रेखा सेठी
आज का साहित्य मानव मुक्ति के जिस अभियान की ओर उन्मुख है, स्त्री-चेतना उसका अभिन्न अंग है। स्त्री का जीवन कभी सरल नहीं रहा। कैद कई तरह की होती है… संबंधों में स्त्री का मन घुटता है, तो देह में आत्मा। मर्यादाओं के फ्रेम में जकड़ी स्त्री को समाज ने इतने अवसर भी नहीं दिए कि वह अपने भीतर की धड़कनें ठीक से सुन पाती। जब कभी उसने अपने मानवीय अस्तित्व को आवाज दी, तब समाज में उस पर सब ओर से हमले होने लगे। इसी पीड़ा के एहसास ने उसके स्त्रीत्व और स्त्री रूप में उसकी अस्मिता को तीव्रतर किया है। स्त्री अस्मिता की पहचान इन बेड़ियों के पिघलने का अहसास है, जो अपने सामाजिक पाठ में ऐतिहासिक टकराहटों की पड़ताल बन जाती है।
पिछले करीब तीन दशक से स्त्रीवादी दृष्टि को जो प्रमुखता मिली और स्त्री-विमर्श के बल पर स्त्री लेखन को जिस अलग नजरिए से पढ़ने की पहल हुई, उसने निश्चय ही साहित्य में स्त्री अस्मिता और मुक्ति की दिशा निर्धारित की। ‘अस्मिता-विमर्श’ की सैद्धांतिकी ने स्त्री-अस्मिता की पहचान को पितृसत्ता के सजग विरोध के सामाजिक आधार पर स्थापित किया और स्त्री मुक्ति पितृसत्ता से मुक्ति का पर्याय बनने लगी। स्त्री-विमर्श की स्थापनाओं ने पितृसत्ता पर आक्रामक प्रहार किए हैं। स्त्री रचनाशीलता इस संघर्ष में शामिल है, लेकिन यह सरलीकरण ही उस प्रयत्न को कमजोर भी करता है। इसी से स्त्री रचनाशीलता के इर्द-गिर्द ‘स्त्रीत्व’ का ऐसा फ्रेम जड़ दिया गया, जो उस लेखन के मूल्यांकन की सीमा भी बन गया, लेकिन क्या स्त्री-रचनाशीलता, स्त्रीवाद या स्त्रीवादी साहित्य का पर्याय है?
स्त्री रचनाशीलता में स्त्री अनुभव, स्त्री स्वर, स्त्री दृष्टि की अपनी महत्ता है, लेकिन असली चुनौती इस बहुलतावादी समाज की अंतवर्ती जटिलताओं की पहचान करने की है। स्त्री रचनाकार केवल स्त्रीवाद की बात नहीं करतीं, स्त्री अनुभवों की मार्फत दुनिया के तमाम वंचित समाजों से साझेदारी की कोशिश करती हैं। ऐसी ही भावना से प्रेरित होकर संभवत: पुरुष रचनाकार भी अपने भीतर स्त्री की तलाश कर रहे हैं। जेंडर और साहित्य के संबंधों में यह एक नई शुरुआत की पहल है। भविष्य की दिशा जेंडर विलोम की अपेक्षा जेंडर सहयोग की ओर संकेत कर रही है। ये सभी दृष्टि-बिंदु समान चिंता और चिंतन के पड़ाव हैं। देखना यह है कि उसमें स्त्री रचनाशीलता को कैसे चिह्नित किया जा सकता है। एक समाज में रहते हुए स्त्री-पुरुष, व्यक्ति-रूप में एक ही यथार्थ के साझीदार हैं। स्त्री-पक्ष के पार एक साधारण अनुभव भी है, जिसे स्त्री रचनाकारों ने बखूबी अभिव्यक्त किया है, लेकिन उस ओर हमारा ध्यान नहीं गया। जैसे स्त्रियों ने हमेशा से सामाजिक विडंबनाओं, राजनीतिक-आर्थिक मसलों, प्रकृति, प्रेम, भाषा और कविता आदि के सवालों पर गंभीरता से विचार किया है, लेकिन निकट अतीत में स्त्री-लेखन के इन पक्षों पर चर्चा बहुत कम हुई है। अस्मिता-विमर्शों की बहस ने अस्मिता तथा जेंडर के सवाल ‘ताकत के बंटवारे’ की मुहिम में बदल दिया।
स्त्री लेखन, स्त्री की चिंतनशील मनीषा के विकास का ग्राफ है, जो अपने साथ-साथ अपनी स्मृतियों में बसे सामाजिक इतिहास का मानचित्र भी गढ़ता जाता है। साहित्य की रचना-प्रक्रिया में परिस्थिति और मन:स्थिति के जिस द्वंद्व पर बल दिया जाता है, स्त्री-रचनाशीलता की परख में मन:स्थिति के अंतर को गंभीरता से पढ़ा जा सकता है। स्थितियां समान होने पर भी स्त्री दृष्टि, दमन के जिस अनुभव और मन:स्थिति से बन रही है, उसमें मुक्ति की आकांक्षा जिस तरह करवटें बदल रही है, उससे साहित्यिक संरचना तथा आलोचना दोनों की प्रणालियां बदलें, यह असंभव नहीं है। स्त्री-रचनाशीलता मानवीय भावनाओं की संभावना है, जो रूढ़ियों की जकड़न पूरी तरह निरस्त कर, अपने लिए नया क्षितिज तलाश रही है।
स्त्री-रचनाशीलता में अभिव्यक्त स्त्री-अस्मिता सजातीय एकरूपता की वाहक नहीं है। उसका बड़ा फ्रेमवर्क, छोटे-छोटे कई तार-तंतुओं से गूंथा गया है। भारतीय समाज में जाति एवं वर्ग की संरचना जेंडर की अवधारणा से कहीं अधिक सशक्त है। जेंडर और साहित्य की अवधारणाओं में अनेक ऐसी पतली गलियां हैं, जो एक-दूसरे से होकर गुजरती हैं। इसी से उनमें स्त्री-पुरुष के बाह्य विभाजन एक सीमा तक ही कारगर हो सकते हैं। साहित्यिक एवं सामजिक विमर्श, सामाजिक न्याय की स्थिति और गति से प्रभावित होते हैं। जाति एवं वर्ग के आधार पर अस्मिता के अनेक रूप हो सकते हैं, जिसे दलित तथा आदिवासी जन-समाज की रचनाकारों ने अपने जीवन के दोहरे अभिशाप को रेखांकित करते हुए प्रस्तुत किया है।
स्त्री की सामाजिक स्थिति, उसकी भौतिक उपस्थिति और उसके समय को परिभाषित करने की कोशिश, तह-दर-तह लिपटी हुई बहुपरतीय जटिलताओं का पता देती है। 1989 में के.डब्ल्यू. क्रेनशॉ द्वारा प्रस्तावित ‘थियरी आॅफ इंटरसेक्शनेलिटी’ के साथ स्त्री-अध्ययन की दिशा में एक नया मोड़ आता है, जिसकी चर्चा हिंदी में कम हुई है। इस सैद्धांतिकी की विशेषता यह है कि इसमें इस बात पर बल दिया गया कि किसी भी सामाजिक अध्ययन में लिंग या जेंडर को असमानता के एकमात्र आधार के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और भौतिक उपस्थिति, जहां से वह संसार को संबोधित कर रहा है, उसके प्रति होने वाले भेदभाव को समझने में मदद करते हैं। भारत जैसे बहुलतावादी देश में लिंग, जाति, वर्ग के अनेक समीकरण सामाजिक संरचना का जटिल जाल बुन देते हैं, जिसमें स्त्रियों की स्थिति को भी उनकी भिन्न अस्मिताओं के समंजन में ही पहचाना जा सकता है। विशेष रूप से दलित और आदिवासी स्त्री रचनाकारों की कविता उनके लैंगिक दमन के साथ-साथ उनके वर्गगत शोषण को भी अभिव्यक्त करती है। उनका स्त्रीवाद विषम सामाजिक व्यवस्था का प्रतिकार है। हमारी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं में अनेक प्रकार की हिंसा अंतर्निहित है।
जाति या वर्ग के आधार पर स्त्रियां भी दूसरे वर्ग और जाति की महिला के साथ वैसा ही असमान व्यवहार करती हैं जैसा पुरुष उन जातियों और वर्गों के साथ करता रहा है। स्वयं पुरुष की स्थिति भी ऐसी ही है। शोषित वर्ग में अवस्थित होने से दमन की पीड़ा झेलता पुरुष अपने वर्ग की स्त्री को वंचित रखने की प्रक्रिया में उसी प्रकार शामिल हो जाता है जैसे अन्य वर्गों के पुरुष। सामाजिक संरचनाएं सत्ता और वर्चस्व के आधार पर स्त्री-स्त्री, स्त्री-पुरुष के बीच अनेक प्रकार के पदानुक्रम स्थापित करती रहती हैं। स्त्री-रचनाशीलता की सार्थकता, इन संरचनाओं में अंतर्निहित हर प्रकार के शोषण को रेखांकित कर उसके विरुद्ध लोकमत का निर्माण करने में है।
स्त्री-संघर्ष का इतिहास लंबा सफर तय कर चुका है। अपने होने और जताने को लेकर स्त्री-अस्मिता के उभार से जन्मे इस संघर्ष का विकास अनेक दिशाओं में हुआ। राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व में भागीदारी से लेकर आर्थिक संसाधनों में बराबर अधिकार की मांग कमोबेश रूप से विश्व के सभी हिस्सों से उठी। स्त्रीवाद की विभिन्न धाराएं इन्हीं मांगों में से बला-बल के आधार पर एक-दूसरे से पृथक होती हैं। उदार स्त्रीवाद, रेडिकल स्त्रीवाद, मार्क्सवादी स्त्रीवाद आदि सभी धाराओं में स्त्री-मुक्ति के किसी एक पक्ष को केंद्र में रख कर लैंगिक असमानताओं से मुक्ति का आह्वान किया गया। ये सभी प्रयत्न इस मुक्ति अभियान के सार्थक पड़ाव हैं, लेकिन इनके अपने-अपने पक्ष इतने हावी हैं कि उनमें पूरा परिप्रेक्ष्य नहीं उभर पाता। अस्मितामूलक संघर्ष केवल एक सीमा तक ही परिवर्तन में सहायक हो सकते हैं। इसलिए एक ऐसा स्त्रीवाद आवश्यक है, जिसका बल तमाम सामजिक असमानताओं को संदर्भ बनाता हो। स्त्री-साहित्य ने यह काम बखूबी किया है, लेकिन संभवत: हमारी आलोचना के पास स्त्री-रचनाशीलता की परख के लिए सही मानक उपलब्ध नहीं हैं।
सामाजिक समता के सवालों और लैंगिक दृष्टि से उसके परिवर्तनशील समीकरणों को स्त्री साहित्य में रेखांकित कर पाना इस साहित्य को पढ़ने की पहली मांग है। स्त्री साहित्य, साहित्यिक रचना और आलोचना में एक प्रकार का दखल है, जिसने स्थापित मानकों को पलट कर ऐसा हस्तक्षेप करने की कोशिश की है, जिनसे उन स्थापनाओं की वास्तविकता उजागर हुई, साथ ही स्त्री के लिए यह उसके सामर्थ्य की अभिव्यक्ति तथा अपने खोए स्वत्व को पाने का प्रयत्न है। स्त्री-रचनाशीलता, साहित्य और जेंडर के संबंध को समझने का उपक्रम है, उसका निष्कर्ष नहीं। स्त्री-अस्मिता को अगर नागरिक अधिकारों से जोड़ कर देखा जाए तो जाति-वर्ग-जेंडर की बेड़ियों के पिघलने की सार्थक पहल होगी।

