य के लिए जितना आवश्यक सत्योन्मुखी होना मानते हैं, उतना ही उसे धर्मोन्मुखी होना आवश्यक मानते हैं। गांधी की यह मान्यता जरूर धर्मनिरपेक्ष सोच वालों को असंगत, अटपटी लग सकती है। यहां पर विस्तार में गांधी के धर्म संबंधी विचारों के उल्लेख का अवकाश नहीं है, फिर भी गांधी के चिंतन और कर्म में धर्म का जो स्वरूप था वह ईसाई, इस्लाम जैसे मत विशेष का अवलंबन करने वाला नहीं था। उनका धर्म इतना खुला हुआ था, जिसमें समस्त धर्मों के मानवीय मूल्यों का समावेश था और उसमें ‘पीर पराई जाने रे’ या परदुखकातरता की प्रधानता थी। इसलिए जब वे काव्य या कला के धर्म से जुड़े होने की बात करते हैं तो स्पष्टत: वे कला और काव्य को मानव कल्याण की भूमिका में देखना चाहते हैं। चूंकि यह काम ‘कला कला के लिए’ मानने वाले नहीं करते, इसलिए वे ऐसी कलावादी साधना को प्रश्रय देने वाले कलावाद का विरोध करते हैं।
15 जून, 1932 को भारती नाम की एक लड़की को लिखे पत्र में उन्होंने दो-टूक शब्दों में समझाया था- ‘कला का जीवन में स्थान है, लेकिन कला किसे कहा जाए, यह एक अलहदा सवाल है।’ लेकिन हम सबको जिस मार्ग का अनुसरण करना है, उसमें कला आदि साधन मात्र है। यह जब साध्य हो जाती है तब वह मनुष्य के लिए बंधन रूप बन जाती है और मनुष्य के पतन का कारण बन जाती है।’
दरअसल, नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का उत्कर्ष गांधी के लिए सदैव अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। उनके चिंतन एवं कर्म का अविच्छिन्न अंग रहा, इसलिए धर्म के साथ कला एवं काव्य को भी उन्होंने मनुष्य के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए उत्तरदायी माना। समस्त नैतिक आध्यात्मिक उत्थान कोे बकवास मानने वाले कलावादियों को गांधी द्वारा कला और काव्य पर नैतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान का दायित्व आरोपित करने से असहमति हो सकती है, पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि गांधी का न केवल मानव समाज, बल्कि समस्त जगत का हित साधने का जो दृष्टिकोण था, सरोकार था, उसी के अंतर्गत उन्होंने कला एवं साहित्य की उपयोगिता स्वीकार की। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि जब गांधीजी कला को लेकर ऐसी बातें कह रहे थे, तब यूरोप में इटली के सौंदर्यशास्त्री क्रोचे के ‘अभिव्यंजनावाद’ की बड़ी धूम मची हुई थी। यह अभिव्यंजनावाद ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत की हिमायत में खड़ा था। गांधी ने स्पष्टत: इस प्रभाव से असंपृक्त रहते हुए इस कलावादी सिद्धांत को अमान्य कर दिया था। ध्यातव्य है कि यह वही वक्त है जब हिंदी के शीर्षस्थ समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ में इस सिद्धांत को आड़े हाथों लेते हुए कहा था- ‘कला, कला के लिए वाली बात को जीर्ण होकर मरे हुए कई दिन हुए। एक क्या, कई क्रोचे उसे फिर जिला नहीं सकते।’
जाहिर है, गांधीजी दृढ़ता से यह मानते थे कि जिस साहित्य या कला की रचना हो, उसका सरोकार जनता के नैतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान से होना चाहिए। किंतु इसका मतलब यह भी नहीं कि वे साहित्य को भौतिक परिस्थितियों से निरपेक्ष स्थिति में देखना चाहते थे। वे साहित्य को भौतिक आवश्यकताओं से भी संबद्ध होना आवश्यक समझते हैं। मसलन, अप्रैल 1920 को गुजरात साहित्य परिषद, अमदाबाद में जो उन्होंने लंबा भाषण दिया था, उसमें उन्होंने ‘एलिसेस एडवेंचर्स इन वंडरलैंड’ के रचनाकार लुई कैरल का उदाहरण देते हुए साफ शब्दों में कहा- ‘लुई के मन में पुस्तक लिखने का विचार आया तो उसने अपने बच्चों के लिए पुस्तकें लिखीं। उसके बच्चों ने तो उनका लाभ उठाया ही, आज के हमारे स्त्री-पुरुष तथा बालक भी उनसे लाभ उठा रहे हैं। मैं अपने साहित्य-लेखकों से ऐसा ही साहित्य चाहता हूं। मैं उनसे वाणभट्ट की ‘कादंबरी’ नहीं, तुलसीदास की ‘रामायण’ मांगता हूं। ‘कादंबरी’ हमेशा रहेगी या नहीं, इसके विषय में मुझे शंका है, लेकिन तुलसीदास का दिया हुआ साहित्य तो स्थायी है। फिलहाल साहित्य हमें रोटी, घी और दूध ही दे, बाद में उसमें बादाम, पिस्ते आदि मिला कर ‘कादंबरी’ जैसा कुछ लिखेंगे।’
गांधी जी के पूर्वोक्त वक्तव्यों से सिद्ध है कि जहां एक तरफ वे साहित्य को मनुष्य के नैतिक-आध्यात्मिक उत्थान के लिए उत्तरदायी मानते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वे जनसाधारण की समस्याओं के प्रति भी साहित्य को प्रतिबद्ध होते हुए देखना चाहते हैं। ‘रोटी, घी और दूध’ आम आदमी की चाहत, आवश्यकता होती है, जबकि बादाम, पिस्ते विशिष्ट जनों की। ‘कादम्बरी’ जैसी रचना बादाम-पिस्ते की श्रेणी में है, तो तुलसीदास का साहित्य ‘रोटी-दूध’ की श्रेणी में, इसीलिए वह जनता के बीच अधिक लोकप्रिय है। गांधी जी इसी तरह के साहित्य के पक्षधर हैं, जो स्पष्टत: साहित्य के प्रति उनके जनवादी दृष्टिकोण को प्रकट करता है। स्मरणीय है कि 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई, उसके बाद ‘कस्मै देवाय’ की तर्ज पर ‘साहित्य किसके लिए’ की जोरदार बहस चलाते हुए प्रगतिशील लेखकों ने किसानों, मजदूरों यानी मेहनतकश जनता के पक्ष में उनकी समस्याओं से संबंध रखने वाले साहित्य-लेखन पर बल दिया और आज भी जनवादी लेखन के नाम पर यह मांग कायम है। इसमें मार्क्सवादी सिद्धांतों के प्रभाव की खूब चर्चा की जाती रही है। पर गांधी ने भी अपने चिंतन में धर्म और अध्यात्म को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान देने के बावजूद साहित्य-लेखकों के सरोकारों को जनसाधारण-किसान, मजदूर के संदर्भ में भी देखा-परखा। अंतर था तो यह कि गांधी साहित्य के माध्यम से रोटी, दूध प्राप्त करने हेतु कर्म-प्रवृति के साथ-साथ आत्मिक संस्कार भी पैदा करना चाहते थे, जबकि मार्क्सवाद को दिन-रात ओढ़ने-विछाने वाले वर्ग संघर्ष की चेतना पैदा करने में ही साहित्य का एकमात्र लक्ष्य समझते रहे। इस अंतर के बावजूद साहित्य को लेकर गांधी का दृष्टिकोण पूरी तरह जनवादी चरित्र का था, इसे झुठलाया नहीं जा सकता, दीगर बात है कि इसकी चर्चा हमारे प्रगतिशील-जनवादी लेखन में नहीं के बराबर हुई है।

