कार्टून बच्चों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय मनोरंजन का साधन है। टीवी में अनवरत कार्टून का प्रसारण हो रहा होता है। बच्चे लगातार टीवी के साथ चिपके होते हैं। वे बाहर खेल के मैदान में जाने के बजाए टीवी-मोबाइल-कम्प्यूटर पर कार्टून देखना पसंद करते हैं और उससे आनंदित होते हैं। जब तक रोका-टोका न जाए, बच्चे उसमें रमे रहते हैं। इसका एक सकारात्मक पक्ष यह है कि स्कूल शुरू करने वाले बच्चे टीवी और मोबाइल से ज्यादा सीखते हैं। वह बच्चों के लिए ‘टेक्सट बुक’ की तरह होता है। अक्षरों की पहचान, वन्य जीवन और प्रकृति ज्ञान को तेजी से जानते-पहचानते हैं। इस स्थिति में डिजिटल माध्यम या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ‘शिक्षक’ की भूमिका में होते हैं। बच्चों की भाषा के विकास में ये माध्यम बहुत महत्त्वपूर्ण साबित होते हैं। वे जिंगल्स या गीतों को तेजी से याद करते हैं और खेल-खेल में गुनगुनाते हैं।
बच्चे कम उम्र में ही वैश्विक खेल की दुनिया से परिचित होते हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह के खेल खेले जाते हैं। उनके नृत्य-गीत भिन्न-भिन्न किस्म के हैं। डिजिटल नागरिक होने के कारण वे वैश्विक सामाजिक-सांस्कृतिक दुनिया से रुबरू होते हैं और उसे तेजी से सीख लेते हैं। ऐसे अध्ययन मौजूद हैं, जो बताते हैं कि बच्चे जब चार घंटे से अधिक समय टीवी के साथ बिताने लगते हैं तो उनके व्यवहार और आचरण में बदलाव आने लगते हैं। वे टीवी के आगे खाना पसंद करते हैं या मोबाइल देखते हुए खाते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे ‘ओवरवेट’ होने लगते हैं। परिवार या माता-पिता को शुरू-शुरू में यह आसानी होती है कि उन्हें खाना खिलाने के लिए उनको अतिरिक्त समय नहीं देना पड़ता या वे अपने घरेलू या रोजमर्रा के काम निपटाने में व्यवधान नहीं पाते हैं। लेकिन उनका यह व्यवहार बच्चे को टीवी या मोबाइल का अभ्यस्त और काफी हद तक नशे की लत की तरह बना देता है, जो बाद में बच्चे के मनोविज्ञान, चेतना और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
ज्यादातर कार्टून या वीडियो गेम की संरचना में हिंसा शामिल होती है। यहां तक कि बच्चों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय कार्टूनों में भी हिंसा के रूप मौजूद हैं। बच्चे इन कार्टून और वीडियो के साथ गहनता से जुड़ जाते हैं। धीरे-धीरे उनके व्यवहार में अंतर आने लगता है। उसके प्रभाव स्वरूप उनके अंदर आक्रामकता बढ़ती है। दुनिया भर में हुए कई शोध इस बात की पुष्टि करते हैं। एक जर्मन शोध बताता है कि स्कूल के बच्चों के तीन समूह बनाए गए। पहले समूह को ऐसे वीडियो गेम और खिलौने दिए गए, जिनमें हिंसा मौजूद है। दूसरे समूह को दिए गए वीडियो और खिलौने में उन तत्त्वों का अभाव था, जो पहले समूह को दिया गया। तीसरे समूह को इन चीजों से ‘न्यूट्रल’ रखा गया। फिर तीनों समूह के बच्चों को आपस में मिला कर खेल में शामिल किया गया। खेल के दौरान उनके व्यवहार का अध्ययन करने पर पाया गया कि जो बच्चे हिंसक वीडियो या खिलौने की संगति में थे वे खेल के दौरान अधिक आक्रामक व्यवहार कर रहे थे। उनके एक्शन में वे चीजें मौजूद थी जो वीडियो गेम में थे। दूसरे समूह के बच्चे उनसे कम आक्रामक थे। तीसरे समूह के बच्चे खेल के दौरान भी न्यूट्रल थे। उनकी प्रकृति भिन्न थी।
जब बच्चे, बड़ों की दुनिया को देखते हैं, जिसमें शराब, सिगरेट से लेकर जोखिम भरे व्यवहार को देखते हैं या लैंगिक असमानता, जातिगत विषमता, सामाजिक भेदभाव या रंगभेद आदि को देखते हैं तो उनके ऊपर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है, क्योंकि उनके रोल मॉडल वर्चुअल और काल्पनिक दुनिया से उपस्थित होते हैं। जोखिम भरे रेसिंग को देखकर ही बच्चे आजकल सड़कों पर बाइक लेकर स्टंट कर रहे होते हैं। एक शोध बताता है कि बहुत अधिक हिंसक वीडियो गेम देखने वाले बच्चे नर्वस, आक्रामक, लड़ाका और अवज्ञा करने वाले होते हैं। अमेरिका और पश्चिमी दुनिया में युवाओं का शिक्षण संस्थानों से लेकर सार्वजनिक जगहों पर हुए हमलों को इन हिंसात्मक वीडियो के अभस्त के रूप के रूप में पहचाना गया था और उन पर पाबंदी की बात भी उठी थी। कई शोध यह निष्कर्ष भी देते हैं कि हिंसा के रूप वैसे ही नहीं होते जैसे उसने देखा है, बल्कि उसमें भिन्नता होती है। कुछ शोध मामूली प्रभाव की बात करते हैं। लेकिन उससे इनकार नहीं करते। कई बार यह भी होता है कि उनके अंदर भय की संरचना विकसित होती है, क्योंकि जिस दुनिया में खुद को पाते हैं वहां लगातार हिंसक चीजें घटित हो रही होती हैं और बच्चे अपने को उसमें घिरा पाते हैं।
एक शोध, बच्चों पर तीन गहरे प्रभाव की चर्चा करता है। पहला, ऐसे बच्चे दूसरों के दुखों और विपत्तियों के प्रति असंवेदनशील होने लगते हैं। दूसरा, उनके आसपास या वास्तविक दुनिया में जब हिंसा होती है, तो वे इस घटना को अस्वाभाविक तरीके से नहीं लेते। उन्हें विचलित होना चाहिए था, लेकिन हिंसात्मक दृश्यों की अभ्यस्ता के कारण ऐसा नहीं होता है। तीसरा, बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति विकसित होती है। चर्चित कार्टून ‘टॉम एंड जेरी’ के अध्ययन से पता चला कि दोनों के झगड़ने के तरीके का असर बच्चों पर यह पड़ा कि वे वास्तविक दुनिया में उसी तरह झगड़ने लगे। बच्चों पर पड़ने वाले इस कुप्रभाव के कारण कार्टून का प्रसारण भी कई देशों में रोका गया।
