राजकुमार
रचनाकार और आलोचक के बीच शुरू से वाद, विवाद और संवाद की स्थिति रही है। विवादों ने अक्सर संवाद के पक्ष को दबाया है। इसलिए यह मान लिया जाता है कि साहित्यकार और आलोचक के बीच छत्तीस का रिश्ता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पश्चिम में सैद्धांतिक आलोचना का प्रतिपादन करने वाले प्लेटो ने साहित्यिक विषय-वस्तु को लेकर इतनी तीखी आलोचना की कि उन्हें रचनाकार-विरोधी आलोचक करार दिया गया। प्लेटो की नजर में ‘पाठक’/ ‘नागरिक’ और प्रकारांतर से गणराज्य का हित महत्त्वपूर्ण था। वे साहित्य से विशेष किस्म के ‘नैतिक सत्य’ की मांग कर रहे थे। ऐसा न होने की स्थिति में कलाकार/ लेखक की भूमिका को संदिग्ध मान लिया।
प्लेटो के प्रिय शिष्य अरस्तू ने प्लेटो से असहमति दर्ज कराते हुए विषय-वस्तु को नए ढंग से परिभाषित और साहित्यकार के मत को पुनर्परिभाषित करते हुए साहित्यकार की स्थापनाओं को पुनर्स्थापित किया। पश्चिम में साहित्यिक आलोचना का विकास इन तीखी बहसों के बीच हुआ और अनवरत जारी है। पश्चिमी आलोचना की तुलना में भारतीय साहित्यिक आलोचना में और अधिक गहनता से विचार-विमर्श हुआ। ध्वनि, वर्ण से लेकर काव्य के आंतरिक और बाह्य पक्ष के अंग-उपांगों के सूक्ष्म से सूक्ष्म विश्लेषण हुए। यह गुण-दोष विवेचन से बहुत आगे औचित्य निर्धारण और काव्य मूल्यों के निर्धारण तक गया। तमाम सहमतियों-असहमतियों के बीच रचना केंद्रित आलोचना की सुदृढ़ परंपरा विकसित हुई।
मगर समकालीन हिंदी आलोचना कई असुविधाजनक सवालों और आपत्तियों के बीच सांस ले रही है, जिसमें नैतिक स्खलन की बात उठती रहती है। लेखकों का मानना है कि हिंदी में अच्छे आलोचकों का अभाव है, जो कृति की विशिष्टता को उभार दे और उसके ऐतिहासिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक मूल्यों की संश्लिष्टता और संवेदना का सही-सही मूल्यांकन करे। दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि तटस्थ होकर रचना का मूल्यांकन करते ही या असुविधाजनक सवाल या आपत्तियां उठाते ही रचनाकार निजी विद्वेष मान लेते हैं और व्यक्तिगत संबंध खराब हो जाते हैं। नतीजन अच्छी आलोचना परिदृश्य से गायब है।
आज लेखक और आलोचक के बीच संवाद है, लेकिन वाद-विवाद नहीं। वजह, रचना और आलोचना के बीच संवाद कम है। लोकवृत्त में अनुगूंजें उठती हैं कि रचनाकार और आलोचक के बीच साठगांठ है। समकालीन आलोचकों को आपत्ति है कि लेखक सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं। आलोचना करने पर या तो लेखक बुरा मान जाता है या संपादक उसे नहीं छापता। एक विचित्र स्थिति यह भी है कि प्रकाशक अपनी पत्रिकाओं में अपनी ही प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षा चाहते हैं और उसे बाजारवादी तर्ज पर पेश करते हैं, ताकि उसे महान रचना मान कर ‘पाठक’ खरीदे। एक आक्षेप यह भी है कि आलोचना के दिन लद गए। विमर्शों ने आलोचना को अपदस्थ कर दिया है। ‘समीक्षा संस्कृति’ के उभार ने आलोचना की उपस्थिति को कमतर किया है। आलोचना के सामने यही चुनौतियां नहीं हैं? हमारे पठन-पाठन-लेखन में तकनीकी क्रांति के बदलाव ने काफी कुछ बदल दिया है। सोशल मीडिया ने लेखन के ढर्रे को ही बदल दिया है।
मगर जिस किस्म के रुदन की चर्चा है, स्थिति बिल्कुल वैसी भी नहीं है। इस दौर में एक कृति सोशल मीडिया या अन्य विज्ञापित माध्यमों से सैकड़ों पाठकों की पहुंच में है। उस पर आई प्रतिक्रिया, समीक्षा या टिप्पणी या आलोचना को एकत्रित किया जाए तो कृति को समग्रता में समझा जा सकता है। पर उसे उस किस्म की आलोचना नहीं माना जा सकता, जिस तरह की आलोचना शुक्लजी, द्विवेदीजी, से लेकर नामवर सिंह या साही ने लिखा। आज का पाठक उनकी तरह सिर्फ साहित्य केंद्रित भी नहीं है।
हिंदी की ज्यादातर पत्रिकाएं निजी उपक्रम से या सरकारी विज्ञापन के बल पर निकल रही हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में मांगवादी लेखन का चलन है। संपादक अपनी रुचि से लेखन कराता है। लेखक प्रकाशक से रॉयल्टी के लिए भिड़ा रहता है या रुदन करता है। आलोचक की आर्थिक स्थिति उससे भी बदतर है। ऐसे में आलोचना खानापूर्ति में बदल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। अच्छे आलोचनात्मक लेखन की कीमत संपादक दे सकने में अपने को असमर्थ बताते हैं।
हिंदी आलोचना की दयनीयता के लिए काफी हद तक रचनाकार भी जिम्मेदार हैं। रचनाकार ने आलोचक को कभी समकक्ष नहीं माना। आलोचना कर्म को दूसरे दर्जे का काम घोषित किया, आलोचक को रचनाकार से निकृष्ट दर्जा दिया। श्याम सुंदर दास ने कहा था ‘यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें, तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।’ ऐसा क्यों कर माना जाए? आलोचना को जीवन की व्याख्या क्यों न माना जाए?
आलोचना, साहित्य के समांतर रचना है। इसे कई लेखकों ने अपने ढंग से कहा है। साहित्यकार जिन तत्त्वों, घटनाओं, अनुभवों का संश्लेष रचना में पिरोता है, उन्हीं की व्याख्या आलोचक करता है। आलोचक अपने समय के ऐतिहासिक दबाव के भीतर रचना के नए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आशय को खोलता है और रचना के ‘नए पाठ’ उपलब्ध कराता है। आलोचक इस मायने में दोहरी भूमिका निभाता है कि एक तरफ वह रचना के संसार को समझता है तो दूसरी तरफ वैश्विक दुनिया में रचना की उपस्थिति को दर्ज करता है। समकालीन लेखकों के लिए वह ‘तीसरी आंख’ होता है।
फ्रॉक क्लार्क ने लिखा है कि ‘आलोचना उस बारिश की तरह है, जो जड़ोच्छेदन नहीं करती, बल्कि लेखक को पौधे की तरह सींचती है।’ इस रूप में आलोचना रचना के आगे ‘कबीर का दीपक’ है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि लेखक की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक या मानसिक बनावट तक आलोचक की पहुंच हो ही। इलविस प्रिस्ले ने ऐसे आलोचकों के लिए लिखा है कि ‘अगर आप नहीं समझते तो आलोचना न करें। आप दूसरे के जूते पहन कर न टहलें।’
उत्तर-आधुनिक विमर्शों ने कृति, कृतिकार और आलोचक जैसे पदों को नए ढंग से समझने पर जोर दिया है। लेकिन हिंदी में पचास के दशक की सोच ही काम कर रही है और पतनशीलता के नाम पर छाती पीटने का काम चल रहा है। रोलां बार्थ ने लेखक की मृत्यु के साथ ही ‘पाठक’ के जन्म की बात की और ‘पाठ की केंद्रीयता’ को ध्वस्त कर दिया। अर्थ के विकेंद्रीकरण की अवधारणा ने बहुलतावादी पाठ को तरजीह दिया और रचना के पाठ को जनतांत्रिक बनाया। ‘आलोचक’ को ‘पाठक’ की भूमिका में शिफ्ट कर पाठ की अनंतता को खोला, जिसे हिंदी में अलग माध्यमों और सोशल मीडिया में पाठ की भिन्नता के रूप में देखा जा सकता है।
बार्थ ने क्लासिकल आलोचना की उस अवधारणा को भी विदाई दी, जो विचारधारा का मुखौटा ओढ़ कर रचना के पाठ से ‘केंद्रीकृत मूल्य-निर्णय’ दिया करता था या ‘सार-तत्वों’ के अन्वेषण की बात करता था। उसने साहित्य को भाषा की अभिव्यक्ति मान कर, उसमें मौजूद छवियों की शृंखलाओं, चिह्नों और रूपकों आदि के अध्ययन की बात की और विषयनिष्ठता और वस्तुनिष्ठता की बहसों को भी एक किनारे लगा दिया। कई स्तरों पर हिंदी में भी ऐसे विमर्शों की उपस्थिति है, इसलिए छाती कूटन प्रक्रिया से जहां आगे भी है।

