अब पहले जैसी बात नहीं रही। इत्र की और खासकर गुलाब के इत्र की विश्वव्यापी मांग है, इसके बावजूद मांग काम होने का तर्क समझ पाना मुश्किल है। बाजार में विकल्प ज्यादा हैं। गुलाब से बनी असली इत्र बहुत महंगी होती है। असली गुलाबजल की छोटी शीशी सौ रुपए में बिकती है और आधुनिक पद्धति से रासायनिक तत्त्व के इस्तेमाल से बने गुलाबजल की कीमत मुश्किल से बीस रुपए है। मतलब, रासायनिक हस्तक्षेप ने कन्नौज को सकते में डाल दिया है। वर्ष 1990 तक इस शहर में सात सौ डिस्टीलरी मौजूद थे। लेकिन रासायनिक विकल्प और पैराफीन के बेस से बनने वाली खुशबू इत्र के मुकाबले काफी सस्ती होती है और इसलिए कारोबार के लिहाज से लोग उनकी तरफ मुड़ रहे हैं। इसलिए दस मिलीलीटर की असली इत्र की शीशी करीब चौदह हजार रुपए में मिलती है, जबकि रसायनों से तैयार शीशी महज चार सौ रुपए में मिल जाएगी।
इसके अलावा, बढ़ती कीमतों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के उत्पाद कहीं न कहीं मार खा रहे हैं। खासकर चंदन तेल के बाजार पर ऑस्ट्रेलिया का कब्जा है। इस कारण पिछले बीस सालों में चंदन तेल का वैश्विक कारोबार चालीस फीसद भी नहीं रह गया है। गौरतलब है कि इत्र निर्माण में चंदन के तेल की भूमिका अहम होती है। ऊंची-ऊंची दीवारों के अंदर इत्र बनाने का परपरागत कारोबार तब से है जब मुगलिया वंश ने अतर को एहतराम का दर्जा दिया। राजा की रानी नूरजहां को चित्त से भानेवाले इत्र को व्यापारिक उत्पादन में तब्दील कर हिंदुस्तान ने अपने हुनर से न जाने किन-किन मुल्कों का मन मोह लिया। इत्र बनाने की जादुई कला के राज छिपाए अपनी चुप्पी में खोए इस शहर का तेजी से एक शोरगुल भरे बाजार में बदलना हैरत में जरूर डालता है।
यह बात अलग है कि गुलाब, चंदन, मोगरा, गेंदा, चमेली, खस, बेला, कस्तूरी, जैसमीन, फैंटासिया और मिट्टी के अर्क से इत्र निर्माण के केंद्र कन्नौज का कोई मुकाबला नहीं है और फूलों के इत्र के अलावा यहां के हर्बल इत्र सबसे ज्यादा डिमांड में हैं। बेशक पांच सौ रुपए से लेकर पंद्रह लाख रुपए तक के इत्र कन्नौज की मंडी में मिल जाएंगे। कारोबारियों ने दूर-दूर तक इस महक को पहुंचाने के लिए आॅनलाइन शॉपिंग पोर्टल्स की मदद लेनी शुरू की है, मगर सवाल आधुनिक तरीके से बने उत्पाद की कम कीमत और परंपरागत तरीके से बने महंगे उत्पाद के बीच का है। सुगंधी के बाजार में रासायनिक परफ्यूम की दखल ने जैसे परंपरा की शालीनता ओढ़े इत्र बाजार की जिंदगी के दायरे को न सिर्फ सीमित किया है, बल्कि उसके दीघार्यु होने पर भी संदेह है।
