कैलाश मनहर
किसी नटखट बच्चे की तरह आया करता था
शुरू शुरू में
और मुंह चिढ़ाते हुए भाग जाता था
इधर-उधर कई बार
मेरी बाजू में पिन चुभा कर छुप जाता था
और फिर तो जैसे
दिल खुल गया उसका मेरे ध्यान न देने से बस
एक दिन रास्ते के बीचों बीच
ठोकर की तरह आया और
सीधे पैर के अंगूठे से उठी जो पीड़ा की तन्नाती
लहर कि झन्ना गया शरीर और दिमाग
एकदम बचा मैं गिरने से
और पत्थर को उठा कर रख दिया किनारे
मैंने आदतन एक तरफ
वह इच्छा और तृष्णा की तरह भी आया कई बार
ताजगी और खुशी के अभाव की तरह भी और
कंपकंपाते शीत
कड़क धूप और बाढ़ की तरह भी आया
भूख और प्यास और बीमारी की तरह भी अक्सर
और सरकारी आदेश की तरह
अधिकार जताता हुआ मेरे अस्तित्त्व पर कि
पुलसिया जुल्म की तरह तो
रात-बिरात भी आता रहा अंधेरे में खड़काता लाठियां
कई बार तो
रूप बदल कर सुख की तरह भी आया वह
लोभ और लालसा की तरह तो
अनेक बार आया और
पश्चाताप की तरह भी आया दिल के करीब
कई बार आत्म-ग्लानि की तरह भी
आया पिघलाता हुआ मेरे अस्तित्त्व को
डर और अपयश की तरह भी आया
पराजय की तरह और यात्रा में थकान की तरह
अचानक भी आया अपनों से विलगाव के क्षणों में
आतंकित करता हुआ मेरे रोम-रोम को
छिजाता हुआ
आंसुओं की तरह भी आया
और स्मृतियों की तरह भी चुपके से आया वह
प्रेम और मोह की तरह भी आया
मेरे भीतर और आस्वाद की तरह भी
और अब तो इतना जरूरी हो गया है
मेरे होने के लिए वह कि
यदि नहीं हो दुख
तो मैं नहीं रहता मनुष्य भी ठीक-ठाक।
