आमतौर पर रिटायरमेंट के बाद लोग नाती-पोतों, धर्म-कर्म के कामों में अपने आप को व्यस्त रखने का प्रयास करते देखे जाते हैं। कई लोग सुबह-शाम टहल-घूम लेने, क्लबों में बैठ कर कुछ दोस्तों के साथ समय बिता लेने, टीवी देखने, आराम करने, ज्यादा से ज्यादा अखबार वगैरह पढ़ लेने को ही अपनी दिनचर्या बना लेते हैं। मगर नौकरी से फुरसत मिलने के बाद एक नया जीवन शुरू होता है और उसे नए ढंग से जीने की जरूरत होती है। इस उम्र में नए शौक पूरे करने का अवसर होता है। बढ़ती उम्र में कैसे शौक पालें और उन्हें पूरा करें, पेश हैं रवि डे के सुझाव।
अक्सर बढ़ती उम्र में, खासकर रिटायरमेंट के बाद लोगों को आराम करते देखा जाता है। उनका तर्क होता है कि जिंदगी में बहुत काम कर लिया अब आराम करने की उम्र है। इस तरह अनेक लोग या तो धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं या बहुत हुआ तो सुबह-शाम घूम-टहल आए, फिर घर के किसी काम में हाथ बंटा दिया और दिन भर टीवी के सामने बैठ कर समय काटते रहते हैं। कुछ लोग नाती-पोतों के साथ अपना समय बिताना शुरू कर देते हैं। पर जिन लोगों के बच्चे दूसरे शहरों या दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं, उनके सामने यह विकल्प भी नहीं होता। ऐसे लोग अपनी उम्र के लोगों का समूह बना कर पार्कों में या मुहल्ले की किसी जगह पर बैठ कर ताश, कैरम, शतरंज वगैरह खेल कर अपना समय बिताते हैं या क्लबों में शामें बिता कर। मगर अध्ययन बताते हैं कि इस तरह अपना समय बिताने वालों को बुढ़ापा जल्दी घेर लेता है। वे कई बिमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि बढ़ती उम्र में कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें।
शौक बड़ी चीज है
हर किसी को कोई न कोई शौक जरूर होता है। भारत जैसे देश में ज्यादातर लोगों को जीविका की वजह से अपनी जवानी के शौक छोड़ कर कोई और काम करना पड़ता है। उन्हें इस बात का मलाल भी रहता है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद पूरा समय होता है, जब वे अपने शौक को पूरा कर सकते हैं। जवानी में नौकरी, बच्चों को पढ़ाने-लिखाने, उनकी नौकरी, शादी वगैरह की चिंता सिर पर हावी रहती है। पर रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति इन सारी चिंताीओं से मुक्त होता है और उसे अपने लिए जीने का भरपूर वक्त होता है। इसलिए यह तर्क कतई न दें कि अब बढ़ती उम्र में क्या खाक शौक पूरे करेंगे।
बढ़ती उम्र में शरीर की क्षमता जरूर घट जाती है, जिसके चलते अधिक श्रम वाले काम नहीं किए जा सकते, पर मानसिक श्रम तो किया ही जा सकता है। अध्ययन यह भी बताते हैं कि जिन लोगों को किसी न किसी चीज का शौक होता है, उनकी उम्र कुछ बढ़ जाती है। उन्हें बीमारियां कम होती हैं। इसलिए अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार कोई न कोई शौक अवश्य पालें। शौक हर किसी को किसी न किसी चीज का होता है। उस शौक को दिनचर्या में शामिल करें।
शौक कई तरह के हो सकते हैं। जरूरी नहीं कि शौक को पैसा कमाने का जरिया बनाएं। शौक को जीवन जीने, मन को खुश रखने का जरिया बनाएं। इससे आपकी रचनात्मकता विकसित होती है और जीवन में उत्साह बना रहता है। शौक कई तरह के हो सकते हैं। मसलन, पेंटिंग करना, बागवानी, दस्तकारी, बच्चों के खिलौने बनाना, लिखना, ट्यूशन देना वगैरह। मगर इसके अलावा सबसे बड़ा शौक यह हो सकता है कि आप अपने लिए न काम करके दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए काम करें। इसमें गरीब बच्चों को पढ़ाने, उनका जीवन संवारने, रोगियों की सेवा करने, नशे की गिरफ्त में फंसे किशोरों को सही रास्ते पर लाने, अपनी उम्र के लोगों को स्वच्छता, स्वास्थ्य से जुड़े समाजसेवा के कामों में शामिल करने जैसे काम हैं। कुछ ऐसे भी शौक हो सकते हैं, जिसमें शरीर को बहुत थकाने की जरूरत नहीं होती। जैसे गोल्फ खेलना, निशानेबाजी वगैरह। अभी बागपत की दो बुजुर्ग महिलाओं को निशानेबाजी का शौक चढ़ा, तो उन्होंने उसमें इस कदर दक्षता हासिल कर ली कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में अपना परचम लगहरा आर्इं। इसलिए जरूरत है, तो शौक का चुनाव करने और उसके प्रति समर्पण की।
प्रसन्नता है सबसे बड़ी औषधि
अनेक लोग नौकरी आदि से मुक्त होने के बाद भी धन कमाने की लालसा में ऐसी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं, जिसमें शरीर तो थकता ही है, मन पर भी दबाव बना रहता है। इस तरह कमजोर होते शरीर पर बीमारियों का दबाव बढ़ता जाता है। फिर वे डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं। जबकि व्यक्ति अपने शौक को जीना शुरू कर दे, तो बीमारियों से मुक्त रह सकते हैं। शौक को जीने से मन प्रसन्न रहता है। प्रसन्नता अपने आप में सबसे बड़ी औषधि है।
घर में हमेशा कैद न रहें। बाहर निकलने, घूमने-फिरने, दोस्तों के साथ मिल-बैठ कर बातें करने का समय तय करें। बहुत सारे लोग, जो नौकरी के दौरान अफसर रहे होते हैं, वे सामान्य वर्ग के लोगों के साथ मिलने-जुलने से परहेज करते हैं। यह ठीक बात नहीं। नौकरी के दौरान मिले ओहदे को ताउम्र अपने ऊपर न लादे रहें। समाज में रहने वाले सभी मनुष्य हैं और सबमें कुछ न कुछ योग्यता है, इसलिए जितने लोगों से निकटता बनाएंगे, उनसे अनुभव साझा करेंगे, जीवन के उतने ही रंग खुलते जाएंगे और आपके भीतर प्रसन्नता का स्तर बढ़ता जाएगा। हम कई बार अपने आग्रहों और अंहकार की वजह से प्रसन्नता के बहुत सारे मौके गंवा देते हैं। अपनी खोल में सिमटे रहते हैं और शरीर में व्याधियों को जगह बनाने देते हैं। मन पर खिन्नता या असंतोष हावी न होने दें।
सहयोग की संपत्ति
बढ़ती उम्र में अकेलेपन या फिर समय काटने की समस्या शहरी लोगों के साथ ही होती है। गांवों में रहने वालों के साथ ऐसी समस्या नहीं होती, क्योंकि वहां सामुदायिक जीवन है। सामुदायिक जीवन परस्पर सहयोग पर आधारित है। सहयोग की भावना रहे, तो जीवन का आनंद बढ़ जाता है। इसलिए अगर सामुदायिक कार्यों को अपने शौक में शामिल करें, तो प्रसन्नता का स्तर अपने आप बढ़ता जाता है। किसी भी तरह के क्षेत्र को चुन लें, जिसमें जरूरतमंदों की मदद करना हो। मनुष्य ही नहीं, इसमें पक्षियों, पशुओं आदि की सेवा भी की जा सकती है।

