दिनेश कुमार

गजानन माधव मुक्तिबोध ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखते हैं : ‘आज के साहित्यकार का आयुष्य-क्रम क्या है? विद्यार्जन, डिग्री और इसी बीच साहित्यिक प्रयास, विवाह, घर, सोफासेट, ऐरिस्ट्रोक्रैटिक लिविंग, महानों से व्यक्तिगत संपर्क, श्रेष्ठ प्रकाशकों द्वारा अपनी पुस्तकों का प्रकाशन, सरकारी पुरस्कार या ऐसी ही कोई विशेष उपलब्धि; और चालीसवें वर्ष के आसपास अमेरिका या रूस जाने की तैयारी; किसी व्यक्ति या संस्था की सहायता से अपनी कृतियों का अंग्रेजी या रूसी में अनुवाद; किसी बड़े भारी सेठ के यहां या सरकार के यहां ऊंचे किस्म की नौकरी। अब मुझे बताइए कि यह वर्ग क्या तो यथार्थवाद प्रस्तुत करेगा और क्या आदर्शवाद?’ लगभग छह दशक पहले कही गई मुक्तिबोध की यह बात आज के नए रचनाकारों पर अक्षरश: लागू होती है। साहित्य के क्षेत्र में कदम रखने वाला आज का युवा पहले की तुलना में कई गुना अधिक कैरिअरिस्ट और समझौता परस्त है। उसके लिए साहित्यिक कर्म व्यक्तित्व की अनिवार्यता से अधिक प्रसिद्धि और शोहरत पाने का एक जरिया भर है। शायद इसीलिए हिंदी में अब रचनाकार बनने के लिए कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती और न ही कुछ दांव पर लगाना होता है। आप तमाम दुनियावी सफलताओं के साथ लेखक भी बने रह सकते हैं। नई पीढ़ी में वैसे लेखक न के बराबर मिलेंगे, जिन्हें लेखक होने के कारण दुनियावी सफलताओं से महरूम होना पड़ा या जिन्होंने दुनियावी सफलताओं की कीमत पर अपने लेखक होने को बचाया हो। एक सफल व्यक्ति होने और एक सफल लेखक होने, दोनों का फार्मूला अब धीरे-धीरे एक ही हो गया है।

जब दुनियावी सफलताओं के सूत्रों को साहित्य के क्षेत्र में लागू किया जाता है, तो उसकी बहुत भारी कीमत साहित्य को चुकानी पड़ती है। इसका सबसे पहला असर साहित्यिक परिवेश पर पड़ता है। साहित्यिक परिवेश और गैर-साहित्यिक परिवेश के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। हम प्राय: मान कर चलते हैं कि लेखक आम लोगों की तुलना में कम संकीर्ण और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अधिक सजग होता है। इसलिए साहित्यकारों से निर्मित साहित्यिक परिवेश में ईमानदारी, नैतिकता और चरित्र की प्रतिष्ठा होगी। यानी, साहित्यिक परिवेश सामाजिक परिवेश की बुराइयों से बहुत हद तक मुक्त होता है। पर आज हम ऐसा नहीं कह सकते हैं। समाज की बुराइयों से पार पाना साहित्य का काम है, किंतु आज का साहित्यिक परिवेश स्वयं उन बुराइयों से ग्रसित हो गया है। तरह-तरह के अवसरवाद, पाखंडपूर्ण आचरण, पुरस्कारों के लिए अनैतिक गठजोड़ और दुरभिसंधियां पुस्तक-प्रकाशन के लिए पैसे का लेन-देन आदि वर्तमान साहित्यिक परिवेश में सर्वत्र व्याप्त है। हम कह सकते हैं कि जैसा परिवेश राजनीति और समाज में है, वैसा ही परिवेश साहित्य में भी है। समाज को दिशा देने वाले के रूप में लेखक की जो भूमिका थी वह अब कम से कम हिंदी में तो समाप्त हो गई है। युवा पीढ़ी के बहुलांश लेखकों का आचरण भीड़ से अलग नहीं, बल्कि भीड़ के अनुरूप दिखाई देता है। हिंदी समाज के लिए निस्संदेह यह दुखद परिघटना है कि उसका लेखक भी अब भीड़ का हिस्सा बन गया है। वह दिन अब दूर नहीं है, जब हिंदी का युवा लेखक बहुसंख्यकवाद का भी समर्थन करने लगे।

इस साहित्यिक वातावरण का असर लेखन पर पड़ना स्वाभाविक है। शायद यह पहली बार है जब साहित्य अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्षरत है। उसकी पहचान को सुनियोजित रूप से नष्ट किया जा रहा है। साहित्य की अस्मिता छीनने का काम एक तरफ सत्ता द्वारा हो रहा है, तो दूसरी तरफ बाजार द्वारा। सत्ता और बाजार के गठजोड़ द्वारा साहित्य को नख-दंत विहीन करने की पूरी परियोजना चल रही है। हिंदी साहित्य को उसके सत्ता और बाजार-विरोधी विरासत से अलगा कर सत्ता और बाजार के अनुकूल बनाया जा रहा है। प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अब साहित्य के इस स्वभाव को ही बदला जा रहा है। अगर साहित्य का स्वभाव बदल जाए, वह कमजोर की वकालत करना छोड़ दे, सरोकारविहीन हो जाए, दुनिया को सुंदर देखने का स्वप्न छोड़ दे, तो फिर साहित्य में बचेगा क्या और जो बचेगा, क्या वह साहित्य कहलाने का अधिकारी होगा?

एक ऐसे समय में जब हर एक शय ने सत्ता और बाजार के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है, तब भी साहित्य कुछ न कुछ अपना प्रतिरोध दर्ज करा रहा है। अंतिम किले के रूप में बचे साहित्य को विजित करने का उपक्रम तेजी से चल रहा है। इसके लिए मुख्यत: दो हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है। एक है साहित्य उत्सव और दूसरा है ‘बेस्ट सेलर’। साहित्य उत्सवों के माध्यम से साहित्य का समारोहीकरण किया गया है। अन्य उत्पादों की तरह साहित्य भी अब बाजार में नुमाइश की वस्तु बन गया है। यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि जो खबरिया चैनल भूल कर भी कभी साहित्यकारों को नहीं बुलाते हैं, वे सलाना साहित्य उत्सव कर रहे हैं। भिन्न-भिन्न तरह के साहित्य-उत्सवों में धन लगाने वाले कारोबारियों के चरित्र को देखा जाए तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि इन उत्सवों के पीछे की असल मंशा क्या है? दरअसल, ये उत्सव और कुछ नहीं, बल्कि साहित्य के व्यवसायीकरण की परियोजना मात्र हैं। साहित्य में इधर पैसे का खेल बढ़ा है। छोटी ही सही, पर पूंजी के माध्यम से साहित्य को नियंत्रित और निर्देशित करने की शुरुआत इन उत्सवों के माध्यम से हो चुकी है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब से मीडिया में पूंजी का दखल बढ़ा और वह मिशन आधारित व्यवसाय से सामान्य व्यवसाय में तब्दील हुआ है, तबसे मीडिया का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। आज साहित्य के क्षेत्र में भी यही खतरा है। साहित्य का व्यवसायीकरण साहित्य को साहित्य ही नहीं रहने देगा। पूंजी संचालित आने वाला साहित्यिक परिवेश कैसा होगा, इसका हम अनुमान कर सकते हैं। तब साहित्यकार होंगे, साहित्य होगा, पर उसमें उत्पीड़तों की आवाज न होगी। साहित्य और साहित्यकार दोनों सत्ता और बाजार से अनुकूलित हो गए होंगे। वैचारिक रूप से सजग युवा लेखक तो इस खतरे को समझ रहा है, पर अधिकांश उच्चवर्गीय लेखक बाजार के मादक आकर्षण में खोते जा रहे हैं।

युवा लेखकों की रुचि और सोच को भ्रष्ट करने में एक बड़ा योगदान हिंदी में ‘बेस्ट सेलरों की कृत्रिम संकल्पना का है। प्रायोजित ढंग से जन-रुचि को परिष्कृत करने वाले सरोकारी साहित्य को पीछे ढकेल कर सतही और आनंददायक साहित्य को आगे किया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि गंभीर साहित्य के दिन अब लद गए हैं। उनके पाठक नहीं हैं। बहुत सुनियोजित तरीके से लुगदी साहित्य और वास्तविक साहित्य के अंतर को मिटाने का प्रयास हो रहा है। कोशिश यह है कि ‘बेस्ट सेलर’ के माध्यम से लुगदी या लोकप्रिय साहित्य को ही धीरे-धीरे वास्तविक साहित्य घोषित कर दिया जाए। दुखद यह है कि इस खेल में अब हिंदी के छोटे-बड़े अधिकांश प्रकाशक शामिल हो गए हैं। अगर गौर से देखें, तो सत्ता बाजार के अनुकूल साहित्य को पसंद करती है, तो बाजार सत्ता के अनुकूल साहित्य को। साहित्य चाहे बाजारोनुकूल हो या सत्तानुकूल, वह अंतत: मनुष्य विरोधी होगा।

ऐसे साहित्यिक वातावरण में एक नया लेखक क्या करे? क्या सारा दोष उसी को दे देना उचित है? मुख्य दोष तो पिछली पीढ़ी के साहित्यकारों का है, जिन्होंने ऐसे साहित्यिक वातावरण के निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग किया है। बेचारा नया लेखक तो इस बाजारोन्मुख और सत्तापरस्त माहौल में अपने को फिट करता है। जब वह देखता है कि हमारे बुर्जुग साहित्कार इसी ‘सफल’ रास्ते पर बहुत पहले से चल रहे हैं, तो वह भी बिना किसी दुविधा के उसी रास्ते पर चलने लगता है। ‘महाजनो येन गत: स पंथा:’। उसका कसूर सिर्फ इतना है कि वह इस वातावरण के खिलाफ विद्रोह न करके उसमें समायोजित होने का प्रयास करता है। सामान्य मनोविज्ञान को देखते हुए शायद यह कोई बड़ा कसूर नहीं है।