द्वार द्वार पर दीप जले हैं
आंगन जैसे फूल खिले हैं।
भागा तिमिर, उजाला फैला
राम, श्याम लो गले मिले हैं।
तोरण सजते, मन हर्षाते
मुस्कानों के द्वार खुले हैं।
पूजा की थाली में सजते
लगते कैसे सुमन भले हैं।
भेदभाव का काम नहीं है
घृणा की नहीं दाल गले है।
ग्रीन दिवाली हमें मनानी
लेकर सब पैगाम चले हैं।
-राजेंद्र निशेष

