मोहम्मद अरशद खान

पीपल का एक पेड़ था। खूब घनेरा। उसकी लंबी और मोटी शाखाएं दूर तक फैली हुई थीं।
पतझर का मौसम आया तो उसके पत्ते पीले होकर झड़ने लगे। पत्तों से भरी घनी-घनी डालें तिनकों का जाल रह गर्इं।
सबसे ऊंची डाली पर एक पत्ता अभी लगा रह गया था। वह टूट कर गिरने से डर रहा था। जब हवा का झोंका आता तो वह थर-थर कांप उठता। उसके पैर उखड़ने लगते। डर के मारे वह पीला और कमजोर पड़ता जा रहा था। उसने हवा से विनती करते हुए कहा, ‘बहन, जरा धीरे चलो। तुम्हारे झोंके मेरे पैर उखाड़े दे रहे हैं।’
हवा ने कहा, ‘देखो पीले पत्ते, बसंत आने में समय कम बचा है और अभी बहुत काम बाकी पड़ा है। अगर मैंने डालों से पुराने पत्ते नहीं हटाए तो बसंत उनमें नई-नई कोपलें कैसे टांकेगा? और सूरज उन्हें भोर की किरणें पिला कर कैसे हरा-भरा कर सकेगा?’
पत्ते के बार-बार गिड़गिड़ाने पर हवा ने उसे उड़ा कर एक पुराने घर के झरोखे में बिठा दिया। उसने कहा, ‘यहां तुम्हें छेड़ने कोई नहीं आएगा। तुम यहां अराम से बैठ कर दुनिया के नजारे ले सकते हो।’
मरता क्या न करता, पत्ते को मानना पड़ा।
पर अभी थोड़ा ही समय बीता था कि एक भूरी चींटी आकर उस पर चिल्लाने लगी। उसके पीछे दूर तक चींटियों की लंबी कतार बनी हुई थी।
‘ओ पीले पत्ते, हमारा रास्ता छोड़ो। हम भोजन के लिए एक मरे हुए टिड्डे को लाने जा रहे हैं।’
‘देखो, मैं अभी थका हूं। घबराहट से मेरा शरीर अब तक कांप रहा है। इसलिए मैं कहीं नहीं जाने वाला। तुम चाहो तो मेरे ऊपर से होकर जा सकती हो।’ पत्ते ने कहा।
चींटियां राजी हो गर्इं। उनकी कतार उसके ऊपर से होकर उस पार जाने लगी। नन्हे पैरों से पत्ते को गुदगुदी हुई तो वह हंसने लगा।
‘बेवजह हंसना बंद करो। और यहां से दफा हो जाओे। मुझे यहां अपना जाल बनाना है।’ तभी छत से लटकती हुई एक गुस्सैल मकड़ी आई और उस पर चिल्लाने लगी।
‘मकड़ी रानी, तुम तो कहीं भी अपना जाल लगा सकती हो। यह जगह मुझ बेचारे के लिए क्यों नहीं छोड़ देती?’
मकड़ी ने मुंह बना कर कहा, ‘यहां जाल में फंसने के लिए कीट-पतंगे खूब मिलते हैं। अंदर के अंधेरे से जब वे रोशनी की तरफ भागते हैं तो मैं उन्हें अपने जाल में फंसा लेती हूं।’
पत्ते ने किसी तरह मकड़ी को फुसलाया। वह मान कर दूसरी जगह की तलाश में चली गई। पत्ते ने सुकून से एक बड़ी-सी जमुहाई ली और आंखें बंद कर लीं।
पर तभी भनभनाती हुई एक ततैया आ धमकी। उसके नन्हे पैरों में मिट्टी का लोंदा लटका हुआ था।
‘अब तुम्हें क्या चाहिए?’ पत्ते ने ऊब कर पूछा।
‘मुझे यहां अपने लार्वों के लिए मिट्टी का घर बनाना है।’ ततैया ने जवाब दिया।
‘तुम कहीं और क्यों नहीं चली जातीं?’
‘यह जगह धूप और पानी से दूर है। यहां मेरे लार्वे सुरक्षित रहेंगे।’
‘देखो, मैं यह जगह नहीं छोड़ने वाला। तुम कोई और जगह तलाश लो,’ पत्ते ने झुंझला कर कहा और उसकी तरफ से ध्यान हटा लिया।
ततैया निराश होकर दूसरी जगह की तलाश में चली गई।
पत्ता अभी चैन की सांस ले भी नहीं पाया था कि अचानक तेज हवा के झोंके से वह उड़ते-उड़ते बचा।
‘ओए, छोटू! यहां से जल्दी निकलो।’ कबूतरों का जोड़ा पंख फड़फड़ाते हुए मंडरा रहा था।
पत्ता उन्हें देख कर डर गया और गिड़गिड़ाता हुआ बोला, ‘लेकिन मैं यहां से हटा तो सीधा नीचे गिरूंगा और लोगों के पैरों तले रौंद दिया जाऊंगा। हवा से शुष्क हो रहा मेरा शरीर चूर-चूर हो जाएगा।’
उसकी बात पर दोनों कबूतर ‘गुटर-गूं’ करके हंसने लगे।
कबूतरी बोली, ‘तुम बेवजह डरते हो। तुमने देखा नहीं? तुम्हारे सारे साथी तितलियों की तरह हवा में तैर-तैर कर धरती पर कैसे उतर गए? अब सब मिल कर कैसी मस्ती कर रहे हैं। एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर नाच-गा रहे हैं। कोई कलाबाजियां खा रहा है, कोई दौड़ लगा रहा है। कोई उछल-कूद रहा है। कोई खिलखिला रहा है। तुम बेवजह डर रहे हो। बाहर निकलो, देखो हर तरफ खुशियां ही खुशियां बिखरी हुई हैं।’
पत्ते ने नीचे झांक कर देखा। सचमुच सारे पत्ते उछल-कूद कर मौज मना रहे थे। उन्हें खुश देख कर पत्ते के मन का डर खत्म हो गया।
उसने झरोखे से बाहर हल्की-सी छलांग लगाई और हवा में तैर गया। वह सीधे पेड़ की जड़ों के पास गिरा। वहां नमी थी। उसके सूख रहे तन को बहुत सुकून मिला। उसने अपना शरीर ढीला करके धरती से सटा दिया, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा नमी सोख सके। अब पत्ते को बहुत अच्छा लग रहा था।